एको देवो रामचंद्रो...

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।

सठ सेवक की प्रीति रूचि रखिहहिं राम कृपालु

सठ सेवक की प्रीति रूचि रखिहहिं राम कृपालु । उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ।। श्रीरामचरितमानस ।।

रविवार, 6 अगस्त 2017

विनयावली (१६१-२१८)

।। श्रीसीतारामाभ्यां  नमः।।


[१६१]

कबहुँ न सोचौं केहि विधि दारुन भव तरि जाई ।

सरल सुगम जो मारग गुरू तुलसी राह देखाई ।।१।।

सोच नहीं कहीं भी जाऊँ नाम न छूटै भाई ।

धन मानस धन-धन गुरु तुलसी अजब ज्ञान सिखलाई ।।२।।

बालपने से मानस पढ़ि-पढ़ि नाथ चरन रति भाई ।

संतोष न छूटै नेह राम से चाहे जगत छूटि जाई ।।३।।

[१६२]

स्वारथ बस सब प्रीति करत जग कौनउ आस लगाई ।

आस गए फिर प्रीति कहाँ रचहिं कोटि कुटिलाई ।।१।।

तरुवर को ज्यों त्यागत सब जब फल की आस बिहाई ।

राम प्रभू अपनाय लेंइ तो छोड़त नहि जन भाई ।।२।।

राम निभावत प्रीति की रीति चाहे बनय जो आई ।

सुनि गुनि प्रभु की प्रीति की रीति संतोष रहा लुभाई ।।३।।

राम रहित जग राज न भावै चाहे मिलइ बरिआई ।

जीवन भी मैं नहि चाहँउ जो राम रहित होइ जाई ।।४।।

[१६३]

प्रीति लगी जो नाथ चरण में कबहुँ घटय जनि पावै ।

प्रीति बढ़ी है नाथ चरन में दिन प्रति बढ़ती जावै ।।१।।

नाथ जो हौं सो आप कृपा से होऊँ वही जो भावै ।

नाथ कठिन तव माया प्रबल मोहिं जनि कहुँ भरमावै ।।२।।

आस विश्वास सदा प्रभु तुमसे रहय न मन भटकावै ।

संतोष है जब लगि नाथ जगत में राम राम गुन गावै ।।३।।

अविरल प्रेम नाथ करुणानिधि तव पद पंकज पावै ।

तव पद अंबुज छाड़ि राम प्रभु कबहूँ न और से आस लगावै ।।४।।

[१६४]

जगताश्रय प्रभु राम जगत हित देखौ सोच सही ।

बिनु गुन प्रभु मैं नहि कोई साथी सब कुछ हौ तुमही ।।१।।

अपने-पराये काम न आएँ बुधि बल नाथ नहीं ।

तेरे सहारे रहौं मैं स्वामी जानौ सब का कही ।।२।।

सरल-सबल तुमसा नहि कोई होवै करौ वही ।

तुम बिनु और न राखनहार राखौ नाथ रही ।।३।।

बहु भटकेंउ प्रभु दया करौ जाते न फिरहीं ।

कहि दीजै संतोष है मेरा चरण रखा मैं गही ।।४।।

[१६५]

राम दयामय आस निहारूँ ले अँखियों में जल ।

दीन दुखी के प्रभु तुम साथी तुमही हो संबल ।।१।।

कोमलचित है नाथ तुम्हारा तुम हो बड़े सरल ।

खोजि-खोजि के दीन उधारेउ तारेउ तुम्हीं उपल ।।२।।

जगताश्रय प्रभु जग जन रक्षक तुमसा नहीं सबल ।

मुझको भी एक बार निहारो मैं कितना निर्बल ।।३।।

दीनदयाल दया के सागर तुम ही मेरे बल ।

मेरी दीन-दशा का स्वामी हाथ तुम्हारे हल ।।४।।

राम दयानिधि दया करेंगे आज नहीं तो कल ।

मन को मैं अपने समझाऊँ होता जाय बिकल ।।५।।

करुणासागर देर न करिए अवसर जाइ निकल ।

बिना कृपा प्रभु राम हमारे मुझको सब मुश्किल ।।६।।

कृपा अनुग्रह करिए स्वामी भूलूँ न एक पल ।

संतोष चहै मन मीन हो मेरा राम चरन हो जल ।।७।।

[१६६]

राम प्रभू जी द्वार तुम्हारे कबसे पड़े हैं हम ।

दीनदयाल दया के सागर दया नहीं है कम ।।१।।

सुनि के गुनगन द्वार पे आए हूँ तो बड़ा अधम ।

पतितपावन दुख दोष नसावन दशा बड़ी विषम ।।२।।

अब तक नहि एक बार निहारा ऐसा मेरा करम ।

नजर उठाके देख रहा मैं ओर तेरे हरदम ।।३।।

कम से कम एक बार निहारो आँखे कितनी नम ।

दीन जनों पे कृपा भगवन जबकी तुम हो सम ।।४।।

द्वार नहीं हम छोड़ि सकेंगे चाहे निकले दम ।

बड़े सकोची सकुचाकर ही शरन दे दिए हम ।।५।।

कह दोगे तुम करुनासागर फिर अभी नहीं किस दम ।

राम राम संतोष पुकारे राम बने हमदम ।।६।।

[१६७]

राम प्रभू जी चरण तुम्हारे पकड़ चुके हैं हम ।

कृपा करिके हर लो भगवन जीवन में जो तम ।।१।।

तेरे भरोसे रहूँ मैं स्वामी छोड़ि के सारे गम ।

अपने दोषों को सोचूँ तो आए मुझे शरम ।।२।।

फिर भी मुझको ठुकुरा दोगे ऐसा नहीं भरम ।

पतितपावन है नाम तुम्हारा तुम कितने अनुपम ।।३।।

गुनगन को सब गाते हैं सारद शेष निगम ।

करुनामय रखि ही लेते हैं हो कोई मुझसा ही अधम ।।४।।

दीनदयाल दयानिधि स्वामी हम हैं बड़े अक्षम ।

करुनासागर की करुना से कुछ भी नहीं अगम ।।५।।

सभी दशाएँ सम हो जाएँ चाहे बड़ी बिषम ।

संतोष कहै प्रभु राम कृपा से होता सब अधिगम ।।६।।

[१६८]

