एको देवो रामचंद्रो...

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।

सठ सेवक की प्रीति रूचि रखिहहिं राम कृपालु

सठ सेवक की प्रीति रूचि रखिहहिं राम कृपालु । उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ।। श्रीरामचरितमानस ।।

रविवार, 6 अगस्त 2017

विनयावली (११०-१६०)

।। श्रीसीतारामाभ्यां  नमः।।


[११०]
राम कृपालु सुनहुँ मम विनती मो कहुँ नाथ करौ निज चेरे ।
कोह मोह अग्यान कुटिलता मुझको नाथ रहत नित घेरे ।।१।।
जो हौं सो रघुनाथ तुम्हारे अवगुन बहु प्रभु गुन नहि हेरे ।
आरत दीन मलीन पियारे तुम कहुँ नाथ कहत श्रुति टेरे ।।२।।
सोचनिवारन जन दुख टारन आयँउ नाथ शरन मैं तेरे ।
संतोष से कुटिल मलिन मति को करि कृपा राम कहौ मेरे ।।३।।
[१११]
तुम बिनु राम कृपाल कोउ दूजो मेरी दीन दशा सुनिहैं ।
मोसे मंद मलिनमति के श्रीराम सिवा कोउ दुख हरिहैं ।।१।।
प्रनतपाल सहजकृपाल रीझत तव हमरौ बनिहैं ।
आरत दीन मलीन के गाहक मोरहुँ बाहँ प्रभु गहिहैं ।।२।।
आस विश्वास यहै मन माहीं दीनदयाल दया करिहैं ।
रघुनाथ अनाथ के नाथ संतोष तुमहूँ को अपना कहिहैं ।।३।।
[११२]
केहि विधि होय सुधार ।
राजिवनयन सिवा नहि कोई जो सके मोहिं उबार ।।१।।
रघुनायक कृपा नहि दूजो सकल रोग उपचार ।
दीनदयाल सहजकृपाल करुणा दया क्षमा आगार ।।२।।
परमसरल कोमलचित जो प्रभु, आरत दुख नहि सकत निहार ।
प्रीति पुनीत प्रनत हित रीति जो प्रभु परम उदार ।।३।।
धीर धरम धुर जो करुनाकर होत अधीर सुनि करुण पुकार ।
सुरतरु सरिस दास को रघुवर जो अभिमत दातार ।।४।।
करत प्रनाम बतावत दीन पाहि कहत टारत दुख भार ।
आरतपाल अनाथ के नाथ बल संबल अवलंब हमार ।।५।।
गुनगन पन जेहि जग उजियारे आज हमारी बार ।
संतोष करत सोइ सोच विमोचन मम हित सोच बिचार ।।६।।
[११३]
राजीवबिलोचन राम प्रभू संकट दुर्घट सोच कटैया ।
आरतपाल अनाथ के नाथ शरण गहे की लाज रखैया ।।१।।
मोर सुधारो जानकीजीवन शबरी, गीध उद्धार करैया ।
विरद सँभारो श्रीरघुनायक तोहिं पुकारौं दससीस दमैया ।।२।।
तुम्हीं रघुनाथ नहीं को दूजो मोरे दारुन दुख हरैया ।
तुम बिनु राम कृपाल नहीं संतोष को कोई अवलंब देवैया ।।३।।
[११४]
पंकजलोचन सोचविमोचन राम प्रभू जग नाव खेवैया ।
समर्थ उदार सहजकृपाल भक्तन के दुख दोष दलैया ।।२।।
मंगलमूरति श्यामलसूरति महादेव उर धाम बसैया ।
मोरे सर्वस दीनदयाल तू स्वामि सखा गुर बाप व मैया ।।२।।
डूबत नाव मझधार हमारी सीतारमन तुहीं पार लगैया ।
संतोष से दीन मलीन के ऊपर रघुनाथ तुम्हीं एक हाथ रखैया ।।३।।
[११५]

राम करुनामय दीनदयाल । सुमुख सुलोचन आरतपाल ।।१।।

परम सुशील सहजकृपाल । पाहि कहत मेटत दुख जाल ।।२।।

शोभा अनुपम अमित अपार । देखत मिटय कोटि मद मार ।।३।।

सेवत सुलभ अभिमत दातार । पालत पोषत जग आधार ।।४।।

दो आखर का प्रभु तव नाम । सुमिरत सुलभ सरिस तरु काम ।।५।।

कोमलचित अति सरल स्वभाव । शील सकोच सिंधु जग राव ।।६।।

गावैं तू तेरे कहि गुन जन । उल्टा नाम कहेउ रीझत मन ।।७।।

प्रणाम करेउ सकुचत प्रभु मन । असहाय सहायक प्रनत हित पन ।।८।।

अविगत अलख अनादि जगरूप । सुनावत सकुचत सहज सरूप ।।९।।

कपि केवट खग निसचर मीत । सुनत हर्षयुत परम विनीत ।।१०।।

निरास उदास नहीं जेहिं आस । राखत राम दया करि पास ।।११।।

संतोष के आन मान विश्वास । राम दयानिधि जगत सुपास ।।१२।।

[११६]

