एको देवो रामचंद्रो...

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।

रविवार, 6 अगस्त 2017

विनयावली (३२-६१)

।। श्रीसीतारामाभ्यां  नमः।।


[३२]

बन्दौं राम नाम राकेश । कुमुद भगत जन हरन कलेश ।।१।।

उमा सहित जेहिं जपत महेश । कलि वृत्रासुर सरिस सुरेश ।।२।।

पतितपावन अरु सर्वकामप्रद । दायक पद रति रामचन्द्र ।।३।।

सुमिरत सुलभ हरन जन दुख । पावन विमल करन सब सुख ।।४।।

लोक और परलोक सुसाथ । आरत दीन अनाथ को नाथ ।।५।।

संतोष नसावन त्रिविधि ताप । संसृत समन पाप परिताप ।।६।।

[३३]

भज ले मन तू सीताराम । भजने में नहि लगता दाम ।।१।।

दो आखर का सुंदर नाम । पतितपावन जगअभिराम ।।२।।

हर स्थिति में गाए नाम । बिगड़े बन जाएँगे काम ।।३।।

हरि का नाम भजे अविराम । रामनाम है पूरणकाम ।।४।।

क्यों फिरता है हो बेराम । जप ले राम मिले आराम ।।५।।

आठों याम भजे तू नाम । चौरासी में लगे विराम ।।६।।

बिषयों का कर काम तमाम । तुझको मिल जाए प्रभु धाम ।।७।।

दीनदयाल राम सुखधाम । गायेजा प्रभु के गुनग्राम ।।८।।

संतोष करै तू छोड़ै काम । रामशरन मिलै अटल मुकाम ।।९।।

[३४]

सीताराम सीताराम । भजता जा मन तू अविराम ।।१।।

करता जाए अपना काम । जपता जाए प्रभु का नाम ।।२।।

क्या कंचन क्या कामिनी चाम । मत दौड़े तू पीछे दाम ।।३।।

जपकर उल्टा  राम को  नाम । बाल्मीक भए पूरनकाम ।।४।।

सहस्त्र नाम सम प्रभु का नाम । जिसको जपते भव स भाम ।।५।।

ध्रुव  ने जपकर श्रीहरि नाम । पा गए देखो अविचल धाम ।।६।।

प्रहलाद पुकारे पावन नाम । दुख का हो गया काम तमाम ।।७।।

अजामिल अंत पुकारेउ नाम । उसको भी पठए निज धाम ।।८।।

मीरा सूर तुलसी जपि नाम । सारे अपने बनाए काम ।।९।।

संतोष भजै तू भी प्रभु नाम । बिगड़ी तेरी बनाएँ राम ।।१०।।

[३५]

मन खग करु जग जाल से किनारा ।

यहाँ वहाँ दिखै जहाँ दाना बिखारा ।।१।।

फँसे जानैं फँसे नहीं सुरति बिसारा ।

भूले गेह नेह जो अनघ उदारा ।।२।।

बड़े-बड़े फँसे या में गए नहि पारा ।

नित नए काम बढ़ाय गए मारा ।।३।।

फँसै जोई बसै बार-बार संसारा ।

घटै नहीं पाप बढ़ै अमित अपारा ।।४।।

लोभ-मोह रसरी न जाए निरवारा ।

बड़ा जंजाल जगजाल कोउ उपारा ।।५।।

दीन संतोष साधु-संत ने पुकारा ।

निकरे वही जाको राम ने निकारा ।।६।।

[३६]   

राम नाम मंगलमूल दूर करय सब सूल ।

तू भूलै जग को जग भूलै तुझको राम नाम मत भूल ।।१।।

रामनाम में रमों राम भजे होये जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।२।।

जगजाल कब काल जाना है मत फूल ।

सब रस सुख तूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।३।।

[३७]