प्रभूजी अब देर न कीजे ।

वेद पुरान साधु सुर गावत दीन हितू नहि दूजे ।।१।।

बारक राम कहत तुम रीझे अघ-अवगुन सब छीजे ।

करुनासागर विरदउजागर अखिल जगत के बीजे ।।२।।

तव कृपा से राम दयामय दीन मलीन गे पूजे ।

मोरे बेर, बेर रघुनायक और न नाथ करीजे ।।३।।

मन चंचल जानो सब स्वामी देखि दशा सुधि लीजे ।

नहि निज बल प्रभु अंर्तयामी तोहिं जियाये जीजे ।।४।।

काह कहौं केहि कृपा विसारे सोच यही भी लखीजे ।

डूबत संतोष पुकारत स्वामी कर अवलंबन दीजे ।।५।।

[१६९]   

सरल सबल प्रभु राम सरिस खोजे कहीं न मिलते हैं ।

उनको सम है मान अमान सभी का आदर करते हैं ।।१।।

गीध जटायु को भी वो पिता तुल्य समझते हैं ।

बानर-भालू केवट को भी मित्र व भाई कहते हैं ।।२।।

बिभीषन निसचर को भी राम सखा व भाई कहते हैं ।

दीन-मलीनों से रघुवर अनुराग अनोखा रखते हैं ।।३।।

राम-राम अरु ‘मरा-मरा’ दोंनो एक समझते हैं ।

मतलब उल्टा नाम कहो फिर भी नहीं रूठते है ।।४।।

दो आखर का सुंदर नाम राम हमारे रखते हैं ।

करुनामय अग–जग के स्वामी विनय शील गुन धरते हैं ।।५।।

‘तू’, ‘तेरे’ उनको कहते जन फिर भी वो खुश रहते हैं ।

लोग और साधू भी तो ऐसा कहने पे बिगड़ते हैं ।।६।।

राम जी सीधे-साधे हैं किसी को कुछ नहीं कहते हैं ।

गुण को देंखे राम सदा अवगुन क्षमा वो करते हैं ।।७।।

[१७०]

गीध जटायु को जब देखा उनको तुरत प्रणाम किया ।

भिलनी शबरी को प्रभु ने माता कहकर मान दिया ।।१।।

केवट को लोग न छूते थे गले से उनको लगा लिया ।

ऋषियों-मुनियों का रघुवर ने सदा बहुत सम्मान किया ।।२।।

मिलते ही सबको प्रभु ने हाथ जोर प्रणाम किया ।

मुनियों से जादा गीध शबरी व केवट का बखान किया ।।३।।

[१७१]

जिसकी कोई बात सुने ना उसकी भी गाथा सुनते हैं ।

जिसे रखे न पास कोई उसको भी पास वो रखते हैं ।।१।।

जिसको आदर मान मिले न उसका भी आदर करते हैं ।

सुनावत सहज स्वरूप किए प्रणाम भी वो सकुचते हैं ।।२।।

इससे वनवास की लीला में मुनि राम परस्पर झुकते हैं ।

वानर भालू केवट मीत परम हर्षयुत सुनते हैं ।।३।।

परम कृतज्ञ विनीत सियावर दास बड़ाई देते हैं ।

बहुत ही सीधे-साधे हैं सदा एक सम रहते हैं ।।४।।

सुर नर मुनि की बात ही क्या पशु पक्षी तक की सुनते हैं ।

ऐसे ही बातें हैं अनेक सो उन सम वही सब कहते हैं ।।५।।

[१७२]

वानर-भालू गीध निसाचर सबकी पैठ न और कहीं ।

राम दरबार में सबका आदर जो भी जाए बात सही ।।१।।

राम दरबार में न्याय मिला पशु पक्षी आदिक को  भी ।

दरबार खुला उनका सबके हित जो जाना चाहे जाय जभी ।।२।।

राम दरबार की महिमा न्यारी होता कोई निराश नहीं ।

सुर नर मुनि पशु पक्षी की भी सुनीं जाती गुहार यहीं ।।३।।

आरत दीन मलीन को आदर दरबार की उनके रीति यही ।

गुनगन विरद संतोष कहै रघुनाथ अनाथ के नाथ सही ।।४।।

[१७३]

राम कृपा को ही पंथ चितवत हौं ।

दीन को दयाल राजा राम विनवत हौं ।।१।।

असरन सरन प्रनतपाल प्रनत हौं ।

सब गुनहीन कबहूँ राम कहत हौं ।।२।।

सीताराम पद कमल अनुराग चहत हौं ।

राम गुनग्राम सुनि मोद लहत हौं ।।३।।

कृपा किए बार बहु सदा अनुभवत हौं ।

राम के बसाये मोसे बसैं बसत हौं ।।४।।

राम के सहारे मोसे रहैं रहत हौं ।

राम के बढ़ाए दीन बढ़ैं बढ़त हौं ।।५।।

मोसे दीन दूबरे को राम सुनत हौ ।

कीस कपीस ज्यों सबको फलत हौ ।।६।।

करुनानिधान दीन जन दुख हरत हौ ।

संतोष राखौ मोहूँ मोसे रखत हौ ।।७।।

[१७४]

असरन-सरन सरन दुखहारी ।

परमकृपाल शरनागतपाल गावत गुन मुनि झारी ।।१।।

सरल मृदुलचित रीझत थोरे सियावर राम खरारी ।

डूबत जन देखौ रघुनायक केवल आस तुम्हारी ।।२।।

करुना क्षमा बल शील के सागर सुधि लीजे नाथ हमारी ।

कृपा विलोकनि सोच विमोचन लीजे मोहि निहारी ।।३।।

केहि विधि कहौं तुम अंतर्यामी जानौ राम अघारी ।

वेगि उबारो करुनासागर अति संतोष दुखारी ।।४।।

[१७५]

दीन को दयाल राम कृपाल तुम सम तुम नहि कोई ।

राखे हेरि दीन हीन जानै जग नहि गोई ।।१।।

सहज अघराशि जो शरन आए तज्यो नहि सोई ।

पाप ताप सोच बीते चरन गहे जोई ।।२।।

पाहि नाथ हहरि हेरि कहौं अब नयन वारि मोई ।

शबरी के बेर खावनहार बेर संतोष बेर किए अब भलो नहि होई ।।३।।

[१७६]

