एको देवो रामचंद्रो...

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।

रविवार, 6 अगस्त 2017

विनयावली (६२-१०९)

।। श्रीसीतारामाभ्यां  नमः।।



[६२]

बन्दौं राम रघुबंश दिनेश । पावन परावर पूर्ण परेश ।।१।।

विश्वायतन ब्रह्म वरदेश । ब्यापक विमल शम्भु हृदयेश ।।२।।

जानकीनाथ सर्वज्ञ सर्वेश । आनन्दकन्द समर्थ करुणेश ।।३।।


सच्चिदानन्द विश्व विश्राम । कमलनयन नयनाभिराम ।।४।।

आरत आरति हरन विश्वहित । कोशलाधीश जगदीश अजित ।।५।।

पाहि नाथ संतोष शरन । राखो राम शरन भय हरन ।।६।।

[६३]

जय राम रामचन्द्र रामभद्र । जय सीतारमन सर्वकामप्रद ।।१।।

जय आरतपाल सहजकृपाल । जय कृपाल शरनागतपाल ।।२।।

जय आनंद सिंधु सुखधाम । जय सुखराशि महा छविधाम ।।३।।

जय करुनाकर सोच विमोचन । जय रघुवंश रवी दुखमोचन ।।४।।

जय सीतापति पंकजलोचन । जानकीजीवन प्रिय त्रिलोचन ।।५।।


जय विद्यानिधि कारुण्यरूप छवि परम अनुपम अनूप ।
सच्चिदानंद आनंदकंद जय जय जय प्रभु विश्वरूप ।।६।।

[६४]

जय दशरथ सुवन कौशल्या नंदन । दीनदयाल अखिल जग वंदन ।।१।।

जय लक्ष्मणानुचर भरत वन्दित । रिपुसूदन प्रिय इन्द्रियातीत ।।२।।

जय सुमित्रावत्सल दुख दोष हरन । कैकेई सोच संताप दलन ।।३।।

जय बिभीषनश्रीद हनुमत ईश । सुग्रीवेश सर्वज्ञ जगदीश ।।४।।


 जय प्रणतपाल परम करुणाधाम संतोष त्रास संसय समन ।
अखिल संसार उपकार कारन जय जय जय सीतारमन ।।५।।

[६५]

जय सीतापति सुख गुन रासी । जय जय जय प्रभु शिव उर वासी ।।१।।

सुमुख सुलोचन अघ दुख नाशी । सरल सबल अविगत अविनाशी ।।२।।

धनुष वान कर कंज बिराजै । शोभा कोटि मदन मद लाजै ।।३।।

भरत लखन रिपुहन सियादेवी । हनूमान पद पंकज सेवी ।।४।।

सुर मुनि शिव अज ध्यान लगावैं । शारद शेष निगम गुन गावैं ।।५।।

असरन-सरन सकल जग स्वामी । कोमलचित प्रभु अन्तर्यामी ।।६।।

जनम मरन भव बंधन हारी । दीनदयाल भगत सुखकारी ।।७।।

आरत आरति हरन खरारी । प्रनतपाल विश्वहितकारी ।।८।।

गुनगन पन सब जग उजियारे । आरत दीन मलीन पियारे ।।९।।

पतितपावन बहु अधम उधारे । शवरी गीध अहिल्या तारे ।।१०।।

कपि केवट खग निसचर केरे । करि करुना दुख दोष निवेरे ।।११।।

आरत दीन सदा सत्कारे । तिहुँ पुर होत राम जयकारे ।।१२।।

निराधार आधार दुआरे । पाहि-पाहि संतोष पुकारे ।।१३।। 

[६६]

राजीवनयन सकल गुणधाम । सोचविमोचन पूरणकाम ।।१।।

रघुकुलतिलक लोकाभिराम । दिव्यायुध छविकोटिकाम ।।२।।

अखिल लोक दायक विश्राम । भयहर्ता राजेंद्र अकाम ।।३।।

जगदाधार सियावर राम । सहजकृपाल अनघ बहुनाम ।।४।।

भक्त कल्पपादप आराम । आरतपाल शील सुखधाम ।।५।।

दीनदयाल स्ववश भगवान । पूर्ण पुरुषोत्तम दयानिधान ।।६।।

भग्नेशकार्मुक करुणाखानि । भक्तन के जीवनधन प्रान ।।७।।

मंगलमूरति धीर वीर । त्रिविधि ताप हर रणरंग धीर ।।८।।

विद्यानिधि दुखहरन दोष हर । असर-सरन सरन अघहर ।।९।।

धनुर्धर यज्ञेश विभीषणश्रीद । पाहि नाथ संतोष सरन करुनाकर प्रसीद ।।१०।।

[६७]