हे राम प्रभूजी जग विश्राम । विश्व उजागर तव गुन ग्राम ।।१।।

परम सरल समरथ सुख धाम । दीन सहायक पूरण काम ।।२।।

निज मति जन करते गुन गान । करुणा शील वश्य सनमान ।।३।।

जदपि अगोचर अगम अनादि । बंदित निगम शंभु ब्रह्मादि ।।४।।

जगताश्रय प्रभु जगतनिवास । मोरे बल संबल बिश्वास ।।५।।

विनय प्रभु जी धरि महि माथ । अवगुन दोष छमँहु रघुनाथ ।।६।।

मोरे सर्वस सीतानाथ । सिरपे रख दो प्रभु जी हाथ ।।७।।

असरन सरन प्रभु दयानिधान । जग जल विबस कृपा जलजान ।।८।।

अघ अवगुन दुर्मति अग्यान । हरौ देउ प्रभु निर्मल ज्ञान ।।९।।

तुलसीदास गुरू मानस नाम । चौथे पुनि तुमहीं श्रीराम ।।१०।।

पवन-सुवन अरु छठे विनयजी । कृपा अनुग्रह जानि धरे जी ।।११।।

दीन मलीन नहीं कछु ज्ञान । जथामति विनय करँउ गुनगान ।।१२।।

अविनय छमहुँ प्रभु जानि अजान । संतोष शरन राखौ भगवान ।।१३।।

 [११७]

जानकीजीवन जन तरु काम । दीनदयाल महाछविधाम ।।१।।

सुमुख सुलोचन जगअभिराम । दीन मलीनों को नहि वाम ।।२।।

तुम सम तुम नहि दूजा राम । भवभयमोचन तुम सुखधाम ।।३।।

सोचविमोचन प्रभु तव नाम । राम नाम प्रभु जग आराम ।।४।।

भटकत जन प्रभु लगे विराम । जगपालक जग के विश्राम ।।५।।

कृपादृष्टि कीजै श्रीराम । आरतपाल सियावर राम ।।६।।

शरन चरन रति देहु राम । द्रवउ राघव पूरणकाम ।।७।।

रघुवंश रवी तू दयाधाम । संतोष पुकारे राम राम ।।८।।

[११८]

दीन मलीन बाँह गहि राखत अभय करैं प्रभु राम हमारे ।

रीति सदा है दीन को आदर सियाराम दरबार तुम्हारे ।।१।।

खाली हाथ गयो नहि कोई जो भी पुकारा आप दुआरे ।

याचक नाते निराश कियो नहि रावन से खल के भी पुकारे ।।२।।

याचना करि जेहि द्वार पे होहिं याचक वृंद अजाचक सारे ।

संतोष पुकारि रहा सियाराम आज उसी दरबार दुआरे ।।३।।

[११९]

कृपासागर त्रैलोक उजागर त्रिबिधि ताप अरु पाप कटैया ।

आरतबन्धु दया सुखसिंधु जन के पन अरु प्रेम रखैया ।।१।।

सुर मुनि रंजन जन दुख भंजन दारुन बिपति को मेट सकैया ।

जगअभिराम महाछबिधाम समर्थ उदार धुर धर्म धरैया ।।२।।

राम भजे बिनु क्या जग जीवन दीनदयाल भव पार करैया ।

संतोष के नाथ श्रीरघुनाथ दीन अनाथ के बाँह गहैया ।।३।।

[१२०]

राम कृपानिधि दानि शिरोमनि तव दिए नाथ मिलत सबहीं ।

सबरी गीध सुग्रीव बिभीषन सब भए पूरणकाम सही ।।१।।

प्रनतपाल परमकृपाल तव पन जानत है को नहीं ।

जन दुखमोचन सोचविमोचन मोर सहायक हौ तुमही ।।२।।

आसा बनी पर घेरे निरासा दीनदयाल समय निरबही ।

संतोष पुकारत देर भई कृपा नाथ करौ अब ही ।।३।।

[१२१]

हे हरि हरहु मोरि कुटिलाई ।

कैसे क्या मैं करूँ नाथ जाते कुबिचार नसाई ।।१।।

‘कु’ अगार मोहि सम को नाहीं कहौं का बात बढ़ाई ।

कलिमल ग्रसित मंद महाखल फिरउँ विबस जड़ताई ।।२।।

नाथ भरोस नहीं निज करनी छाड़ि चरन गति दाई ।

कोमलचित रीझत प्रभु थोरे गुरू तुलसी ज्ञान सिखलाई ।।३।।

करुनाकर प्रभु करि करुना मोहिं लीजै अपनाई ।

संतोष सुमति दीजै रघुराई निज पन प्रीति देखाई ।।४।।

[१२२]

राखौ न अब बिसराई ।

कृपा करत प्रभु आप कृपा से कृपा नहि कबहुँ अघाई ।।१।।

करुणा तव संकेत मात्र से सोषत दुख रघुराई ।

हनुमान से सेवक एक इशारे अगमहु सुगम बनाई ।।२।।

महिमा अमित करुणा सेवक अस कहि न जात प्रभुताई ।

जेहिं अपनावत राम दयानिधि सब कोउ लेइ अपनाई ।।३।।

तुम बिनु नाथ नहीं हित कोई कहौं न बात बनाई ।

रामदयामय तुम्हीं सहायक रखो न देर लगाई ।।४।।

चातक को जिमि स्वाति जल आस तिमि मो कहुँ सुरसाई ।

संतोष चरन तजि ठौर नहीं राखो भुजा उठाई ।।५।।


[१२३]