मोहि लगि जनु प्रभु कृपा विसारी ।

मन भ्रम जदपि नाथ आरत जन करि कृपा नित धारी ।।१।।

सब अपराध मोर का कहऊँ मूढ़ मलीन कुटिल कुविचारी ।

पाप निरत मति ध्यान न सपने मन कुविचार सकल अपकारी ।।२।।

साइ द्रोह करि-दसन ज्यों करनी ये गुण थाति हमारी ।

नहि कल्यान जतन नहि एको बिनु रघुनायक कृपा सुधारी ।।३।।

जानत प्रभु सब बिनहिं जनाए शील सिंधु अघ अवगुन हारी ।

समुझि निज ओर करैं सोई गति नहि कछु आन न को हितकारी ।।४।।

वेगि द्रवउ प्रभु राजीवलोचन जानकीजीवन पर उपकारी ।

संतोष के नाथ श्रीरघुनाथ वेगि हरौ दारुन दुख भारी ।।५।।

[१७७]

घट-घट के जाननहार तोसो काह गोई ।

आप तजे ठौर नहीं राखे और कोई ।।१।।

पाहि कहे राखे दीन शरन गहे जोई ।

बारक राम कहे कृपा वारि मोई ।।२।।

अघ-दोष कोष मोसे राखे भार ढोई ।

मोरे बेर ढ़ील किए विरद जनु खोई ।।३।।

राखिए या मारिए कीजिए सो होई ।

संतोष के आस विश्वास बल कीजै वेगि भावै जो सोई ।।४।।

[१७८]

समरथ सुशील सुजान सिरोमनि श्रीरघुनायक जन हितकारी ।

आस किए जो भी पद पंकज तेहिं बिगड़ी रघुनाथ सुधारी ।।१।।

दीन दया बस रीझत स्वामी यदपि न जप तप मख व्रतधारी ।

वानर-भालू को किए मीत पावन गीध शबरी वनचारी ।।२।।

सकृत प्रनाम किए जो रीझत मंगलमूल राम दुखहारी ।

संतोष नमामि सियावर राम गुनगन नाम जगत उपकारी ।।३।।

[१७९]

रघुनायक गुनगन उजियारे ।

पूजा जप तप व्रत बिनु रीझत दीन सदा रघुनाथ पियारे ।।१।।

ईश जगदीश को तदपि सरल अति परम विनीत दया चित धारे ।

दीनन को नहि वाम बताएँ रामायन वेद पुरान पुकारे ।।२।।

पाप सिरोमनि जदपि अजामिल सुत मिस नाम पुकारत तारे ।

गणिका खग करि शबरी आदिक करुनामूरति सकल उधारे ।।३।।

शरन गहे की भीर हरत प्रभु सकहिं न देखि प्रनत मन मारे ।

भाँग से तुलसी कियो तुलसीदासहिं तुलसी मानस आप उचारे ।।४।।

बिनु हित हितू राम दयामय असरन सरन सरन रखवारे ।

संतोष कुटिल क्यों फिरत सदा, तेहिं प्रभु को चित से तू उतारे ।।५।।

[१८०]

प्रभूजी तू गरीबनेवाज ।

मैं गरीब तू ठाकुर मेरे हाथ तुम्हारे लाज ।।१।।

वेद पुरान अरु संत कहैं प्रभु सुनत दीन अवाज ।

अग-जग स्वामी अंतर्यामी सारत भगत के काज ।।२।।

तुम सम नाथ दीन जन पालक होन चहत अकाज ।

मैं गुमराह कहौ सो राह चाहत नहि जगराज ।।३।।

तव पद प्रीति किए जग जीवन जाय अरु ठौर समाज ।

संतोष को प्रभु नहि और भरोसा सुधि लीजे रघुराज ।।४।।

[१८१]

हे हरि हारन जन दुख भारी ।

निज पन विरद हेतु जग स्वामी दीनन कोटि सुधारी ।।१।।

जन अपनाय कबहुँ नहि छाड़े सकल करवरे टारी ।

मीरा सूर तुलसी आदिक के कलिकालहुँ बात सवाँरी ।।२।।

ढ़ील भई प्रभु बेर हमारी बनै नहि और विसारी ।

मैं अति दीन हीन रघुनायक अघ अवगुन सब जारी ।।३।।

जन दुख निसा राम दिवाकर प्रगटउ विरद सँभारी ।

संतोष के नाथ आस विश्वास देखउ ओर हमारी ।।४।।

[१८२]

जाउँ कहाँ तजि पद रघुराई ।

को जग दीन मलीन को गाहक हेरि दई प्रभुताई ।।१।।

स्वारथ मीत सकल जग स्वामी हेरत बड़े बड़ाई ।

मोसे मंद मलिन मति को प्रभु और नहीं कोउ सहाई ।।२।।

सबबिधि हीन दीन जग जेते ठौर कहाँ जग साई ।

कृपावारीश तुम्हीं रघुनायक मान ठौर गति दाई ।।३।।

अघ दुख दोष ताप जरत जन कृपा वारि वर्षाई ।

संतोष के नाथ तुम्हीं रघुनाथ राखो हाथ उपाई ।।४।।

[१८३]

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल ! सहजकृपाल ! अग-जग के तू साई ।।१।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव हरि विधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।२।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोऊ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहु वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।३।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।४।।

[१८४]

हे राम प्रभूजी जग के स्वामी मैं अतिसय घबराया हूँ ।

दर-दर पे मैं भटक चुका नहि ठौर कहीं लखि पाया हूँ ।।१।।

तुम सबकी सुनने वाले हो सुनिके गुनग्राम लुभाया हूँ ।

सुनिके विरदावलि ही तेरी अब द्वार तेरे मैं आया हूँ ।।२।।

मुझको है दूजा ठौर नहीं दर-दर की ठोकर खाया हूँ ।

पशु-पक्षी की भी सुनने वाले भूले तुम भी भुलाया हूँ ।।३।।

अघ-दोष कोष मुझसे पोसे तुम सोच यही सरसाया हूँ ।

वानर भालू भी रखने वाले तुम सरिस तुम्हीं पुलकाया हूँ ।।४।।

अब मुझे निहारो करुनासागर क्यों देर किए अकुलाया हूँ ।

संतोष तू है मेरा कहिए तव चरन की आस लगाया हूँ ।।५।।

[१८५]   