राम प्रभू कैसा प्रताप । जँह देखौं तँह आप ही आप ।।१।।

निर्गुन सगुन अकार सकार । रूप नाम गुन विविधि प्रकार ।।२।।

अविगत अलख अनादि अपार । विश्वरूप प्रभु विगत विकार ।।३।।

छवि परम अनुपम अनूप । कण-कण में प्रभु तेरा रूप ।।४।।

तुमही दुर्गा शक्ति-स्वरूप । शिव अज हरि प्रभु तुम सुरभूप ।।५।।

वामन नरहरि अरु वाराह । कच्छप मत्स्य तुम्हीं सियानाह ।।६।।

वुद्ध कल्कि अरु परशुराम । कृष्ण रूप में तुमही राम ।।७।।

जन हित प्रभु नाना अवतार । धारत सदा जगत आधार ।।८।।

पवन वेग बल तेरा नाथ । पावक तेज भी तव रघुनाथ ।।९।।

रवि शशि में तेरा प्रकाश । सब कुछ तुमसे सबमें वास ।।१०।।

धरती वादल अरु आकाश । उद्भव पालन और विनाश ।।११।।

सब तेरी माया का जाल । प्रभु कालहुँ के भी तुम काल ।।१२।।

तुमसे पृथक नहि कछु राम । गाये जग तेरा गुन ग्राम ।।१३।।

निगम साधु सुर करते ध्यान । तुमही ज्ञान और विज्ञान ।।१४।।

सारद शेष न सके बखान । संतोष बखाने किमि भगवान ।।१५।।

बिनती तुमसे अग जग नाथ । सिरपे मेरे रख दो हाथ ।।१६।।

[६८]

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।
जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

[६९]

नारायण रूप अनूप छवी । तन तेज बिराजै कोटि रबी ।।१।।

दुख टारन हारन भार भुवी । यश गावत सुर नर वृंद कवी ।।२।।

जाके पद पंकज आस लगी । अभाग के भी सब भाग जगी ।।३।।

कुबत सकल तजि दूर भगी । सुख सेवत जो बिनु राग रगी ।।४।।

जिसने भी सबकी आस तजी । दुख दारिदता की उड़ी धजी ।।५।।

बिनु पदत्रान सो भए गजी । प्रभु कृपा ते बहु राज रजी ।।६।।

मन को प्रभु तेरी विरद फवी । तव कृपा से सुर खात हवी ।।७।।

पाहि कहत दुख दीन जभी । करुनाकर टारत भार तभी ।।८।।

चित करौ मोर रघुनाथ कभी । नहि और मेरा तुम नाथ सभी ।।९।।

संतोष पुकारै रघुवंश रवी । मोहू राखो बहुकाम छवी ।।१०।।

[७०]

सुमिरत राम रूप शील गुन मन अतिसय पुलकात ।

दीनदयाल भगत भय हारी तेज कोटि रवि गात ।।१।।

नीलोत्पल तन श्याम मनोहर देखे हर न अघात ।

आरतपाल प्रनत हितकारी मानहिं भगति के नात ।।२।।

शिव अज मुनि सब पद रज चाहत करत जतन दिन रात ।

आरत दीन के गाहक प्रभु जी सोचत सुख अधिकात ।।३।।

पवन-सुवन रिपुदवन भरत सिया लखन सेवत बहु भाँत ।

जो प्रभु मारहुँ के मद मोचन अखिल जगत पितु-मात ।।४।।

संतोष तासु शील रूप गुन मोसे किमि कहि जात ।

चाहौं जनम-जनम अविरल रति राम चरन जलजात ।।५।।

[७१]

दीनदयाल दयानिधि से निज सेवक दुख नहिं जात निहारे ।

आरत दीन पुकार सुनत प्रभु द्रवहिं राजिवनयन हमारे ।।१।।

प्रनतपाल सुजान प्रभू सुनि प्रहलाद पुकार नरहरि तन धारे ।

कष्ट मिटाय लगाय कंठ निज सेवक को प्रभु कीन्ह सुखारे ।।२।।

करुण पुकार सुनत गज की करुनानिधि वाहन छोड़ि पधारे ।

डूबत गजराज बचाय लियो आरत जानि सकल दुख टारे ।।३।।

सुग्रीव बिभीषन की दीन दशा प्रभु देखि कियो सुखराशि सुखारे ।

शवरी गीध अहल्यादि को प्रभु पावन करि भव पार उतारे ।।४।।

दीन जानि दुर्योधन घेरे पाण्डु सुतन्ह को बन्यो सहारे ।

कहाँ लगि कहौं श्रीराम की करनी कोटिक दीन मलीन उधारे ।।५।।

यही विश्वास लिए दिन राति श्रीराम कृपा की ही बाट निहारे ।

कृपा अनुग्रह की आस लिए संतोष खड़ा दरबार तुम्हारे ।।६।।

[७२]