राम भजे मन होय प्रकाश । सुख आए  हो दुख का नाश ।।१।।

निर्मल मति का होय विकास । दुर्मति का नित होय हरास ।।२।।

सदगुन आएँ बिनु प्रयास । अवगुन को न मिलै सुपास ।।३।।

सारे सुख लहि जन अनयास । अंत में पाए प्रभु पुर बास ।।४।।

मिट जाए जन की सब त्रास । जग में सुख परलोक सुपास ।।५।।

संतोष करय जो नाम की आस । हो जाए मुद मंगल बास ।।६।।

[३८]

भजु मन राम छाड़ि चतुराई ।

मन बच करम प्रभु पद चित लाई ।।१।।

सहज सुगम दो आखर राम चरन रति दाई ।

प्रीति प्रतीति नाम सो कीजै बिषय बिकार बिहाई ।।२।।

नाम प्रभाव राम प्रभु रीझैं बसहिं जन उर आई ।

सब सिधि दायक नाम हरै अघ अवगुन कुटिलाई ।।३।।

राम बिना जग सूना गुरवर कहेउ समुझाई ।

संतोष राम भजि लहु जग जीवन लाभ अघाई ।।४।।

[३९]

राम नाम बिसारि मन भ्रमत जग जंजाल ।

समुझत नहि जानत सकल सदा बिपरीतहिं चाल ।।१।।

राम बिना नहि जग सुख पावै फिरत सदा बेहाल ।

राम भजे बिनु मिटय न संसृत अंत होइ उर साल ।।२।।

राम नाम तोड़ै भव बंधन जिमि गज पंकज नाल ।

राम कृपा करि मेटत जन दुख राम बड़े कृपाल ।।३।।

जन जहाज जग जलनिधि भँवर बड़ा बिशाल ।

संतोष अवलंब राम दयानिधि मेटहु बिपति कराल ।।४।।

[४०]

मन मूरख तू अबहु न चेते ।

मोह निशा सोवत तोहिं निशि बासर नित बीते ।।१।।

अघ अवगुन जो हैं जग माहीं तोहिं सकल अति प्रीते ।

मृगतृष्णा ज्यों बिषय सुख खोजत रहत सदा तेहि रीते ।।२।।

राम नाम रस तोहिं न भावै बिषय रस क्यों नित पीते ।

रोग मोह दुख दोष कहाँ जो रामचरन गहि लेते ।।३।।

रामशरन गहि तू सुख सोवत भय अरु शोक न होते ।

प्रनतकलपतरु नाम प्रभू का पद चित क्यों नहि देते ।।४।।

[४१]

मेरो मन राम नाम रस पीजै ।

राम नाम रस सुधा सरोवर ता में मज्जन कीजै ।।१।।

काम क्रोध मोहादि बिषयरति या मज्जन ते छीजैं ।

मत भरमै तू मत भरमावै बिषय आस तजि दीजै ।।२।।

जग जीवन में समय कहाँ है और बिलंब न कीजै ।

अजहुँ जो चेतै तू मन मेरे अंत नहीं कर मीजै ।।३।।

श्रीरामचंद्र के चरन-कमल में मन-मधुकर चित दीजै ।

राम नाम रस सुधा सरोवर संतोष मन मीन करीजै ।।४।।

[४२]

मेरे मन रामहि राम भजौ ।

रामनाम की महिमा न्यारी राम भजत हैं अजौ ।।१।।

रामनाम की आस तुझे है सपनेहु और की आस तजौ ।

रामनाम सेवक दुख काटै राम पुकारि बचे थे गजौ ।।२।।

रामनाम कलपपादप है सुमिरत सब अघ ताप छिजै ।

राम बिना केहि काम को जीवन  राम भजि जीवन लाहु लिजै ।।३।।

प्रीति करि दौ आखर से तू दुर्लभ सुख भी सजै ।

राम नाम भजि तू मन मेरे जग सुख करि परलोक रजै ।।४।।

[४३]


मेरो मन राम चरन रति कीजै ।

ध्वज अकुंश वज्र कमल चरन जेहि सो चित में धरि लीजै ।।१।।

सर्वकामप्रद चरन मनोहर निस बासर चित दीजै ।

जप तप यज्ञ योग सकल सुख सहजहिं सुलभ करीजै ।।२।।

मोह रोग मद मान पाप सब बिनु  प्रयास ते छीजैं ।

राम चरन तरु अभिमत छाया मन खग शरन गहीजै ।।३।।

[४४]