हे अविनासी घट-घट वासी अति प्रबल देव तव माया है ।

हे रामचंद्र हे रामभद्र नहि महिमा को लखि पाया है ।।१।।

देवन के देव हे परमदेव अग-जग में तू ही समाया है ।

सब तेरा तुमसे है स्वामी जग तूने ही उपजाया है ।।२।।

देव दनुज व मनुज सभी चरणों में शीस झुकाया है ।

तृन-कुलिस कुलिस-तृन करने वाले बल तुमसे ही बल पाया है ।।३।।

हे तारन-तरन तुमने ही पाहन को भी तराया है ।

वानर-भालू निसचर को भी मंत्री व मीत बनाया है ।।४।।

निर्बल के बल संबल अवलंब सदग्रंथों ने बतलाया है ।

हे विश्व-भरन दुख-दोष हरन डूबते को पार लगाया है ।।५।।

गज-गीध की गति को याद करो हे नाथ गिरों को उठाया है ।

जग कहता दीनदयाल तुम्हें अरु वेदों ने भी गाया है ।।६।।

हे परम सरल मृदुलचित प्रभु जी नहि ठौर कोई न साया है ।

मैं तुझे पुकारूँ हे स्वामी नहि ध्यान मेरा क्यों आया है ।।७।।

मैं दोष-कोष हूँ जान रहा इससे ही मुझे भुलाया है ।

मुझसों को पाले-पोसे तव गुनगन ने ही बताया है ।।८।।

दीन-मलीनों को रघुवर ने कभी नहीं ठुकुराया है ।

देर किए फिर भी भगवन दीनन को सदा बसाया है ।।९।।

मन-मति मेरी पावन करके दीजे कर की छाया है ।

हे दयाभवन अब दया करो संतोष बहुत अकुलाया है ।।१०।।

[१८६]

कृपा अनुग्रह पद प्रीति की भीख चहौं व रहौं प्रभु शरन तुम्हारे ।

संबलहीन हूँ आस यही प्रभु असरन सरन के द्वार पुकारे ।।१।।

सबबिधिहीन मलीन व दीन तव कृपा दृष्टि की आस निहारे ।

दीनदयाल शरनागत पाल, तुम बिनु प्रभु कोउ मोहिं उबारे ।।२।।

निज पन सुमिर रखो प्रभु मो कहुँ आरत दीन के राखनहारे ।

दीनानाथ एक गति स्वामी छमि अवगुन अघ दोष हमारे ।।३।।

राखो रहूँ प्रभु आरतपाल मोर भलो नहि और बिसारे ।

संतोष के नाथ तुम्हीं रघुनाथ सोचविमोचन क्यों सोचें विचारें ।।४।।
[१८७]
राम सिवा को मोहि उबारे ।
सुर सदग्रंथ साधु सब गावत गुन गन जग उजियारे ।।१।।
सरलता दया करुना की मूरति बारक राम उचारे ।
पतित उधारे राम दयानिधि कितनों के दुख हारे ।।२।।
निरास उदास गजराज पुकारे पल में सब दुख टारे ।
दीन मलीन के राम सहायक एक गति राम हमारे ।।३।।
जनसुखदायक श्रीरघुनायक बिनु को मोहि निहारे ।
सुमुख सुलोचन सब दुख मोचन एक बल राम हमारे ।।४।।
रहूँ नाथ रघुनाथ सदा प्रनत अभाग अघ जारे ।
संतोष सुधि कीजै राम करुनाकर बिना अब और बिसारे ।।५।।

[१८८]

सुर नर मुनि अरु वेद सभी राम प्रभू गुन गावत हैं ।

अग-जग नायक राम प्रभू को दीन को बंधु बतावत हैं ।।१।।

दीन संतोष गुने सुख पावत अरु मन को समुझावत है ।

राम सो नेह निबाहनहार न नाते बड़े यहू भावत है ।।२।।

वानर-भालू के राखनहार को भैया कहिके बुलावत है ।

दीनदयाल बड़े कृपालु लोकहुँ नेह निभावत है ।।३।।

[१८९]

राम रघुवर नाम गुन को सहारौ ।

मोसे दीन हीन जग और का अधारौ ।।१।।

स्वारथ सने नाते नहि नित का सुधारौं ।

याते कहौं काहि निज और कोउ हमारौ ।।२।।

वेद पुरान ग्रंथ बड़ौ उजियारौ ।

बड़े सुजान हित मोसे न बिचारौं ।।३।।

तुलसीदास मानस गुरू बड़ो उपकारौ ।

पत्रिका को देखि पढ़ि सुख न सँभारौं  ।।४।।

मानस जी देत दीन सहज किनारौ ।

मोसे मतिहीन मानस हरै अधियारौ ।।५।।

अनुहरे मिटय दुख दोष व विकारौ ।

मानस जो कहे अनुभये बहु बारौ ।।६।।

पवनतनय सुधि लेउ, और न बिसारौ ।

राम पद कंज चहौं, मोहूँ निहारौ ।।७।।

गुरू को सिखावन राम दीन राखनहारौ ।

दीन संतोष राम राखे ही गुजारौ ।।८।।

[१९०]

कब अइहो राम मोरे हमरी दुअरियाँ ।

तेरे ही सहारे रहूँ देखूँ तेरी ओरियाँ ।।१।।

माया बश भूला फिरूँ लेउ तूँ खबरिया ।

जन की खबर लेत जानै सारी दुनिया ।।२।।

वन के बहाने गए हेरि-हेरि कुटिया ।

तारे मिले दयाधाम ऐसी तोरि रितिया ।।३।।

असरन सरन होत बेर मोरी बेरियाँ ।

संतोष हमारो बनै देखूँ जब चरनिया ।।४।।

[१९१]

ऐसो भगवान कहाँ ।

दीन मलीन जाहिं मन भावत ऐसो श्रीमान कहाँ ।।१।।

दीनन दीनता देखि जो द्रवै ऐसो दयावान कहाँ ।

छमि अघ सरन गहे जो राखत ऐसो छ्मावान कहाँ ।।२।।
सब कुछ देये कुछ नहीं लेये ऐसो धनवान कहाँ ।