राम करुनानिधि करि करुना अब मोरे सब संताप नसावौ ।

मैं मूढ़ मलीन कुटिल कुविचारी केहि गुन ते प्रभु तोहिं रिझावौं ।।१।।

नेति-नेति कहि निगम बखानैं मैं कैसे तुम्हरे गुन गावौं ।

अपनी ओर से करि कृपा प्रभु सब बिगड़ी अब मोर बनावौ ।।२।।

करुना दया की प्रभु तू मूरति नाथ न और विलंब लगावौ ।

कृपा अनुग्रह करि भगवन संतोषहुँ उर निज रूप बसावौ ।।३।।

[१२४]

रामदयामय सरल सबल प्रभु धारन धर्म धुर धीर ।

विश्वाश्रय प्रभु करुनासागर हारन जन भव भीर ।।१।।

जग है हँसैया काम न आए तुम बिनु हरै को पीर ।

बहुत देखैया नहीं सुनैया हारहु तुम जन भीर ।।२।।

राम प्रभू मैं तोहिं पुकारूँ धर दो कर मम सीर ।

संतोष के बल विश्वास आस तुम कृपा करौ रघुवीर ।।३।।

[१२५]

बलहीन दीन देव जब सोच संताप बस भिखारी ।

दनुज सब टोह में बसैं गिरि खोह में हालत परम दुखारी ।।१।।

सब बिधि निरास आस खोय जब हरि को जाइ पुकारी ।

दीनदयाल राम आइ हरेउ सोक संताप अति भारी ।।२।।

थाप्यों सब सुरन को दलि असुरन को गावत गुन मुनि झारी ।

संतोषहुँ सोच संताप हरन तुमही राम खरारी ।।३।।

[१२६]

जब सुत बिनु दशरथ राय दुखारे ।

सोच विबस रानिहुँ सब रहतीं अति मन मारे ।।१।।

कृपाधाम राम प्रभु तुम तब, सुत होइ आप पधारे ।

राय-रानि गुरु पुरबासिन्ह को कियो सुखराशि सुखारे ।।२।।

सोचविमोचन राम प्रभू तुम सबके सोच निवारे ।

आस किए पद पंकज में संतोषहु आपहिं राह निहारे ।।३।।

[१२७]

गाधिसुवन मख पूर्णाहुति बिनु रहते परम दुखारी ।

करहिं उत्पात बहुत रजनीचर उनकी थी मति मारी ।।१।।

प्रभुजी आए यज्ञ कराए दनुजन को संहारी ।

सुबाहु ताड़िकादि को गति दीन्हेउ राम बड़े हितकारी ।।२।।

मारीच को पठयेउ सिंधु पार प्रभु आगिल काज बिचारी ।

रामप्रभू तव कृपा से, भे मुनि वृंद सुखारी ।।३।।

जब-जब बिपति पड़ी जन पे प्रभु तुमही विपदा टारी ।

संतोष पुकारत रामदयामय हर लो बिपदा सारी ।।४।।

[१२८]

बर्षा आतप शीत सहत जब पाहन होइ मुनि नारी ।

सूनें वन बिच पड़ी बिचारी कितनी विपदा भारी ।।१।।

दीनदयाल उदार प्रभु तुम दीन्हेउ पद रज डारी ।

मुक्त भई प्रभु दर्शन पाई बन गई बिगड़ी सारी ।।२।।

खोजि-खोजि के दीन उधारेउ तुम सम को उपकारी ।

करुनानिधि अब करि करुना सुधि लीजै नाथ हमारी ।।३।।

[१२९]

जनकराज सिया मातु सहेली सब थे परम दुखारी ।

सोच मगन नृप पन करि सोचैं रहिहैं कन्या क्वारीं ।।१।।

तोड़ि सकै अस बीर कहाँ जब कोउ न सका धनु टारी ।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी भंजेउ शिव धनु भारी ।।२।।

परशुराम जी कोप से धाए धनु दै गए सिधारी ।

राजा-रानी सिया सहेली हर्षे पुर नर-नारी ।।३।।

जन दुखमोचन सोचविमोचन सबको कियो सुखारी ।

सुमिर-सुमिर रघुपति तव करनी संतोष लहै सुख भारी ।।४।।

[१३०]

सोचहुँ केवट भाग बड़ाई ।

सबबिधि हीन दीन अति ताको राम लिहेउ अपनाई ।।१।।

मीत पुनीत किए रघुनायक भेंटेउ कंठ लगाई ।

शिव अज मुनि सब जेहि चरनन हित करते कोटि उपाई ।।२।।

केवट धोये सोइ पद पंकज सुर दुर्लभ सुख पाई ।

दीन मलीन पे सहजहिं रीझैं करुनानिधि रघुराई ।।३।।

वेद पुरान साधु सुर गावत दीनन को सुखदाई ।

धीर धरै संतोष समुझि मन कबहुँ दया तो आई ।।४।।

[१३१]