रामचंद्र रामभद्र आप ही आपके समान हो ।

कोटि मदन मद दलन ऐसे रूपवान हो ।।१।।

अग-जग गुन गाए ऐसे गुनवान हो ।

कोटि सूर्य के सदृश प्रकाशमान हो ।।२।।

शरन गहे राखि लेत ऐसे छ्मावान हो ।

देखि दीनता द्रवत ऐसे दयावान हो ।।३।।

हित अनहित जन, सबके हितवान हो ।

दीन सो प्रीति रीति ऐसे श्रीमान हो ।।४।।

सरल स्वभाव विनय बल के निधान हो ।

हेरि-हेरि जन मिले करुणानिधान हो ।।५।।

धरम स्वरूप आप ऐसे धर्मवान हो ।

शील नेम व्रत प्रकाश पुरुषपुरान हो ।।६।।

हरि हर विधि मान, दिए महिमावान हो ।

साधु सभा जन करत बखान हो ।।७।।

गीध पितु भिलनी मातु, कहत महान हो ।

बानर भालु दीन, दिए सनमान हो ।।८।।


दीन संतोष जन प्राणनिधान हो ।

मोसे दीन दूबरे के बल आन मान हो ।।९।।

 [७३]

शोभाधाम की शोभा से खुद शोभा भी शरमाती है ।

करुणासागर की करुणा से करुणा को करुणा आती है ।।१।।

दानिशिरोमनि के दान से दान को लज्जा आती है ।

शरनागतपाल के पन से ही दारिदता घबराती है ।।२।।

देखि सरलता राम प्रभू की सरलता खुद सकुचाती है ।

धीर हैं इतने राम हमारे धीरता ही अकुलाती है ।।३।।

देखि वीरता राम प्रभू की वीरता पीठ दिखाती है ।

संतोष उपमेय नहीं रघुनाथ उपमा लाज लजाती है ।।४।।

[७४]   

राम प्रभू जी दयानिधान । विद्यानिधि करुणा गुनखानि ।।१।।

कर में बिराजै धनु अरु वान । करता जग तेरा गुन गान ।।२।।

वेद सके भी नहिं पहिचान । नेति-नेति कहि करैं बखान ।।३।।

तुम सम तुम नहि महिमावान । सरल सबल तुम सन नहि आन ।।४।।

जिसे जनावौं सके वो जान । उसको ही हो सकता भान ।।५।।

सबको देते हो तुम मान । तुमको सम सब मान अमान ।।६।।

प्रनतपाल कृपाल सुजान । दानिशिरोमनि तुम भगवान ।।७।।

संतोष की रखिए प्रभु जी आन । तुम्हीं को रखना इसका ध्यान ।।८।।

[७५]   

वेद ज्ञान जप तप मख पूजा एकहु नाथ नहीं मोहि पाहीं ।

संध्यावंदन भी नहि जानौं तीरथ दान बनत कछु नाहीं ।।१।।

अवगुण को ही गुण समुझत हौं कलिमल ग्रसित मूढ़ मति नाहीं ।

पतितन में मैं महापतित हूँ राजिवनयन से छुपा कछु नाहीं ।।२।।

कृपाधाम छ्मासिंधु प्रभु से फिर भी आस लिए मन माहीं ।

महाअवगुणधाम समुझि संतोष दयानिधि मो से रीझत नाहीं ।।३।।

[७६]

सुमिर सुमिर प्रभु की प्रभुताई सोच रहौं पछिताई ।

जो नहि होत हिय कुटिलाई हमरौ होत सुनाई ।।१।।

वेद पुरान सब करत बड़ाई सुनि गुन गयों लुभाई ।

अशरन शरन शरन सुखदाई सोचत मन हर्षाई ।।२।।

छ्मादानि अनुमानि प्रभू को मन रहा आस लगाई ।

प्रीति प्रतीति इहै मन राखौं होइहैं राम सहाई ।।३।।

अब तक नहि चढ़ा नाम बही में छूटै नाहिं खोटाई ।

संतोष न चढ़ा जो नाम बही में जनम अकारथ जाई ।।४।।

[७७]

दीन मलीन दुखी प्रभु मोसे करुनानिधि नहिं कोउ जग माहीं ।

आरतपाल कृपाल प्रभू तुम सम तुम कोउ दूसर नाहीं ।।१।।

तुम्हरी कृपा से करुनाकर पाप ताप भव रोग नसाहीं ।

तेहि को नैराश्य कहाँ जग महुँ जो आस किए करुनामय पाहीं ।।२।।

दीनानाथ श्रीराम के रीझत जन के सब दुख दोष नसाहीं ।

दिन प्रति नेह बढ़ै पग में प्रभु अवगुण शोक-संताप नसाहीं ।।३।।

नाथ अभिलाष यही मन मोरे रहँउ सदा तव छत्र की छाहीं ।

दीनदयाल दयानिधि तुमसे संतोष को भीख दया कै चाही ।।४।।

[७८]