सुर नर मुनि जेहिं गुनगन गावत ऐसो गुनवान कहाँ ।।३।।

हित अनहित सबकर हित ताके ऐसो हितवान कहाँ ।

जासु महाछवि जग मन मोहै ऐसो छविवान कहाँ ।।४।।

सरल स्वभाव विनय बल आगर ऐसो बलवान कहाँ ।

भगत के खातिर बन-बन डोलै ऐसो करुनाखानि कहाँ ।।५।।

गीध को पितु भिलनी मातु बुलाये ऐसो महान कहाँ ।

वानर भालू गीध निसाचर को सनमान कहाँ ।।६।।

साधु सभा जन रज गुन भाखत ऐसो बखान कहाँ ।

प्रेम भगति बस पाये रूखो-सूखो ऐसो तृप्तमान कहाँ ।।७।।

धरम स्वरूप जासु श्रुति गावत ऐसो धर्मवान कहाँ ।

शील नेम व्रत जगत उजागर पुरुष पुरान कहाँ ।।८।।

हरि हर विधि जो सबको बिधाता ऐसो महिमावान कहाँ ।

संतोष के राम आन नहि दूजो राम समान कहाँ ।।९।।

[१९२]

ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

भक्ति-भाव न मेरे, भाव कहाँ से पाऊँ ।।१।।

गुन हैं एक न मेरे, गुन मैं कहाँ से लाऊँ ।

करम शुभाशुभ घेरे, कैसे इन्हें भगाऊँ ।।२।।

पाप बुद्धि है मेरी कैसे स्वच्छ बनाऊँ ।

मन चंचल है मेरा कैसे इसे टिकाऊँ ।।३।।

दशरथ सी आसक्ति प्रभू जी मैं कैसे उपजाऊँ ।

मातु कौशल्या जैसे प्रभुजी कैसे लाड लडाऊँ ।।४।।

लक्ष्मण जैसा भाव समर्पण पामर कर न सकाऊँ ।

त्याग भरत सा नेह चरण में कैसे नाथ लगाऊँ ।।५।।

रिपुहन जैसी प्रीति सादगी रघुवर कहाँ से लाऊँ ।

सीता जैसे जीवन अपना कैसे तुम्हें बनाऊँ ।।६।।

केवट सा अनुराग नाथ मैं कैसे हिय जगाऊँ ।

जटायु जैसी भाग प्रभूजी कैसे भाग लिखाऊँ ।।७।।

शबरी सा विश्वास भगति नव कैसे मैं उपजाऊँ ।

हनुमत जैसे राम लखन सिय कैसे हिय बसाऊँ ।।८।।

भोले शंकर जैसे मन को कैसे राम रमाऊँ ।

गुरवर जैसा ध्यान प्रभू बिनु ज्ञान कहाँ से लाऊँ ।।९।।

करनी अपनी समुझि-समुझि प्रभु मैं तो लाज लजाऊँ ।

जनमि-जनमि बहु दूर हुए हम पास में कैसे आऊँ ।।१०।।

जैसे-तैसे जो भी बनता गुन तेरे ही गाऊँ ।

संतोष समुझि गुनगन की करनी विरद ते आस लगाऊँ ।।११।।

[१९३]

स्वामी मेरे राम स्वामिनी सीता माता ।

परमसरल आरतपाल बड़े दाता ।।१।।

राम दिए खाए जग राम दिए पाता ।

ध्याये जग राम को राम गुन गाता ।।२।।

अग-जग ईश हर विधिहुँ के बिधाता ।

शिव मन मधुकर चरन जलजाता ।।३।।

दीन मतिहीन जिसे जग ठुकुराता ।

पूछे नहीं बात कोई मुँह फेर जाता ।।४।।

राम दयाधाम के मन वो भी भाता ।

दीनानाथ पाहि कहि नयन जल लाता ।।५।।

तुम्हीं नाथ मेरे कहि जो बताता ।

सुनैं सीतानाथ सारी जो भी सुनाता ।।६।।

समय जाए होता क्या चाहे पछिताता ।

समय रहे मन काहे नेह न लगाता ।।७।।

राम बिना भूँखा अन बीच न अघाता ।

राम जी से नेह कर कौन घबराता ।।८।।

सुनि गुन राम जेहि मन न लुभाता ।

अचरज कहाँ जो फिरे रिरियाता ।।९।।

मणि आए हाथ कण जानि जो बहाता ।

जग जाए राम संग मन नहीं राता ।।१०।।

पानी संग दूध के मोल ज्यों बिकाता ।

राम नाम संग त्यों अघी तर जाता ।।११।।

नाम मणि धातु जन कनक बनाता ।

प्रगट प्रभाव जग भूला न दिखाता ।।१२।।

खाए फिरे सब जग काल धरि खाता ।

संतोष जान जीवन राम संग नाता ।।१३।।

[१९४]

राम दयाधाम सुनो हम जो बताते ।

जथा मति नाथ मोरे गुनगन गाते ।।१।।

पाहन फोरि प्रहलाद न बचाते ।

कण-कण में बसे काहे कहे जाते ।।२।।

गज के पुकारे वाहन छोड़ि जो न धाते ।

बिपति पड़े जन काहे को बुलाते ।।३।।

अम्बरीष के खातिर जो चक्र न पठाते ।

अभय की आस जन काहे को लगाते ।।४।।

शबरी के बेर विदुर साग जो न खाते ।

प्रेम के ही भूंखे राम काहे कहलाते ।।५।।

द्रुपदसुता की जो चीर न बढ़ाते ।

कहते क्यों लोग जन लाज हो बचाते ।।६।।

सुग्रीव बिभीषण आदिक गले न लगाते ।

असरन-सरन दीनानाथ क्यों कहाते ।।७।।

केवट से जो निज पाँव न धुलाते ।

चरणों के रज की आस न लगाते ।।८।।

वन-वन खोजि जन ठाँव जो न जाते ।

कहते क्यों लोग राम जन सुधि लाते ।।९।।

वानर भालु को जो सखा न बनाते ।

कहते क्यों लोग राम गिरे को उठाते ।।१०।।

गीध को तात शवरी मातु न बुलाते ।

कहते क्यों लोग सादर दीन अपनाते ।।११।।

भक्तों के अपने जो मान न बढ़ाते ।

परमसरल सेवकपाल क्यों कहाते ।।१२।।

अहिल्यादि को जो पुनीत न बनाते ।

पतितपावन जन नाम क्यों धराते ।।१३।।

पाहन को ज्यों जलजान न तराते ।

कहते क्यों लोग गुनी गुनहीन को बनाते ।।१४।।

दीन दाहिने जो न उजरे बसाते ।

कहते क्यों लोग राम हारे को जिताते ।।१५।।

गहि बाँह दीनों की जो नेह न निभाते ।

दीनबंधु दीनों के सनेही क्यों कहाते ।।१६।।

पतितों से जो तुम मुँह फेर जाते ।

मोसे दोष-कोष अघी कहीं न समाते ।।१७।।

सुनते न दीनों की जो उन्हें ठुकुराते ।

मोसे दीन-मतिहीन किसको सुनाते ।।१८।।

गुनगन नाथ जेते कहे न सिराते ।

तुम सम तुम जानि जन पुलकाते ।।१९।।

सबबिधि हीन दीन विरद बल पाते ।

संतोष चित करौ राम वेगि बहु नाते ।।२०।।

[१९५]