प्रभु सम नहि गतिदाई ।

दीन दाहिने सदा रामजी गीध को तात बुलाई ।।१।।

घायल होइ जब गीध जटायू परे धरनि महुँ आई ।

राम-राम रटि राह निहारैं प्रभु पद आस लगाई ।।२।।

सुनि निज नाम पुकारत कोई सिया की याद भुलाई ।

गीधराज ढिंग रामदयामय पहुँचे वेगहिं जाई ।।३।।

घायल जटायु गोद राखि प्रभु रोयउ नीर बहाई ।

सिया सुधि कहि जब गीध जटायु प्रभु पुर पहुँचे जाई ।।४।।

क्रिया किए निज कर रघुनायक जलजनयन जल लाई ।

दीनदयाल दुखहरन गोसाईं गति दीन्हेउ सुखदाई ।।५।।

गीध सरिस खग आमिष भोगी पायउ परम बड़ाई ।

करुणासागर प्रभु गुन आगर उजरे देत बसाई ।।६।।

महिमा अस करुनामय की हारेउ देत जिताई ।

परम सरल सुख शील के सागर गुनगन कहे न सिराई ।।७।।

सुमिर-सुमिर गुनगन की करनी नयन नीर भरि आई ।

करि कृपा चित करहु संतोष की दीनबंधु रघुराई ।।८।।

[१३२]

जन सुधि लेत रघुवीर गोसाईं ।

शबरी बसत वन प्रभु पद आस लगाई ।।१।।

प्रभु दर्शन हित दिन प्रति चितवत मारग नयन बिछाई ।

सिया को खोजत रामदयानिधि पहुँचे कुटिया जाई ।।२।।

आस पियास बुझी शबरी की निरखेउ नयन अघाई ।

खायउ बेर प्रेम रस सानी बहुबिधि कीन्हि बड़ाई ।।३।।

हरष सहित प्रभु धाम सिधारी मुनि दुर्लभ गति पाई ।

संतोष निहारो वेगि दया करि करुनामय रघुराई ।।४।।

[१३३]

असरन-सरन सरन सुखदाई ।

निराधार-आधार रामजी तिहुँपुर होत बड़ाई ।।१।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को लीन्हेउ मीत बनाई ।

दुख भव डूबत ताहिं प्रभु तुम भेंटेउ कंठ लगाई ।।२।।

शरन राखि तेहिं कृपासागर कीन्हेउ तुम कपिराई ।

शरन हीन संतोष प्रभु तुम असरन सरन कहाई ।।३।।

निराधार मैं नाथ हमारे तुम्हीं अधार रघुराई ।

प्रनतपाल प्रभु निज पन राखौ छमि अवगुन अधिकाई ।।४।।

[१३४]

देत सदा प्रभु दास बड़ाई ।

सीता खोजन चले भालु-कपि धरि आयसु कपिराई ।।१।।

परम सुजान सर्वज्ञ सियावर हनुमत पास बुलाई ।

दीन्हि मुद्रिका पवनतनय को राघव यह सिखलाई ।।२।।

सिया सुधि लै वीर तुम आवहु निजि बुधि बल दिखलाई ।

सकल काज करि कपि जब आए सुखनिधि अति सुख पाई ।।३।।

सनमुख होइ न सकै मन मोरा भयेंउ रिनी मैं भाई ।

संतोष मिले कहि रामदयानिधि परम कृतज्ञ रघुराई ।।४।।

सेवा प्रीति बजरंगबली की बार-बार प्रभु गाई ।

जग दुखमोचन सोचविमोचन संकटमोचन नाम धराई ।।५।।

[१३५]

असहाय-सहायक राम गोसाईं ।

दीनदयाल बड़े कृपाल प्रनतहित सुखदाई ।।१।।

करुनासागर जन हित कारन सहि लेते कठिनाई ।

आरतदीन मलीन के गाहक प्रभु कृपा अधिकाई ।।२।।

देश निकास्यो अनुज दसानन मारेउ लात उठाई ।

बिभीषन आए राम प्रभू पहिं दीन दशा बतलाई ।।३।।

रावन भ्रात निसाचर जाति तेहिं भेंटेउ हर्षाई ।

गहि भुज राखेउ राम दयानिधि मंत्री मीत बनाई ।।४।।

बड़े सकोची लंकेश बनायेउ तेहिं अतिसय सकुचाई ।

सरल सबल कोमलचित करुनामय रघुराई ।।५।।

सारद शेष निगम सुर साधु प्रभु गुनगन रहे गाई ।

राम सिवा संतोष नहीं मोरहु कोई सहाई ।।६।।

[१३६]

राम सदा प्रनत सुखदाई ।

प्रीति पुनीत प्रनतहित रीति युग-युग ते चलि आई ।।१।।

रावन जब निज शूल चलायो लक्ष्य बिभीषन भाई ।

बिभीषन पीछे मेलि सहेउ सोइ शक्ति प्रभू हर्षाई ।।२।।

निज पन राखत राम सदा जन हित सहि कठिनाई ।

सुमुख सुलोचन सोचविमोचन शील सिंधु रघुराई ।।३।।

सरल सुशील सबल कृपाल विनय करुणा बहुताई ।

विनय करत संतोष छ्मानिधि अघ अविनय कुटिलाई ।।४।।

छमहुँ दोष राघव गुनगाहक आरत जन नहि मति अधिकाई ।

दुख जल सागर दीन दशा, खग जिमि यान कृपा सुरसाई ।।५।।

[१३७]