राम राजिवनयन आप अखिलेश हैं ।

जन दुख तम के लिए नाम दिनेश है ।।१।।

मन बिचलित है स्वामी ऐसा परिवेश है ।

कूप में आ गिरे डूबना शेष है ।।२।।

कृपा रज्जु से प्रभु बाहर  करो आप सर्वेश हैं ।

देर करिए नहीं नाम करुणेश है ।।३।।

[७९]

दशरथ नंदन जन उर चंदन । सुर मुनि रंजन खलगन भंजन ।।१।।

अघओघ ताप परिताप निकंदन । जन दुख दोष भार भुवि खंडन ।।२।।

अग-जग नायक अगजग वंदन । मंगल मूल अमंगल गंजन ।।३।।

धरम धुरंधर अतिसय सुंदर । शारंगधर भव बारिध मन्दर ।।४।।


प्रभु करुणाधाम अखिल संसार कारन करन ।
त्राहि-त्राहि संतोष शरन द्रवउ विश्व पोषन भरन ।।५।।

[८०]

पतित उधारन जन भय टारन । शवरी गीध अहिल्या तारन ।।१।।

दारुन दुख ज्यों दमन दशानन । सेवित सुर नर मुनि चतुरानन ।।२।।

जन मन भावन दारिद दावन । दण्डककानन पावन कारन ।।३।।


कर पद नयन कंज जलजानन । कोटि मदन मद आरति हारन ।।४।।

संतोष शरन जग सोच नसावन । बरषै करुना जिमि जल सावन ।।५।।

[८१]

राम राजिवनयन करिए कोई जतन । प्रभु करुणायतन हो न जाए पतन ।।१।।

जन दुख हरन शील शुभ गुन सदन । संसृत समन जग कारन करन ।।२।।

कृपा सुख अयन द्रवउ सीतारमन । तुझको पुकारूँ मैं तेरी शरन ।।३।।

[८२]   

मोरे आधि ब्याधि के नसैया करैया गीध श्राध के ।

मोरे सोच संताप के कटैया बँधैया सेतु बाँध के ।।१।।

मोसे दीनों के बाँह गहैया हरैया कुभाव के ।

मेरी नैया के पार लगैया खेवैया जग नाव के ।।२।।

मेरे बिगड़ी जनम की बनैया धरैया शारंग के ।

संतोष से दोष-कोष के रखैया रमैया अग-जग के ।।३।।

[८३]

आरतपाल कृपाल राम प्रभु परम सरल शारंग धरैया ।

जन दुख मोचन प्रिय त्रिलोचन पाप ताप भुवि भार नसैया ।।१।।

दीनबंधु दुखहरन दयानिधि डूबत भँवर बचावत नैया ।

समर्थ सुशील सुजान शिरोमणि आरत दीन पुकार सुनैया ।।२।।

धनु सायक हाथ धरे रघुनायक मोरे एक सहाय करैया ।

जीवन क्या बिनु जानकीजीवन संतोष पुकार तू राम रमैया ।।३।।

[८४]

तन मन की मोहिं सब आस फीकी है ।

विरद गुन शील आस रघुनाथ जी की है ।।१।।

कुगति मन सीख गति ज्यों आग घी की है ।

ठाँउ न निबाह मोर कहुँ त्रिलोकी है ।।२।।

रीझ-खीझ देंय गति सोइ गति मोकी है ।

जानत करुणानिधान संतोष जी की है ।।३।।

[८५]

दीनदयाल दया करौ राम । जगत उजागर तव गुन ग्राम ।।१।।

परमपतित मैं अवगुणधाम ।। पतितपावन तुम सब गुणधाम ।।२।।

मेरे मन में नाना काम । कमलनयन तुम पूरणकाम ।।३।।

भक्त कल्पपादप आराम । मुझको अपना मिले मुकाम ।।४।।

जगताश्रय प्रभु जगअभिराम । प्रनतपाल सियावर राम ।।५।।

संतोष शरण दीजै बहुनाम । बहु भटकेंउ अब लगै विराम ।।६।।


[८६]

देवन के देव जिन्हें भजैं महादेव ।

जो जग के विधाता पद रज चाहैं तेव ।।१।।

जग पूजै लक्ष्मी, लक्ष्मी भी पद सेव ।

राम सम राम उन सम नाहीं केव ।।२।।

जीवन मुक्त राम भजत मुनि गन जेव ।

दीनदयाल भजि दुर्लभ फल लेव ।।३।।

कहत वेद गुन वरनि, जानैं न भेव ।

पद कंज विमल रति मोहिं माँगे देव ।।४।।

[८७]