राम दयाधाम सुनत सबकी, कबहूँ वो मेरी भी सुनैंगे ।

दीनदयाल शरनागतपाल, कबहूँ मेरी बाँह गहैंगे ।।१।।

रामकृपा से मोरे भी, सारे अघ दुख दोष दहैंगे ।

कबहूँ करुनामय करि करुना, मम सिर निज कर कंज रखैंगे ।।२।।

मेरे हिये में भी कबहूँ, अनुज सहित सिया राम बसैंगे ।

संतोष भी है मेरा कबहूँ, राम बड़े कृपाल कहैंगे ।।३।।

[१९६]

हमें तो है सियावर राम का सहारा ।

सुर मुनि गुन गाए जिनका जग सारा ।।१।।

शवरी गीध जटायु जिसने तारा ।

बन-बन हेरि जन जिसने सँभारा ।।२।।

हर कोई जिनके आगे हाथ है पसारा ।

अघ-दोष-कोस जिसने सहज उधारा ।।३।।

जिसने भी आर्त होके राम को पुकारा ।

दीनबंधु दीनानाथ उसको उबारा ।।४।।

राम जी का रूप लगे हमें अति प्यारा ।

जेहिं पद रज मन चाहे हमारा ।।५।।

जेहिं ध्याये जग गुन गन उजियारा ।

जासु नाम रवि मेटे जग अधियारा ।।६।।

प्रनत अभाग दोष दुख जिसने जारा ।

सरल सबल जो अनघ उदारा ।।७।।

राम को पियारे दीन वेद है पुकारा ।

दीनन की सुधि लेत लेंगे भी हमारा ।।८।।

जेहि भजे भगति न रति संसारा ।

संतोष भजु राम तजि बिषय विकारा ।।९।।

[१९७]

केहि विधि मोर बनै रघुराई ।
साधनहीन दीन मैं स्वामी जानत नहि चतुराई ।।१।।
साधनयुत के सब कोई गाहक कोटिक मिलैं सहाई ।
मोरे एक तुम्हीं रघुनायक जानौ सब न झुठाई ।।२।।
असहाय सहायक राम प्रभू तुम रीति सदा चलि आई ।
संतोष की बनय प्रभु तोहिं बनाए और नहीं को उपाई ।।३।।
[१९८]
बिनु प्रभु कृपा न बनिहैं बात ।
साधन हीन भजन नहिं जानौं गुन नहि एक दिखात ।।१।।
ज्ञान विराग भगति नहि मोरे अवगुन कहे न सिरात ।
दुखप्रद बिषय कुमारग जेते मन तेहिं देखि लुभात ।।२।।
प्रभु पद प्रीति किए बिनु जीवन दिन प्रति जात नसात ।
संतोष बिना प्रभु राम कृपा नहिं मारग एक बुझात ।।३।।

[१९९]
जौ सुनिहौ न राम मोर सुनेगा कवन ।
दीन को भाई पितु-माई दुख हरन ।।१।।
सुनेंउ गुनग्राम राम दया को भवन ।
प्रीति पुनीत रीति दीन को शरन ।।२।।
करुनानिधान शील कहै को वरन ।
अघ-दोष-कोष राखि धाम को भरन ।।३।।
निज ओर देखि कहौं नहीं को जतन ।
कृपा सो भलो नाथ कृपा बिनु पतन ।।४।।
दीन मलीन राखै बोलै को बचन ।
तेरी बाँह बसि आए ऐसो चलन ।।५।।
सबबिधिहीन जानि कृपा को सदन ।
राजिवनयन देखे जाये, जिय की जरन ।।६।।
जानि मानि कहौं मोहिं राम को चरन ।
संतोष कहौ लीन्हेउ तुमहूँ शरन ।।७।।

[२००]

मोसे दीन मलीन को गाहक नहि कोउ और दिखाए ।

कूर कपूत नहीं कछु लायक उन्हहूँ राम अपनाए ।।१।।

नहि को मानै नहि को जानै राम सो आस लगाए ।

मैं रघुवर को रघुवर मेरे कहि मन कछु सचु पाए ।।२।।

तुलसीदास मानस गुर सिखये गुन गन कहि समुझाए ।

दीन सगे तजे नहि कबहूँ कहि निज उर ते लगाए ।।३।।

कहाँ मैं जाऊँ काह बताऊँ प्रभु तुम्हरे बिसराए ।

जग में रहौं कहौं जग स्वामी नहि बल बसे बसाए ।।४।।

बहु जन गावैं नाम गिनावैं बहु पहिचान बतावैं ।

जानत छूछे बात न पूछैं खलजन कछुक सतावैं ।।५।।

जान पहिचान जगत का करिये मन नहि लखत लखाए ।

यह जग जाल बड़ा जंजाल बाढ़त और बढ़ाए ।।६।।

जान पहिचान बनय रघुवर सो जग जीवन फल पावौं ।

दीन संतोष राम निज जानैं फिरि न बहुरि पछितावौं ।।७।।

[२०१]

राम रघुवर रघुनाथ निज विरद सँभारो ।

दीनबंधु दीनानाथ गुनगन चित धारो ।।१।।

पाहन खग केवट किए पावन कोल भील वनचारो ।

वानर भालु दीन जग जानै कियो जगत सो न्यारो ।।२।।

दीन मलीन अघी अघ नाना जानत नहि व्यवहारो ।

साधु संत सदग्रंथ बतावैं सहजहिं दिहेउ किनारो ।।३।।

शील स्वभाव बिबस गति दीन्हेउ केहि नहि आप बिचारो ।

दीन संतोष ओर अब देखउ कहि निज राम पुकारो ।।४।।

[२०२]