सारद शेष निगम गुन गाए ।

आरत दीन मलीन सदा राम प्रभू मन भाए ।।१।।

करुनासागर करि करुना दीनन सदा बसाए ।

दीन जनों के कारण ही साकेत छोड़ि बसुधा पे आए ।।२।।

राम सरिस कोउ और नहीं जो बानर-भालु को मीत बनाए ।

जग पितु-मातु श्रीरघुनाथ गीध को कहि प्रभु तात बुलाए ।।३।।

दीनदयाल कृपाल सदा जन के सब दुख दोष नसाए ।

संतोष बनय नहिं जतन कोई राम कृपा बिनु पाए ।।४।।

[१३८]

सियावर परम उदार ।

अवगुन दोष छमहिं सब जन के दया क्षमा आगार ।।१।।

भूल-चूक जो जन से होए प्रभु जी देत सुधार ।

डूबत को देंय कर अवलंबन बहे जात आधार ।।२।।

प्राणि-मात्र के प्रभु हितकारी सबकी सुनत गुहार ।

समुझत बनय जाय नहि बरनी गुनगन अमित अपार ।।३।।

सरल सींव कृतज्ञ कह्यो कपि केहि बिधि होंउ उधार ।

संतोष स्वामि असि को जग नाहीं मन मम होत निसार ।।४।।

[१३९]

आरत दीन मलीन सनेही ।

असरन-सरन असहाय-सहायक सुमुख सुलोचन प्रभु नहि केही ।।१।।

निराधार-आधार दयानिधि करुनाकर प्रनत जन नेही ।

सुर मुनि रंजन जन दुख भंजन शिव अज ध्यावत हैं प्रभु जेही ।।२।।

राखनहार नहीं जेहिं कोई राखत राम दया करि तेही ।

कृपासागर विरद उजागर रीति प्रीति पन सदा निबेही ।।३।।

निर्बल को बल संबल अवलंब गुनगन अमित कहौं बिधि केही ।

देखौं सुनौं नहिं और कहीं मोहि सुपास प्रभु कृपा में ही ।।४।।

राम को छाड़ि नहीं कोउ मो कहुँ आस भरोस रघुनायक से ही ।

संतोष नहीं कोउ मोर सुनैया तातु-मातु रघुवर वैदेही ।।५।।

[१४०]

सत्कर्मों की एक भी मुझमें कहीं नहीं कोई रेखा है ।

अवगुन हैं इतने सारे कर सकता कोई न लेखा है ।।१।।

फिर भी जाएगा न दुख देखा इतना मुझे भरोसा है ।

करुणासागर ने युग-युग से दीनों को पाला पोसा है ।।२।।

करुणा ही प्रभु की ऐसी जिसने दुख-दारिद सोषा है ।

रामकृपानिधि ने दोषों को कभी नहीं भी देखा है ।।३।।

संतोष के राम दया के धाम इसमें नहि कछु धोखा है ।। ४।।

[१४१]

आनंदसिंधु दीनबंधु राम सुखधाम सुखरासी ।

रामचन्द्र रामभद्र सर्वकामप्रद अविनासी ।।१।।

नीलोत्पल तन श्याम जग अभिराम सेवक सुपासी ।

शिव अज सेवित चरन रज चाहत सुर नर यती सन्यासी ।।२।।

शरनागतपाल परमकृपाल दीनदयाल उदासी ।

सुमुख सुलोचन मम सुधि लीजै अघ अवगुन दुख नासी ।।३।।

तुम बिनु मोहिं न राखनहार सोचहु अवध निवासी ।

संतोष शरन दुखहरन दयानिधि राखो हर उर वासी ।।४।।

[१४२]

राम प्रभु तुम दानि शिरोमनि करुना दया अगार ।

आरत दीन के तुम रखवारे सरल समर्थ उदार ।।१।।

चरन गहेंउ मैं रामकृपानिधि सोचहु आप बिचार ।

मैं तो प्रभु बिनु काम तुम्हारे तुम ही मोर अधार ।।२।।

का गति होए नाथ हमारी जो तुम देउ बिसार ।

दीन दशा प्रभु देखि हमारी लीजे शरन में डार ।।३।।

जग गति केवल मैं नहि चाहौं नहि परलोक सुधार ।

संतोष चहत है जनम-जनम भरि आप चरन में प्यार ।।४।।

[१४३]

पतित उधारन जन दुख टारन राम प्रभु अब मम सुधि लीजे ।

सरनागतपाल कृपाल प्रभू , तुम सम रंक निवाज न दूजे ।।१।।

राजीवविलोचन भवभयमोचन सब दुख दोष को दूर करीजे ।

आरत दीन अनाथ के नाथ मोरहु बाँह प्रभू गहि लीजे ।।२।।

मोहि पुकारत देर भई प्रभु  कृपा तत्काल बिलंब न कीजे ।

निज पन सँभारि श्रीरघुनायक संतोष को शरन चरन रति दीजे ।।३।।

[१४४]