प्रभुजी नहि कोउ एक उपाय ।

अवगुन दोष समुझि सब अपने मन अतिसय सकुचाय ।।१।।

सोचत सरल मृदुलचित स्वामी तेहि छन अति पुलकाय ।

निज बुधि बल से राम दयामय नहि कोई राह देखाय ।।२।।

ताते सोच बिबस होइ प्रभु जी मम मन कहुँ घबराय ।

धरम-करम में मन नहि लगता छल कपट द्रोह लुभाय ।।३।।

नहि देखूँ कोई गुन ऐसा सकूँ जेहिं राम रिझाय ।

मति-दीन नहीं कोई कहीं मुझसा भटकूँ मैं जग में भरमाय ।।४।।

मन इतना चंचल है स्वामी जो मुझको देता बिचलाय ।


संतोष मन मति पावन करके कृपासिंधु लीजे अपनाय ।।५।।

[८८]

हर लो प्रभु मेरे अग्यान ।

ऐसी मति विद्यानिधि पाऊँ करता रहूँ आपका ध्यान ।।१।।

धीर धरम धुर दीनानाथ कभी न प्रभु छूटे तव साथ ।

जहाँ रहूँ प्रभु तव गुन गाऊँ सिर पे हो सदा तेरा हाथ ।।२।।

आगम निगम प्रसिद्ध पुरान जन का प्रभु रखते हैं मान ।

मेरा भी प्रभु यह अरमान चरन कमल देखूँ भगवान ।।३।।

सिर धरि तव पद पदुम पराग मगन रहँउ तुम्हरें अनुराग ।


हो जाए प्रभु विषय विराग प्रकाश मिले तव नाम चिराग ।।४।।

करुनाकर सुजान भगवान संतोष के सर्बस प्राणनिधान ।

रामभद्र भग्नेशकार्मुक भग्न होइ सब बिपति निशान ।।५।।

[८९]    

केहि विधि तोहिं मिलँउ करतार । जानौं नहि कोई ब्यवहार  ।।१।।

महिमा तुम्हरी अपरंपार । मैं प्रभु पाऊँ कैसे पार ।।२।।

पूजा जप तप शुभ आचार । नहि जानौं मैं सत्य बिचार ।।३।।

मैं नहि जानूँ वेद विधान । नहि सतसंगति की पहिचान ।।४।।


भटकूँ प्रभु मैं हूँ अज्ञान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।५।।

नाम जो लेता दयानिधान । हृदय से नहिं बाहर भान ।।६।।

जिह्वा कहि देती है राम । लेकिन मन में नहीं लगाम ।।७।।

जितने संभव हैं कुबिचार । मेरा मन सबका आधार ।।८।।

दीनबंधु प्रभु करुनाधाम । संतोष सुमति दीजै श्रीराम ।।९।।

[९०]

दीनानाथ श्रीरघुनाथ द्रवउ वेगि बिलंब न कीजे ।

दीनदयाल बड़े कृपाल दीनन पे सहजहिं तू पसीजे ।।१।।

असरन सरन जगत हित स्वामी देखि दशा दुख दूर करीजे ।

निराधार आधार राम प्रभु मोहि पर नाथ दया करि दीजे ।।२।।

आस विश्वास तुम्हीं सियानाथ मो कहुँ और नहीं दो-तीजे ।

संतोष के बल संबल अवलंब राम प्रभू जी कर गहि लीजे ।।३।।

[९१]

निराधार को अधार करुनामय रघुराई ।

पाहि कहत दुख दीन सुनावत राम लेहिं अपनाई ।।१।।

आरत दीन-मलीन पे कृपा गुन-गन रहे बताई ।

किहेउ प्रनाम राम प्रभु सकुचत कहि नहि जात सिधाई ।।२।।

भृगु जब लात हन्यो उर माहि प्रभु रहे चरन दबाई ।

कोमल चरन कुलिश ज्यों उर कहि प्रभु मुनिवर समुझाई ।।३।।

बिभीषन राखि लंकेश बनायो प्रभु अति मन सकुचाई ।

बन-बन भटके जन हित कारन दीनन को सुखदाई ।।४।।

राज नारि सुग्रीव गति, शवरी गीध अहिल्या पाई ।

करुनाकर प्रभु मोहिं बिलोकहु जन अभिमत फल दाई ।।५।।

बल संबल मम रामदयामय जानौ सब का गाई ।

कर पंकज सिर राखो संतोष सरन सुर साई ।।६।।

[९२]

आरतपाल अनाथ के नाथ करुणा क्षमा अगार ।

दीनदयाल शरनागतपाल सरल समर्थ उदार ।।१।।

असहाय-सहायक नहीं सहायक तुम बिनु नाथ हमार ।

निराश्रय हम जगताश्रय प्रभु सोचहु आप विचार ।।२।।

असरन-सरन तुम नाथ हमारे मिले मोहि शरन तुम्हार ।

निराधार-आधार राम प्रभु तुम ही मम आधार ।।३।।

करुनामय करुणा करके लीजे मोहि निहार ।

दीनबंधु दीन संतोष की सुनिए राम पुकार ।।४।।

[९३]   