ओ रघुवर रघुनाथ गुनगन जग उजियारे ।

तुलसीदास मानस गुर सिखये राम को दीन पियारे ।।१।।

केहि नहि रखे कहे नहि आपन दीन देखि नहि टारे ।

कोल किरात भील खग भालू वानर आदि भी तारे ।।२।।

सहज सनेह दीन सो स्वामी कब देखे मन मारे ।

करत प्रनाम बतावत दीन केहि नहि आप निहारे ।।३।।

दीन संतोष एक गति तुम ही सब कुछ हाथ तुम्हारे ।

कृपा वारि बिनु धान जन सूखत बनय नहि और बिसारे ।।४।।

[२०३]

ओ रघुनन्दन राम जानत तदपि जनावौं ।

तुम बिनु और नहीं रघुनाथ कहि निज जाहिं बतावौं ।।१।।

दीनबंधु नहि और सुनैया याते तुम्हहिं सुनावौं ।

सबबिधि हीन मलीन के गाहक मोहि जनि नाथ भुलावौ ।।२।।

दीन मलीन गुनहीन सनेही सुनि गुन गुनि बल पावौं ।

नहि निज बल नहि संबल कोई नहि कहुँ मोर गिनावौं ।।३।।

आस विश्वास एक बल तुमसे गुन तेरे ही गावौं ।

दीन संतोष तभी परितोष निज कहि राम जनावौ ।।४।।

[२०४]

राम दयाधाम कब शरन लगाओगे ।

सब बिधि जोग अपने नाथ कब बनाओगे ।।१।।

काम क्रोध राग द्वेष भेद-बुधि नसाओगे ।

अघ ओघ दोष तम घेरे कब मिटाओगे ।।२।।

कृपा दिनेश नाथ कब प्रगटाओगे ।

पढ़े सुने कहे जो साँची कर दिखाओगे ।।३।।

मति बासन देखि कपट कलई कब छुड़ाओगे ।

साँची प्रीति पद कमल कब उपजाओगे ।।४।।

बालपने चितए मोहि नेह सो निभाओगे ।

प्रीति रूचि दिए मानस नेह न घटाओगे ।।५।।

जाने नहीं माने और जानि निज बराओगे ।

आस विश्वास लिए मन न गिराओगे ।।६।।

भटकि थके नाथ नहि भटकाओगे ।

गिरे जानि दीन निज हाथ सो उठाओगे ।।७।।

मोरे अघ दोष देखि नहि सकुचाओगे ।

बीच समाज राखि कंज कर उठाओगे ।।८।।

विरद की रीति प्रीति दीन सो दिखाओगे ।

दीन संतोष बल और भी बढ़ाओगे ।।९।।

[२०५]
मैं राम के द्वार भिखारी ।
सरल समर्थ साहिब रघुराज गुनगन कहत हँकारी ।।१।।
सहजकृपाल पुनि दीनदयाल याते ठाढ़ दुआरी ।
बिनु माँगे मिलै जेहि द्वार तहाँ मैं खड़ा नयन लिए वारी ।।२।।
प्रगट जग बानि बड़े दिन दानि दीनन सदा सुधारी ।
पवन को पूत बड़ी करतूत दीन राम सरिस हितकारी ।।३।।
भरत लखन रिपुसूदन, करुनामयी महतारी  ।
सुधि कहिए नाथ सो वेगिंह बलि जाऊँ सहज उपकारी ।।४।।
दीनबंधु रघुनाथ कृपानिधि गुनगन विरद सँभारी  ।
संतोष को दुख तम राम दिवाकर प्रगटउ अघ-दोष के मेघ बिदारी ।।५।।
[२०६]

राम दयाधाम को सुनाएँ ।

कासे कहें क्या हम कहाँ लगि गाएँ ।।१।।

दूजा कौन सुनैं तो का बनि जाए ।

जानैं रघुनाथ मेरे बिना ही जनाए ।।२।।

करुना क्षमा सागर रखैं कब तक भुलाए ।

दयासागर को ही मुझपे दया जो न आए ।।३।।

दीन हीन जाएँ कहाँ हँसैं सब हँसाएँ ।

कहें रघुवीर से तो आँखे भरि आएँ ।।४।।

करुनामय को करुना कभी आ ही जाए ।

संतोष बनय केवल राम के बनाए ।।५।।

[२०७]

राम दीनबंधु तातु-मातु भई बड़ बेरा ।

सब दूर तुहीं नाथ सदा आरत नेरा ।।१।।

सदा दीन दाहिने मुँह नहीं फेरा ।

बल विश्वास तव और नहीं मेरा ।।२।।

जन दुख निशा को नाम रवि तेरा ।

निशा जाए संतोष कृपा ही सवेरा ।।३।।

[२०८]

दोषों का खजाना बहोत पापी मैं माना ।

पतितों को पावन करनें का वाना ।।१।।

गुन-गन उजियारे नाथ कौन नहीं जाना ।

चरन तजि मुझे स्वामी नहीं एक ठिकाना ।।२।।

होके सोचविमोचन मम हित सोच ठाना  ।

रामदयाधाम दया अब तो दिखाना ।।३।।

संतोष कहै नाथ मत देर लगाओ  ।

मैं तो खुद भूला स्वामी मुझे न भुलाओ ।।४।।

[२०९]

दोष अवगुन घनेरे ।

सदगुण नहीं एक कलि अवषाद घेरे ।।१।।

कबहुँ न नाथ रघुनाथ तुम प्रनत दोष हेरे ।

दीनदयाल कृपाल फिर आज मम बेरे ।।२।।

जाउँ कहाँ कहौं  केहिं सुनै कौन टेरे ।

कहौं सतिभाय पतियाय नाथ बिना अब देरे ।।३।।

नहीं दूजा सहारा एक बल आस तेरे ।

रहूँ नाथ करो चित कहि संतोष मेरे ।।४।।

[२१०]

कितनों अधम उधारे कभी कुछ न बिचारे ।

गीध पाहन भी तारे भाग सबके सवाँरे ।।१।।

दीन जब-जब पुकारे धीर तूने न धारे ।

दीन दुखियों के सारे दुख तू हीं निवारे ।।२।।

आज बार हमारे अघ-अवगुन बिचारें ।

जब तू हीं बिसारे कौन मुझको निहारे ।।३।।

रहे मन मारे होके शरन तुम्हारे ।

देखा ना सुना जानौ का कहे ही हमारे ।।४।।

रामदयाधाम रहूँ तेरे ही सहारे ।

संतोष तजि आस सबकी राम को पुकारे ।।५।।
[२११]
प्रभु तुमको ही ध्याये सारा जग गुन गाए ।
स्वामी विरद लुभाए हमें पास बुलाए ।।१।।
चरन तजि ठौर नहीं कहाँ हम जाएँ ।
सबकी बनत बनैं तेरे ही बनाए ।।२।।
मति गुन नाथ नहीं कहाँ लगि सुनाएँ ।
जानौ रघुनाथ का मेरे ही जनाए ।।३।।
आस लिए देखौं नाथ बाल जिमि माएँ ।
संतोष की भलाई नहीं नाथ तव भुलाए ।।४।।
 [२१२]