भजु मन राम चरन चित लाई ।

कलपपादप सम जो पद पंकज जन को सब सुख दाई ।।१।।

शिव अज मुनि सब जेहि चरनन हित नित रहे ध्यान लगाई ।

परम पुनीत भईं मुनि नारी जेहि चरनन रज पाई ।।२।।

जेहि चरनन को धोइ के केवट लहेउ जीवन लाभ अघाई ।

पवनसुवन, रिपुदवन, लखन, भरत, सिया सुख पाई ।।३।।

सेवत सब जो पद पंकज सुरसरि उद्गम कहलाई ।

दंडक कानन पावन कारी जेहि पद कृति जग छाई ।।४।।

उर आनत पद सरोज जेहि कलिमल जात नसाई ।

दीन मलीन संतोष सरीखे जो पद सब गति दाई ।।५।।

[४५]

रे मन तू कितना नादान ।

हित अनहित तो पशु भी जानैं, तू कैसा अनजान ।।१।।

अपुना तो भटकै माया वन, औरन को सिखलावे ज्ञान ।

कपटी छलिया ध्यान लगावै, बगुला भगत समान ।।२।।

अपने को तू ज्ञानी समझै, यह तेरा अज्ञान ।

अवगुन को तू गुन समुझत है, गुन की नहि तुझको पहिचान ।।३।।

कितना भी तुझको समझाऊँ, तू नहि करता है कछु कान ।

मगन फिरै तू अपने धुन में, तुझको नहीं किसी का ध्यान ।।४।।

अब तो छोड़ कपट चतुराई, माँगु राम से दया को दान ।

संतोष लगा ले नेह राम से, राम प्रभू हैं दयानिधान ।।५।।

[४६]

रे मन हरि सुमिरन जग सार ।

यह जग सपना कोई नहीं अपना रामहिं राम पुकार ।।१।।

जो जग जाए जग से जाए अपुनो नहि संसार ।

जग मन भावन परम लुभावन प्रभु बिनु सब बेकार ।।२।।

जग रंगीला देखि न भरमै रंग जात नहि बार ।

बिषय रोग है भोग नहीं तू सबसे ध्यान उतार ।।३।।

जानि अजान बनै मत मूरख पहन गले में नाम को हार ।

तीरथ वरत दान सब कलि महुँ एक राम के नाम अधार ।।४।।

सब तजि भजु मन नाम राम को कर देगा भव पार ।

संतोष करै तू राम नाम भजि अंत में राम को धाम तुम्हार ।।५।।

[४७]

रे मन नहि कछु तेरे हाथ । होता जो करते रघुनाथ ।।१।।

जग में कर सारे पुरुषार्थ । लेकिन दया धरम के साथ ।।२।।

दुख देने में न हो हाथ । हो ले दुख में सबके साथ ।।३।।

हृदय में धरि सीता नाथ । गाए जा प्रभु के गुन गाथ ।।४।।

राजिवनयन धरे धनु भाथ । जन को प्रभु करते कृतार्थ ।।५।।

फिरता जग में हो अनाथ । राम नाम भजि बनै सनाथ ।।६।।

बिगड़े काम बिना सुसाथ । कर ले राम नाम का साथ ।।७।।

जग में स्वारथ नहि परिमार्थ । तजै काम भजु दीनानाथ ।।८।।

अंत न जाएगा कछु साथ । पकड़ अभी से धरम का हाथ ।।९।।

संतोष चलेगा तेरे साथ । रामनाम जो अनाथ का नाथ ।।१०।।

[४८]