राम करुनानिधि करि करुना मोहिं वेगिहं लेहु निहारी ।

एक बल मोहि रघुनायक तोहिं दीन मलीनन के हितकारी ।।१।।

कोटिक पतित व दीन उधारेउ तेहिं ते महाखल मैं कुविचारी ।

क्रूर कुटिल मो सम खोजत प्रभु मिलहिं न कहँउ बिचारी ।।२।।

पतितपावन अघ दोष नसावन जानि रहा मैं पुकारी ।

दया क्षमा के प्रभु तुम सागर लीजे शरन मँहु डारी ।।३।।

सहजकृपाल करो प्रभु कृपा देखि दशा सियानाथ हमारी ।

जतन करे कोटिक नहिं बनिहैं संतोष बिना तव कृपा सुधारी ।।४।।

[९४]

कब सुधि लैहो राम हमारी ।


है जग जाल बड़ा जंजाल सकौं न नाम पुकारी ।।१।।

भजनहीन काम क्रोध वश हौं सब भाँति अनारी ।

दीनदयाल बड़े हम दीन तुम दानी हम भिखारी ।।२।।

हाल जानत सब चाल बिपरीति मैं हूँ परम बिकारी ।

निराश उदास के प्रभु तुमही सदा एक हितकारी ।।३।।

करुणासागर अब सुधि लीजै राखो न नाथ बिसारी ।

संतोष कहै प्रभु कृपासागर गहिए बाँह हमारी ।।४।।

[९५]


करुनासागर राम हमारे पूछेंगे मम हाल ।

दीनदयाल दया करके कर देंगे निहाल ।।१।।

बड़ी बिकट है जग की माया कर में इसके जाल ।

राम बचाएं सो बच जाए इसमें नहीं सवाल ।।२।।

राम प्रभूजी जग के स्वामी हैं कालो के काल ।

राम राम कहते रहना है नहीं बजाना गाल ।।३।।

राम नाम में रमना ही जग में सच्चा माल ।

राम-राम संतोष पुकारो कौन भरोसा काल ।।४।।

[९६]

प्रभुजी मम सिर रख दो हाथ ।

चरण कमल पे नाथ तुम्हारे है अब मेरा माथ ।।१।।

सरल सबल मृदुलचित प्रभुजी तुम अनाथ के नाथ ।

एक अवलंब तुम्हीं जगस्वामी दूजा नहि मुझको रघुनाथ ।।२।।

जिसने भी प्रभु तुम्हें पुकारा किया उसे कृतार्थ ।

दीनदयाल दया के सागर तुम अग जग के नाथ ।।३।।

तुम सब जानत नाथ हमारे नहि कोई मेरे साथ ।

संतोष पुकारे रामदयामय सुधि लीजै राघुनाथ ।।४।।

[९७]   

नाथ न राखो मोहिं बिसार ।

पाहि नाथ दीन मैं स्वामी प्रनतपाल उदार ।।१।।

दीन बचन सुनि तज्यो न काहू केवल चरन अधार ।

अघ अवगुन दोष बहुत मोहि पाहीं कहि नहि जात अपार ।।२।।

पतितपावन अघ दोष नसावन तोहिं जानत संसार ।

करत प्रणाम बिभीषन राख्यो भेंटेउ भुजा पसार ।।३।।

राखि गोद में नीर बहायेउ गीध को तात उचार ।

बानर भालु भील बनवासी सबके राखनहार ।।४।।

दीन मलीनन के हितकारी कबहुँ कियो नहि बार ।


कहि दीजै प्रभु रामदयामय संतोषहु शरन हमार ।।५।।

[९८]

राजिवनयन दयालु दयानिधि मेरी ओर निहारो ।

नाथ अनाथन के तुम स्वामी महिमा अमित तुम्हारो ।।१।।

तुम बिनु और नहीं कोई मुझको तुमही नाथ हमारो ।

दीनानाथ और नहि जानौं तुम ही मोर सहारो ।।२।।

पतितपावन अघ दोष नसावन प्रभु मत मोहिं बिसारो ।

सबबिधि हीन दीन मैं स्वामी दयाधाम सब बिपति निवारो ।।३।।


कृपासिंधु अनघ करुनामय दीन सरन निराधार अधारो ।

चरन कमल रति देय सियावर पाप ताप से मोहि उबारो ।।४।।

दीनबंधु दुखहरन राम प्रभु दीन संतोष शरन महि डारो ।।५।।

[९९]