लिखत विनय पद जब मन लाए ।

जानत-सुनत क्या मोहि रघुनाथ सपना एक अनूप दिखाए ।।१।।

आवत दिखे ब्योम-मारग ते उमा समेत उमा पति भाए ।

ब्याल बिशाल देखि मन सहमउ जानि उमापति बेष दुराए ।।२।।

करि प्रनाम कर जोरि कहेंउ सोइ, सब जानत रघुनाथ बताए ।

होइहैं तोर कामना पूरण कहि शिवशंकर मोहि समुझाए ।।३।।

नीच संतोष काम भए पूरण भगति–दरश हित नहि कहि पाए ।

सोचत गुनत सपन सोइ सुंदर राघव अजहूँ मन हर्षाए ।।४।।
[२१३]
कहँउ सतिभाय नाथ सदगुन नहि हेरे ।
जप तप साधन ऐकौ नाहीं मन मानय हम तेरे ।।१।।
निज करनी से नहि कछु आसा नेक शंक नहि घेरे ।
विरद स्वभाव शील गुन तव प्रभु, हैं कारन यहि केरे ।।२।।
बारक राम कहत तुम तारे शरनागत नहि फेरे ।
करुनासागर जन हित आगर दीनन को अति नेरे ।।३।।
दीन मलीन के नहि कोई गाहक सदा सुनत तुम टेरे ।

राखौ आन लाज रघुनाथ कहि संतोष भी मेरे ।।४।।

[२१४]

राम रघुनाथ कब दरश दिखाओगे ।

मोसे दीन हीन पतित को भी अपनाओगे ।।१।।

हेरि-हेरि मिले दीन मोरे ढिंग भी आओगे ।

मैं तो खुद भूला स्वामी और न भुलाओगे ।।२।।

मोह निशा सोए हम बोलि कब जगाओगे ।

करुनानिधान ! देखो आए हम बुलाओगे ।।३।।

युग-युग की रीति प्रतीति सो निभाओगे ।

महाधम मोसे राम गले से लगाओगे ।।४।।

राखे जहाँ कोटि खल खेरे सो बसाओगे ।

दीन-हीन टारे नहीं तारे ही जनाओगे ।।५।।

यासे दोष कोष पाले टाले न कहाओगे ।

निज पन लागि मोहूँ अपना बनाओगे ।।६।।

महाखल जानि संतोष जो दुराओगे ।

साधु सदग्रंथ वेद कहे को लजाओगे ।।७।।

 [२१५]

प्रभूजी मोरे अवगुन चित न धरौ ।

मैं कपटी कुटिल मंद खल कामी मन मति विमल करौ ।।१।।

मैं क्रोधी द्रोही दम्भी गुमानी समस्त विकार हरौ ।

मन अतिसय कुतर्की संकित चंचल एकौ गुन न खरौ ।।२।।

मोह अग्यान पापरत स्वामी तव माया बस मैं फिरौं ।

सेवक सुखद शील गुन सागर सब दुख दोष हरौ ।।३।।

बूड़त जन प्रभु तोहिं पुकारै कर गहि पार करौ ।

दीनबंधु दुखहरन दयानिधि संतोष पे दया करौ ।।४।।

   [२१६]

सुनौ राम रघुनाथ रघुवंश हीरे हो ।

तुम बिनु रहौं नाथ बल केहि केरे हो ।।१।।

दीन मलीन से जग नाता तोरे हो ।

दूजा नहीं नाथ कोई तुम्हीं एक मेरे हो ।।२।।

कहउँ सीतानाथ मैं दुहुँ कर जोरे हो ।

गाएँ कोई गान जो गुनगन तेरे हों ।।३।।

सदा तेरा ध्यान ही साँझ सवेरे हो ।

सिरपे तेरा हाँथ रहे जीहा राम टेरे हो ।।४।।

पद कंज प्रीति रहे दुर्मति न घेरे हो ।

चाहौं और नाथ क्या तव कृपा घनेरे हो ।।५।।

छूटे नहीं साथ तेरा चाहे बहु फेरे हों ।

रहे संतोष कहीं सदा आप नेरे हों ।।६।।

[२१७]

जगत रचयिता जग के स्वामी जग के पालनहार ।

केहि विधि प्रभु मैं तोहिं रिझाओं जानत नहि व्यवहार ।।१।।

दीनदयाल तू भाव से तोषत कोमलचित है तुम्हार ।

कृपासदन अखिलेश दयानिधि दीनन के रखवार ।।२।।

करुनानिधि मैं तोहिं पुकारूँ सुनि लीजै अरज हमार ।

विनयमाल विनयावली प्रभु असरन-सरन उदार  ।।३।।

अघ अवगुन छमि नाथ हमारे करि लीजे स्वीकार ।

क्रोधी कामी मैं अज्ञानी श्रीरामचरन उपचार ।।४।।

दारुन दीनता देखि द्रवउ प्रभु करि लीजे अंगीकार ।

कोटिक दीन उधारेउ स्वामी अब संतोष की बार ।।५।।

[२१८]

पतितपावन नाम राम साँची करौ ।

पूजा जप तप व्रत नियम विहीन, सबबिधिहीन मोहूँ उद्धरौ ।।१।।

वेद व्याकरण कवित-गुनहीन, अतिदीन जानि विरद निज अनुसरौ ।

विनयावली जस-तस विनयपद, माल प्रभु निज उर धरौ ।।२।।

जेहि गुन उधारे तारे महाखल, करुनानिधान सोइ गुन अनुकरौ ।

पतित संतोष पतित जन सनमानेउ सदा, मोहि लगि रीति सोइ न परिहरौ ।।३।।



।। श्रीसीतारामार्पणमस्तु  ।।


।। सियावर रामचंद्र की जय ।।


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।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु मान बड़ाई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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