रे मन कैसे प्यास बुझाय ।

कबहूँ तू धरती पे दौड़े कबहूँ धाय गगन में जाय ।।१।।

जहाँ तहाँ तू हर पल भटकै तेरी गति बरनी न जाय ।

तृष्णा तेरी नहीं मिटत है सेवत ए बढ़ती ही जाय ।।२।।

ये भी तो क्या अजब चीज है मति पर दियो कपाट लगाय ।

बिषय घृत तृष्णा पावक है संतोष नीर से सकय बुझाय ।।३।।

त्याग रहित सब भोग रोग सम ज्यों अजीर्ण भोजन दुखदाय ।

आग में डालत आग सदा याते बात बिगड़ती जाय ।।४।।

काम करै जग में तू ऐसा जग लोभै मत जाय लुभाय ।

करम करै अरु भजै नाम प्रभु जग जल में मन कमल बनाय ।।५।।

दया धरम अरु भले करम एही जग सुख मूल कहाँय ।

संतोष लगा ले नेह राम से राजिवनयन बसैं उर आय ।।६।।

छोड़ सकल तू कपट धूरता याते नहि जग सुगम उपाय ।
आधि ब्याधि सब प्यास मिटै जो रामनाम सर लेइ नहाय ।।७।।

[४९]

रे मन मूरख भूला फिरै जब समय चुकै पुनि का पछिताने ।

सोवत जोड़त पालत पेट इसको ही क्या जीवन माने ।।१।।

सूकर कूकर सोवत खात घूमत लड़त ते आहिं अयाने ।

जानि अजान बना केहि कारन नहिं पशु तू है मनुज सयाने ।।२।।

काम करे कछु नाम करे संग राम भजै तो जीवन जाने ।

सत्कर्म करै सत्मार्ग चलै परहित दया गुर धरम बखाने ।।३।।

जो न बनाय सके केहुकै तो बिगाड़न को भी न तू ठाने ।

संतोष जगजीवन लाभ लहइ क्या जीवन जो रघुनाथ भुलाने ।।४।।

[५०]    

जग में आय बसा जिव जबसे छाड़ि एक बहु काम करै ।

चाल कुचाल चलै जग में भोगरोग मति ज्ञान हरै ।।१।।

सुमारग छोड़ि कुमारग धावै नाना जतन करि पेट भरै ।

अंत में साथ नहीं कुछ हाथ जानत तदपि अधर्म चरै ।।२।।

पाप परिताप शोक संताप ते शांति बिना दिन-राति जरै ।

राम बिना आराम कहाँ बेराम महादुख काहे टरै ।।३।।

प्रपंच पिसुनता छीर पिये सापिन जिह्वा बिल वदन फिरै ।

संतोष जो राम भजै नहि जीहा तो बिनु काम भला जो सरै ।।४।।

[५१]

राम राम राम राम जप मन मेंरे ।

राम नाम से बड़ौ हितू नहीं तेरे ।।१।।

नर की तो कौन कहै देव भी हैं चेरे ।

राम जी का नाम जपै साझ सबेरे ।।२।।

अवगुन दूर हों गुन हों घनेरे ।

दुख दोष दूर हों आएँ नहि नेरे ।।३।।

राम नाम में ही सारे सुख तू हेरे ।

रामनाम जपु मनकाम होंगे पूरे ।।४।।

राम बिनु काम का जग नहीं तेरे ।

संतोष कहे राम राम, राम कहैं मेंरे ।।५।।

[५२]

मन जपु राम राम कर नहि बार रे ।

रामनाम चित में रखु ज्यों आँखि रखय तारे ।।१।।

पाप ताप दोष दुख मिट जाएँ सारे ।

रामनाम केवट भव पार उतारे ।।२।।

रामनाम कोटिक अधम उधारे ।

रामनाम संकट से जनको उबारे ।।३।।

रामनाम तेरी सब बिगड़ी सवाँरे ।

रामनाम भजि बनु राम को पियारे ।।४।।

रामनाम लेता रहे राम के सहारे ।

संतोष भजे राम, राम कहैं हमारे ।।५।।

[५३]