राजिवनयन सुधि लीजै हमार ।

वेगि पावत तुम पीर पराई मेंटत करहु न बार ।।१।।

कृपा सनेह सदन तुम स्वामी सुनि लीजै मोर पुकार ।

दारुन दीनता देखि द्रवउ प्रभु दीनन के रखवार ।।२।।

मन पुलकित श्रवन सुनि स्वामी सरल स्वभाव तुम्हार ।

यह बल ते प्रभु द्वार पे आयँउ सियावर परम उदार ।।३।।

राखहु छोड़हुँ जो मन कीजै और नहीं कोई द्वार ।

वेद पुरान साधु सुर मत ते दीन के पालनहार ।।४।।

युग-युग से प्रभु यह चलि आई पैठ दीनन दरबार ।

जगत जंगल बिच भटकूँ स्वामी एक तुम्हीं आधार ।।५।।

दीनबंधु दुखहरन दयानिधि संतोष को लीजै उबार ।।६।।

[१००]

राम कृपानिधि कृपा कर दो अब मेरे भगवान ।

मेरे इस जीवन तरु में आ जाए नव जान ।।१।।

पुष्पित हो जीवन तरु स्वामी मन मधुकर करे गुनगान ।

महक उठे जो फूलों से करती रहें बखान ।।२।।

एक पल भी न भूलूँ तुमको हर पल आए ध्यान ।

संतोष को भी प्रभु जगह मिलय चरणों में दयानिधान ।।३।।

[१०१]

प्रभुजी लो मुझको अपनाय ।

सहज सनेह दीन से स्वामी सदग्रंथ रहे बतलाय ।।१।।

रंकनेवाज बड़े रघुराज गुरवर कहेउ समुझाय ।

पतितपावन अघ दोष नसावन तुम सम नाथ नहीं को बाय ।।२।।

परम कुटिल कलुषित मन मेरा कृपा से पावन हो जाय ।

अघ अवगुन खानि तव गुनगन बल जब मन अति अकुलाय ।।३।।

रीति सदा रघुनाथ तुम्हारी आरत-दीन को होत सहाय ।

चरणकमल प्रभु छाड़ि तुम्हारा मुझको नहि को एक उपाय ।।४।।

तुम्हीं अवलंब नहीं हित कोई न मारग एक बुझाय ।

तुम्हरीं कृपा से रघुनायक दोष बिपति सब जाय नसाय ।।५।।

करुणानिधि करुणा करि कहिए निज पन प्रीति देखाय ।

संतोष सदा को हुआ हमारा प्रभुजी लो मोहिं कंठ लगाय ।।६।।

[१०२]


रामदयानिधि तोहिं पुकारूँ भरि अखियन में नीर ।

करुनासागर जनहित आगर पुलकित होत शरीर ।।१।।

शारंगधर प्रभु धीर धुरंधर राम बड़े रणधीर ।

दीन मलीनों के दुख से होते राम अधीर ।।२।।

बूड़त नाव मझधार हमारी प्रभु जी कर दो तीर ।

असरन सरन राम दुख हरन हर लो प्रभु मम पीर ।।३।।

ऐसी कृपा हो भगवन राम रटूँ ज्यों कीर ।

संतोष गहे है चरन तुम्हारा कर रख दो रघुवीर ।।४।।


[१०३]   

मम चित करहु राम भगवान ।

सुर नर मुनि प्रभु तुमको ध्यावैं करैं शारद शेष बखान ।।१।।

सरल मृदुलचित परमकृपाल गावत वेद पुरान ।

शिव उर मानस राजमराल तुमही दयानिधान ।।२।।

करुनासागर सब गुन आगर नहि को तोहिं समान ।

बल बुधि विद्या के सागर प्रभु तव सेवक हनुमान ।।३।।

शिव अज नारद सकल विशारद सके न कोई  जान ।

मंद मलिनमति मैं करौं केहि बिधि राम प्रभू गुन गान ।।४।।

आस विश्वास करय जो तव पद ताको सदा कल्यान ।

आरत दीन मलीन को राखत देत सदा प्रभु मान ।।५।।

बिपति विषम जल मोहि रघुनायक तव कृपा जलजान ।

मंद महाखल दीन मैं स्वामी नहि कछु मोहि पहिचान ।।६।।

अवगुन दोष छमहु जन जानि देहु विमल मति ज्ञान ।

संतोष शरन शरन दुखहारी राखो राम सुजान ।।७।।

[१०४]   

सुनहुँ राम रघुवीर गोसाईं ।

दुख जल सागर दीन दशा प्रभु नहि कोई समुहाई ।।१।।

केहि बिधि पार होंउ मैं स्वामी बोहित बेरा नहीं उपाई ।

बिचार तरंग बिबश मझधार कहुँ इत-उत कहुँ दूर पराई ।।२।।

बिकल परम प्रभु तोहिं पुकारूँ यहि क्षन तुम बिनु कौन सहाई ।

अब तब डूबि सकौं मैं स्वामी और विलंब किए न भलाई ।।३।।

दीनदयाल दया के सागर पल-पल अवसर जात नसाई ।

संतोष सँभारो गज गति स्वामी, राखो न अब करुणा बिसराई ।।४।।

[१०५]