राम कृपाल बड़े नत पाल जन के सब अघ शोक मिटाए ।

जेहि मग जात कबहुँ मुनि कोई तेहिं मग रामजी गीध पठाए ।।१।।

त्रिन को कुलिश, कुलिश त्रिन कारी पाहन को जलजान बनाए ।

बानर भालू पे अस कृपा ते सब प्रभू के मीत कहाए ।।२।।

खग पशु निसचर की सुनी राम अपनी दीन दशा हम सुनाएँ ।

दीनदयाल करौ अस कृपा संतोषहुँ की बिगड़ी बन जाए ।।३।।

[१४५]

राम प्रभु तुम सम जग में आरत दीन के गाहक नाहीं ।

वेद पुरान अरु संत कहैं सब राम प्रभू करुणामय आहीं ।।१।।

परमउदार सहजकृपाल रीझत राम न देर लगाहीं ।

दीन पुकारे द्रवहिं प्रभु जी धीर धुरंधर न धीर धराहीं ।।२।।

करि करुणा नाथ विलोकहु मो कहुँ मोरेहु सब दुख दोष नसाहीं ।

संतोष करै विनती कर जोरे राखो सदा कर कंज की छाहीं ।।३।।

[१४६]

रामकृपाल हैं आरतपाल कोटिन रंक नरेश कियो ।

पतितन कोटि उधारेउ राम पाप और परिताप गयो ।।१।।

मुनि नारि निकारि के शाप दियो प्रभु हरि परिताप पुनीत कियो ।

प्रनतपाल शबरी की सुन्यो मुनि दुर्लभ गति भगवान दियो ।।२।।

गीध जटायु केर बनायों संसृत हरि निज धाम दियो ।

केवट की बिगरी बनी ऐसी चरणोदक पाइ निहाल भयो ।।३।।

कोल किरात भील बनवासी अरु दंडक वन भी पुनीत कियो ।

बंधु त्रास फिरत सुग्रीव बिनु हित सोइ कपीस कियो ।।४।।

दीन बिभीषन हीन रहा गहि बाँह शरन निज राखि लियो ।

करि करुना नाथ सुधारो मोरहु तव पद आस भरोस कियो ।।५।।

आस विश्वास एक बल तुमसे ओर तुम्हारी देखि जियों ।

दीनदयाल उदार करुणानिधि बसहु आइ संतोष हियो ।।६।।

[१४७]

महिमा अपार है राम प्रभू की निगमहुँ पार न पावत हैं ।

नेति-नेति कहि निगम बखानैं शिव मुनि ध्यान लगावत हैं ।।१।।

सुर नर सारद शेष रामायन राम प्रभू यश गावत हैं ।

अग-जग नाथ है सब कुछ हाथ दीन पुकारे धावत हैं ।।२।।

जब-जब भीर परै जन पे श्रीराम न देर लगावत हैं ।

को न उजारि सकै तेहिं को जाको राम बसावत हैं ।।३।।

दीनदयाल बड़े कृपाल जन दुख दोष नसावत हैं ।

संतोष पुकारत रामदयामय काहे दया नहि आवत है ।।४।।

 [१४८]

प्रभु जी क्या निज विरद भुलाए ।

आरतहित जन प्रीति की रीति सारद शेष निगम गुन गाए ।।१।।

प्रहलाद भक्त की रक्षा को प्रभु तुमही नरहरि रूप बनाए ।

बनि वाराह तुम्हीं जग स्वामी दलि हिरण्याक्ष धरा को छुड़ाए ।।२।।

दुहुँ पग से प्रभु नापि त्रिलोकी छलि वलि तुमही सुतल पठाए ।

कच्छपरूप से तुमही स्वामी मंदराचल निज पीठ उठाए ।।३।।

मत्स्य रूप धरि दलि हयग्रीव तुमही प्रभु जी वेद बचाए ।

भक्त अम्वरीश के खातिर तुमही बिना बेर निज चक्र पठाए ।।४।।

बीच सभा में द्रुपदसुता की तुमही प्रभुजी चीर बढ़ाए ।

सुनि गजराज की करुण पुकार तुमही वाहन छोड़ि के धाए ।।५।।

गणिका अजामिल आदिक को तुम्हीं पावन करि भव पार लगाए ।

गौतम नारि अहिल्या को प्रभु तुमही परम पुनीत बनाए ।।६।।

केवट को बड़भागी कियो तुम मुनि दुर्लभ पद कंज धुलाए ।

निज कर कंज परस खग को प्रभु असुवन के जल से तू भिगाए ।।७।।

शबरी के भाग बड़े अनुराग बखानि के बेर तुम्हीं प्रभु खाए ।

सुग्रीव विभीषन से दीनन को तुमही प्रभु निज कंठ लगाए ।।८।।

जब-जब भीर पड़ी जन पे प्रभु करि कृपा तुम्ही भीर हटाए ।

कँह लगि कहौं राम प्रभु तुमही कोटिक दीन के विपति नसाए ।।९।।

रामकृपाल तुम्हीं करि कृपा दीन मलीन बनाय बसाए ।

संतोष पुकारि रहा प्रभु राम अनाथ के नाथ क्यों देर लगाए ।।१०।।

[१४९]