जीवन क्या बिनु राम चरन रति पाए ।

खग पशु भलो राम बिना वृथा मनुज देंह जो जाए ।।१।।

मज्जन कोटिक बार किए क्या बिनु रामनाम सर मन अन्हवाए ।

वेद पुरान साधु सुजन जन नाना जतन बताए ।।२।।

समझ न आवत कठिन सकल मन नहि लखत लखाए ।

है कलिकाल बड़ा जंजाल कोउ सब ज्ञान सिखाए ।।३।।

सरल सरस दो आखर गुर तुलसी समुझाए ।

सब कर फल सुलभ जन को जो राम-राम ही गाए ।।४।।

कलि में सब फल नाम से केवल जो नाना जतन कराए ।

राम नाम दोऊ सहज प्रभु को नाम रिझाए ।।५।।

राम-राम रटि तुलसी राम चरन चित लाए ।

संतोष सफल जगजीवन राम में मन रम जाए ।।६।।

[५४]

राम रटु ! राम रटु ! राम रटु ! जीहा । राम घनश्याम हित बन जा पपीहा ।।१।।

बिरत नहीं  रत बात अलीहा । नाम रस पान कर बीतै दुख लीहा ।।२।।

छाड़ि सब आस रस मान सरीहा । संतोष मिलै मोहिं जेहि राम पद ठीहा ।।३।।

[५५]

कर्म अकर्म के अनुसार । फल मिलता सबको यह सार ।।१।।

कर्म करे प्रभु को चित धार । कुछ बिगड़े तो होय सुधार ।।२।।

कुकर्म करत जेहि सुख अधिकान । जानों पूरब कर्म प्रधान ।।३।।

छीजत तेहिं हो इसका भान । या आगे न मिटइ निशान ।।४।।

देखत सुख मन में नहि शांति । जरे पाप जर नाना भ्रान्ति ।।५।।

तत्काल नहीं वर्षों में हल । आज नहीं तो निश्चय कल ।।६।।

सबका होता उत्थान पतन । प्रकृति नियम नहि एक जतन ।।७।।

[५६]     

मन मेरे मत बने अजान । नहि अचरज कुछ भी तू मान ।।१।।

जो भी करता है विज्ञान । प्रकृति निहित यह नूतन ज्ञान ।।२।।

जग में छुपे रहस्य अबूझ । मानव खोजे जितनी सूझ ।।३।।

पहले भी होता था प्रयोग । शाला शरीर बहु जप तप योग ।।४।।

उद्देश्य था केवल आत्म विकास । भोग से रहते दूर उदास ।।५।।

जड़ पदार्थ के सारे गुन । तब भी थे ऐसी नहीं थी धुन ।।६।।

सब कुछ ईश्वरमय कृत मान । सब रहते करते प्रभु का ध्यान ।।७।।

आधुनिक भौतिकी के निष्कर्ष । बिना योग जीवों का उत्कर्ष ।।८।।

सद्ग्रंथो में कुछ संकेत । मिलता देखे जो कर चेत ।।९।।

कुछ है भाषा का बदलाव । सत्य एक नहि तहाँ घुमाव ।।१०।।

दोंनो का करिए ऊँचा ज्ञान । तब हो सकती है पहिचान ।।११।।

[५७]

मृत जीवित कर दे विज्ञान । इसमें भी नहि अचरज जान ।।१।।

बढ़ जाए मानव अधिकार । मन माखे न करय बिचार ।।२।।

पहले भी यह हुआ सुजान । मत भर्मित हो प्रभु को मान ।।३।।

कलयुग अर्थ और भी जान । कल-मशीन युग भी पहिचान ।।४।।

होता जाए बहुत विकास । उसमें भी तो छुपा विनाश ।।५।।

वैभव जब मिलता बढ़य गुमान । मति हर लेता है अभिमान ।।६।।

तब जन होके बस प्रमाद । नाना भांति करय दुर्वाद ।।७।।

मिट जाए सब धर्म बिचार । बढ़ जाए बहु अत्याचार ।।८।।

आ जाए तब वो भी काल । पशु मानव की एक हो चाल ।।९।।

पशु ते बदतर बनय समाज । सुनय न कोई एक अवाज ।।१०।।

तब होता सारा समाधान । कलि का अंत तभी तो जान ।।११।।

कहाँ लगि कहै संतोष बखान । राम प्रभू कीजै कल्यान ।।१२।।

[५८]