दीनबंधु दुखहरन दयानिधि नहि झूठी प्रीति लगाई है ।

बालपने से मानस पढ़ि-पढ़ि कृपा से रति भाई है ।।१।।


अपना लीजे अब भगवन मुझको कितनी कठिनाई है ।

क्या-क्या कहते लोग यहाँ इसकी न समुहाई है ।।२।।

ऐसी कृपा कृपामय करिए जिससे सकों बताई है ।

श्रीरामचरन अब भी जनको उतना ही सुखदाई है ।।३।।

करुनासागर की करुना में कमी नहीं कोई आई है ।

न ही राघव ने अपनी विरद की रीति भुलाई है ।।४।।

साधु-संत सद्ग्रंथों ने किया झूठी नहीं बड़ाई है ।

संतोष के गुरू तुलसी मानस सब साँची बात बताई है ।।५।।


[१०६]

राजिवनयन शरन रखि लीजे ।

असर सरन सरन दुखहारी मम शिर कर धर दीजे ।।१।।

दीन दुखी प्रभु नहीं कोई मुझसा तुम सम दीनदयाल न दूजे ।

मंद मलिनमति क्रूर कुटिल मैं मन मति पावन कीजे ।।२।।

क्रोध लोभ रोगादि बिषयरति कृपासिंधु हरि लीजे ।

भटक अँधेरे में रहा स्वामी अब प्रकाश करीजे ।।३।।

संतत दासन देत बड़ाई मम हित देर न कीजे ।


अघ अवगुन छमि नाथ हमारे चरण कमल रति दीजे ।।४।।

दुहुँ कर जोरे संतोष पुकारे भगति विमल वर दीजे ।।५।।

[१०७]

प्रभू जी मोहिं वेगि से वेगि उबारो ।

एक तुम्हारी आस है भगवान दूजा नहीं हमारो ।।१।।

निज बुधि बल कछु काम न आए निशि-दिन तोहिं पुकारों ।

तुम सम तुम प्रभु और न कोई महिमा अमित तुम्हारो ।।२।।

काम दोष दुख रोग सतावैं भगत बिपति सब टारो ।

शरनागत की भीर हरत प्रभु येही मोर सहारो ।।३।।

मातु-पिता गुर स्वामि सखा प्रभु बिगड़ी मोर सुधारो ।

संघर्ष बिपति भव डूबत जन प्रभु निज कर आइ सम्हारों ।।४।।

दीन संतोष मीत हित रघुवर अब नहि और विसारो ।

राम घनश्याम हो मुझ चातक के स्वाति दया वृष्टि कारो ।।५।।

[१०८]

दीन पुकार रघुनाथ हिय ज्यों चोट करै तरवारि की धारी ।

परमधाम पहुँचत अति वेगिंह करय अधीर धीर धुर धारी ।।१।।

नाना रूप धरेउ यहि कारन दीनदयाल भगत हितकारी ।

बीच सभा में द्रुपद सुता की सुनत पुकार बढ़ायउ सारी ।।२।।


मुनि पत्नी को तारेउ दीनहित करुणाधाम श्रीराम अघारी ।

सहि संकट प्रभु राम दयानिधि करत सदा सुर साधु सुखारी ।।३।।

बन-बन फिरेउ छाड़ि निज धाम राम समान को पर उपकारी ।

आरतपाल परमकृपाल संतोष के नाथ रघुनाथ खरारी ।।४।।

[१०९]   

राजिवनयन क्यों मोहिं बिसारे ।

लोक वेद अरु साधु मत स्वामी तुम्हइ दीन अति प्यारे ।।१।।

मो सम दीन दयाल न तुमसे फिर क्यों ध्यान उतारे ।

पूजा भगति भजन नहि जानँउ जीवत तोहिं सहारे ।।२।।

अघ अवगुन खानि अग्यान कुटिल मैं आयँउ शरन तुम्हारे ।

सहजकृपाल दयाल जनरक्षक कोटिक दीन उधारे ।।३।।

जन की भीर अधीर करै तोहिं दौड़त दीन पुकारे ।

अब द्रवउ श्रीराम हमारे त्राहि-त्राहि संतोष पुकारे ।।४।।

            

।। श्रीसीतारामार्पणमस्तु  ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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श्रीराम चालीसा

।। श्री गणेशाय नमः ।।

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुःख नासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ तिनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । तिनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दे दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

दे मुंदरी हनुमन्त पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाए ।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़े प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दियेउ बड़ाई । संकट मोचन नाम धराई ।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहि राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु मान बड़ाई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनूग्रह कीजे नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कह भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।


राम चलीसा नेम ते पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु ताके हृदय निकेत ।।


।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।