प्रभु जी मोहिं क्यों आप भुलाने ।

सारद शेष निगम आगम तव आरत हित की रीति बखानैं ।।१।।

मैं तो मंद महाखल पामर सुर मुनि श्रुति सकल अनुमाने ।

असरन सरन राम दुख हरन दीन मलीन सदा सनमाने ।।२।।

असहाय सहायक अग-जग नायक प्रनतपाल जगत पहिचाने ।

सरल सबल पुनि रीझत थोरे पढ़ि-सुनि तव गुन चित ललचाने ।।३।।

सुग्रीव बिभीषन आदिक के तव कृपा सब दुख दोष पराने ।

मैं दीन मलीन शरन रखिए प्रभु विरद न भूले सब जन जानैं  ।।४।।

मम चित नाथ करौ अस कृपा जनम-जनम तव पद रति माने ।

संतोष अवलंब तुम्हीं रघुनाथ द्रवउ राजीवनयन सयाने ।।५।।

[१५०]

राम जी क्या विचारा क्या चित से उतारा ।

गज ने जब पुकारा धीर तूने न धारा ।।१।।

दीन होके पुकारा दुख सारा निवारा ।

तब न सोचा विचारा झट उसको उबारा ।।२।।

दीन दुखियों का सारा दुख तूने ही टारा ।

जानें जग सारा कितनों पापी को तारा ।।३।।

पाहि फँसे बिचधारा दीन सुनिके निकारा ।

अब भूले गुन सारा या वाना विसारा ।।४।।

जब पूँछा किसी ने कौन तेरा सहारा ।

मन में तुझको सँभारा किया ऊपर इशारा ।।५।।

नाम तेरा उचारा कहा वो ही हमारा ।

वही पतराखनहारा नहीं दूजा सहारा ।।६।।

कहाँ तुझको विसारा लो सिर हाथ धारा ।

हुआ मैं भी तुम्हारा, मुझको मिल जाए सारा ।।७।।

एक तूँ ही सहारा अब दे दो किनारा ।

संतोष के आन की लाज रख लो हमारा ।।८।।

[१५१]
राम रघुवर रघुनाथ सुनेंउ बड़ी बड़ाई ।
निराधार आधार कहावत अरु असहाय सहाई ।।१।।
दीनदयाल बड़े नतपाल आरतपाल पितु माई ।
साधु संत सद्ग्रन्थ बतावत राम दीन को भाई ।।२।।
नहि बुधि ज्ञान नहीं ढ़ंग जानौं केहि बिधि सकौं बताई ।
दासहुँ जोग नहीं कछु लायक नाथ अमित प्रभुताई  ।।३।।
जग घर बाहर जोग न साईं जोग-विराग कठिनाई ।
मोसे दीन हीन कोउ गाहक होइ कहाँ सुनुवाई ।।४।।
सुनेंउ अयोग जोग जग नाहीं बनत जोग रघुराई ।
राघव तुमही दीन सनेही राखत बाँह उठाई ।।५।।
करुणा क्षमा की प्रभु तू मूरति शील दया अधिकाई ।
विरद आस ते जीवत आयों नहि बल बड़ी खोटाई ।।६।।
केहि बिधि रहौं करौं का रघुपति तुमहूँ रहे बिसराई ।
दीन संतोष न मोहिं बिसारो सोचि रहा अकुलाई ।।७।।

[१५२]

सब जानि रहे रघुनाथ शरन हम तेरे हैं ।

भय नहि एक तदपि रघुनंदन रचत कुचक्र घनेरे हैं ।।१।।

आन मान जन पन रखवारे एक तू नाथ हमारे हो ।

आरतपाल खल-दल-बल तोरौ दीनन के रखवारे हो ।।२।।

देर भई प्रभु बहु दिन बीते जन सुधि रघुवर लीजै हो ।

दीन संतोष कहत कर जोरे प्रभु अब देर न कीजै हो ।।३।।

[१५३]

प्रभु जी अबहूँ सुधि नहि आई ।

जो हौं सो प्रभु राम हमारे जानहुँ मोर खोटाई ।।१।।

पतितपावन सुनि गुन करुनामय, मैं करौं नाथ ढिठाई ।

असरन सरन दीन जन गाहक राम प्रभू सुखदाई ।।२ ।।

शरन गहे की भीर हरत प्रभु छमि अवगुन बहुताई ।

कोउ सुधि लैहैं नाथ हमारी आप रहे विसराई ।।३।।

तव पद कमल की आस प्रभू जी करिहैं लोग हँसाई ।

संतोष के नाथ तुम्ही रघुनाथ राखो लाज बचाई ।।४।।

[१५४]

राम प्रभू एक आप सहारा ।

शरन गहेंउ था मेरे वश में रखना काम तुम्हारा ।।१।।

महापतित अघ-अवगुन खानि मैं; कब यह आप बिचारा ।

पतितपावन अघ-दोष नसावन जानत गुन जग सारा ।।२।।

जिसने भी राम उचारा प्रभु जी, उस पापी को तारा ।

जो भी तुम्हें पुकारा स्वामी उसका काज सवाँरा ।।३।।

चमका जग में उसका सितारा जिसको आप निहारा ।

दीखे जग अँधियारा प्रभु जी तू पत राखनहारा ।।४।।

दीनदयाल बिना तव कृपा मिल नहि सके किनारा ।

संतोष करै विनती कर जोरे सुधि लीजे नाथ हमारा ।।५।।

[१५५]