सुनि लीजे मन सत्य बिचार । जग में राम नाम है सार ।।१।।

निद्रा भय अरु काम अहार । पशु अरु मनुज सकल ये जार ।।२।।

मनुज सकै करि हरि गुनगान । जड़ता से पशु हुआ अजान ।।३।।

मनुज देंह में सुजन सुजान । भव तरने का करता ज्ञान ।।४।।

करके देखो आप बिचार । राम बिना सम होत अचार ।।५।।

भूमि भार अरु अन्न संहार । यह नहि मनुज जनम का सार ।।६।।

राम राम श्रीराम उचार । जन कर लेते हैं भव पार ।।७।।

संतोष तू रामहिं राम पुकार । राम बिना क्या यह संसार ।।८।।

[५९]

बढ़ता है जग पापाचार । जहँ देखो तँह भ्रष्ट अचार ।।१।।

विमल ज्ञान बिनु नहिं कछु जोर । बढ़ता जग पशुता की ओर ।।२।।

सभी जगह अब पहुँचा दाम । योगी भी भूला हरि नाम ।।३।।

लावो खावो का परचार । किसका कैसे नहीं बिचार ।।४।।

किसका है यह सारा दोष । खोता मानव अपना होश ।।५।।

क्या करता है कलि विज्ञान । इससे नहि मिटता अज्ञान ।।६।।

बढ़ता जाए इससे भोग । जिससे काँपे योगी योग ।।७।।

जग प्रभु का जग की पहिचान । प्रभु को भूल रहा इंसान ।।८।।

बिषय भोग अज्ञान गुमान । ये सब दूर करे भगवान ।।९।।

निर्मल मति बिनु नहीं बिचार । केवल रामनाम है सार ।।१०।।

[६०]

परहित दया राम गुनगान । जननी-जनक साधु सनमान ।।१।।

धर्ममूल सदग्रंथ सुजान । कहते बारंबार बखान ।।२।।

परपीड़ा गुरजन अपमान । राम बिना नर दनुज समान ।।३।।

जग जाकर बस झूठीं शान । क्यों भटकै होकर अनजान ।।४।।

राम नाम को निज हित जान । करते रहिये इसका ध्यान ।।५।।

राम नाम से मन विश्राम । मिलता बनता बिगड़े काम ।।६।।

तुलसीदास गुरू कहेउ बिचार । जग में राम नाम है सार ।।७।।

कुतर्क नव्यज्ञान निरधार । संतोष को केवल राम अधार ।।८।।

[६१]

मन खग करू नाम बिटप बसेरा ।

बसे नहीं फँसै जगजाल घनेरा ।।१।।

अभिमत छाँव नहि पाए कोई हेरा ।

कलिकाल बधिक सो जाए नहि घेरा ।।२।।

रामनाम बिटप न जाए झकझोरा ।

चले चाहे आँधी कलिकाल को झकोरा ।।३।।

काल बाज सिर पे न और करू देरा ।

तिहुँ काल लोक तिहुँ ऐसो नहि डेरा ।।४।।

कूजै राम राम रस पान नाम केरा ।

मीठे-मीठे फल बहु पास सदा तेरा ।।५।।

आधि-ब्याधि सोच संताप नहि नेरा ।

भटके न खाए संसार को थपेरा ।।६।।

उड़ि-उड़ि देखा बहुबार किया फेरा ।

कहै संतोष चेत अजहूँ सबेरा ।।७।।




।। श्रीसीतारामार्पणमस्तु  ।।


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लोकप्रिय पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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श्रीराम चालीसा

।। श्री गणेशाय नमः ।।

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुःख नासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ तिनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । तिनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दे दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

दे मुंदरी हनुमन्त पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाए ।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़े प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दियेउ बड़ाई । संकट मोचन नाम धराई ।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहि राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु मान बड़ाई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनूग्रह कीजे नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कह भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।


राम चलीसा नेम ते पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु ताके हृदय निकेत ।।


।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।