राम प्रभू हम चरण गहे हैं सुनिके तव गुनग्राम ।

पतितपावन है नाम तुम्हारा तुम हो दया के धाम ।।१।।

और नहीं है दूजा कोई जग में ऐसा नाम ।

शिव अज मुनि सब भजते हैं तुमको ही सुखधाम ।।२।।

पंकजलोचन सोचविमोचन तुम हो पूरणकाम ।

शोभा तो इतनी अनुपम है सकल लोकअभिराम ।।३।।

दीन मलीनों पे प्रभु कृपा कभी नहीं तुम वाम ।

संतोष चहै प्रभु राम दयानिधि नाम भजै अविराम ।।४।।

[१५६]

राम कृपालु रहैं जेहि ऊपर संकट एक न आवत नेरे ।

दीनदयाल शरनागतपाल मोहिं आस प्रभू पद कंज की तेरे ।।१।।

सदा कृपालु रहौ मो ऊपर सीतारमन रघुवंश के हीरे ।

अवगुन दोष हों दूर प्रभू तव पद रति अरु गुन हों घनेरे ।।२।।

जन सुखदायक प्रभु सब लायक सुर नर मुनि रघुपति के चेरे ।

धनु सायक हाथ धरे रघुनायक एक सहायक मेरे ।।३।।

[१५७]

विश्वाश्रय प्रभु राम हमारे यश कितना निर्मल ।

नारद शारद शिव आज गाएँ गुन है बड़ा विमल ।।१।।

सनक सनंदन आदिक ऋषि मुनि पद रति मांगे अविरल ।

राम-राम जो राम पुकारे जीवन हुआ सुफल ।।२।।

गुरवर का उपदेश यही है मुझमें कहाँ अकल ।

संतोष चहै प्रभु रामदयानिधि रति हो चरन कमल ।।३।।

[१५८]

राम बिना कोउ मोर सहाई ।

निराधार को अधार एक रामदयामय भाई ।।१।।

आरत दीन मलीन के ऊपर राम कृपा अधिकाई ।

बानर भालु गीध शवरी पे प्रभु करुना वर्षाई ।।२।।

सुग्रीव बिभीषन केवट को प्रभु भेंटेउ कंठ लगाई ।

दीनबंधु सुखधाम, हरन अघ अवगुन कुटिलाई ।।३।।

महापतित अतिअधमहुँ को पावन करि गति दाई ।

दीन मलीन संतोष की भी अब सुधि लीजै रघुराई ।।४।।

[१५९]

कब आएगा राम प्रभू कृपा में खिलने का मौसम ।

जब तुम होगे नाथ मेरे जीवन-धन प्रिय प्रीतम ।।१।।

कब करुणा की होंगी बरसातें बीतेगा मेरा पतझर ।

जब सिंचित हो करुणा जल से फूल उठेगा जीवन तरु ।।२।।

कब चरणों में मम सिर होगा सिरपे तव कर उत्पल ।

तेरी विरदावलि ही प्रभु जी मुझको देती है संबल ।।३।।

वैसे तो मैं हूँ स्वामी अधमों में भी अधमाधम ।

दीन मलीनों पे करुना गाते हैं सब निगमागम ।।४।।

मेरा तो बन जाएगा करुनासागर उस पल क्षन ।

जब कह दोगे तुम भगवन संतोष भी मेरा हुआ शरन ।।५।।

 [१६०]

गुरू तुलसी का सच्चा ज्ञान । करिए राम नाम का ध्यान ।।१।।

गाएँ जन प्रभु के गुन ग्राम । बिगड़े बनि जाएँ सब काम ।।२।।

जग में जो मिलता आराम । समझों देते सीताराम ।।३।।

जग निसार प्रभु नाम है सार । जोड़ो राम नाम से तार ।।४।।

जग में सुख परलोक सुधार । राम नाम सम कौन उदार ।।५।।

राम प्रभु जी दयानिधान । सदा कृपालु रहौ भगवान ।।६।।

सर्वकामप्रद पूरणकाम । करौ कृपा करुणामय राम ।।७।।

जपता रहूँ नाथ तव नाम । राम नाम जो सब सुखधाम ।।८।।

विनती तुमसे अग-जग नाथ । सदा सीस पे रखिए हाथ ।।९।।

बदला जग बदलै सब ज्ञान । संतोष न बदलै कृपानिधान ।।१०।।




।। श्रीसीतारामार्पणमस्तु  ।।







____________________________________


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय पोस्ट

विशिष्ट पोस्ट

की तुम राम दीन अनुरागी………

साधन संपन्न लोगों से तो बहुतेरे प्रेम करते हैं । अनुराग रखते हैं । लेकिन जो बिपन्न हो, दीन-हीन हो उससे कोई अनुराग नहीं रखता । ऐसे लोगों से...

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

___________________________________________

विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

_________________________________________

प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

_________________________________

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

____________________________________________

भगवान की तलाश

___________________________________

सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

___________________________________

भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

___________________________________

भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

___________________________________

संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

__________________________________




रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

__________________________________________

।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु मान बड़ाई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

_________________________

।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

______________________________