सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली ।।

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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रविवार, 13 अगस्त 2023

पुष्पक विमान बड़ा दिव्य-चैतन्य विमान था- वह बोल और सुन भी सकता था

 

पुष्पक विमान जिसका वर्णन रामायण और श्रीरामचरितमानस आदि ग्रंथों में मिलता है, एक बहुत ही अद्भुत विमान था । इसका निर्माण स्वयं व्रह्माजी ने किया था । इसकी भव्यता, इसकी दिव्यता, आदि का वर्णन श्रीवाल्मीकि रामायण के सुंदर काण्ड में मिलता है ।

 

पहले यह कुबेर जी की सेवा में था । इसकी दिव्यता, भव्यता आदि देखकर रावण का मन इस पर आ गया और उसने कुबेर से इस विमान को युद्ध करके जीत  लिया-

एक बार कुबेर पर धावा । पुष्पक जान जीति लै आवा ।।

 

 जब भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त किया तो लंका से अयोध्या आने के लिए विभीषण जी ने पुष्पक विमान को रामजी की सेवा में प्रस्तुत किया । रामजी, सीताजी, लक्ष्मणजी और अन्य सखा जब अयोध्या पहुँच गए तब राम जी ने पुष्पक विमान से कहा कि अब तुम कुबेर की सेवा में चले जाओ । तब भगवान श्रीराम की आज्ञा पाकर पुष्पक विमान कुबेर जी की सेवा में चला गया-

 

उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि, तुम कुबेर पहिं जाहु ।

प्रेरित राम चलेउ सो, हरषु बिरहु अति ताहु ।।

 

यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि पुष्पक कोई सामान्य विमान नहीं था । वह दिव्य विमान था । चैतन्य था । इसलिए जब वह रामजी की प्रेरणा से चला तो कुबेर के पास जा रहा था इस बात का उसे हर्ष था और रामजी से उसका वियोग हो रहा था, इस बात का उसे दुख था । पुष्पक विमान बोल भी सकता था और सुन भी सकता था ।

 

  जब पुष्पक विमान कुबेर जी के पास पहुँचा तो कुबेर जी ने पुष्पक विमान को पुनः राम जी की सेवा में भेज दिया । इसलिए वह अयोध्या जी में आ गया और राम जी से स्वीकार करके अपनी सेवा में रखने के लिए निवेदन किया । रामजी ने कहा कि तुम मुक्त होकर विचरण करो और जब मुझे आवश्यकता होगी तब मैं तुम्हारा स्मरण करूँगा । तब तुम मेरी सेवा में आ जाया करना । अतः पुष्पक विमान रामजी की सेवा में आ गया था । जब आवश्यकता पड़ती थी तब वह रामजी की सेवा में प्रस्तुत हो जाता था । इस प्रकार पुष्पक विमान रामजी की सेवा में रहता था । और यह बड़ा ही दिव्य विमान था जो चैतन्य था । तथा इसकी कई विशेषताएँ थीं । जैसे यह बोल और सुन भी सकता था । आदि  ।

 

।। जय श्रीराम ।।

 

 

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

रामायण का पाठ और कथा कब और कितने दिनों में करना और सुनना चाहिए

रामायण की कथा पढ़ने और सुनने का बड़ा महत्व है । रामायण की कथा का बड़ा महात्म्य है । रामायण की कथा का महात्म्य श्री वाल्मीकि जी और स्वयं भगवान वेद व्यास ने बिस्तार से कहा है ।

 

वेद व्यास जी ने स्कंदपुराण में लिखा है कि नारद जी ने सनकादिक ऋषियों को बताया है कि रामायण की कथा नौ दिन में सुननी चाहिए । अर्थात रामायण की कथा का नवाह-पारायण कराना और करना चाहिए ।

 

  वेद व्यास जी ने कहा है कि वैसे तो रामायण की कथा कभी भी सुन सकते हैं । लेकिन तीन महीने विशेष हैं । 

  

स्कंद-पुराण के अनुसार  नवाह-पारायण का पाठ करना चाहिए और नौ दिन की कथा सुननी चाहिए ।

 

कार्तिक मास, चैत्र मास और माघ मास में रामायण की कथा सुनने का विशेष महत्व है । इन महीनों के शुक्ल पक्ष में रामायण की कथा सुनने का विशेष महत्व है । और नौ दिन में कथा सुनने पर जोर दिया गया है ।

 

 इन महीनों में स्वयं रामायण का पाठ किया जाय, नवाह-पारायण किया जाय तो बहुत लाभकारी होता है । इन महीनों के शुक्ल पक्ष की पंचमी से आरंभ करके नौ दिन की कथा सुननी चाहिए या स्वयं नवाह-पारायण करना चाहिए । ऐसा नारद जी ने  सनकादिक ऋषियों को बताया है और व्यास जी ने स्कंद पुराण में वर्णन किया है ।

  

।। जय श्रीराम ।।

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

रामायण का रामा दल और रावण दल का युद्ध: न भूतो न भविष्यति की उपमा वाला युद्ध


इस पृथ्वी पर अब तक कई युद्ध हो चुके हैं । जिसमें से दो युद्ध विशेष उल्लेखनीय हैं । रामायण का रामा दल और रावण दल  का युद्ध और महाभारत का युद्ध । महाभारत के युद्ध में अनेकानेक लोग शामिल हुए थे और यह युद्ध कुल अठारह दिनों में ही समाप्त हो गया था । दोनों पक्षों से काफी जन और धन की हानि हुई थी ।

       
 आज तक के सभी युद्धों में रामायण का युद्ध बड़ा भीषण और भयानक था । संत और ग्रंथ बताते हैं कि रामा दल और रावण दल के युद्ध जैसा रामा दल और रावण दल  का युद्ध ही है । ऐसा युद्ध न कभी पहले लड़ा गया और न ही भविष्य में लड़ा जायेगा और इसका पूरा-पूरा वर्णन देवताओं के लिए भी दुष्कर है । एक हजार मुख वाले शेषनाग जी भी इस युद्ध का पूरा-पूरा वर्णन कर पाने में समर्थ नहीं हैं ।


   रामा दल और रावण दल  का युद्ध दो महीने से अधिक समय तक चला था । युद्ध शुरू होने से अंत तक कुल सतासी दिन लगे थे । बीच में कुल मिलाकर पन्द्रह दिन युद्ध विराम था । युद्ध विराम वाले दिनों को निकाल देने पर कुल बहत्तर दिन बचते हैं । इस प्रकार रामायण में रामा दल और रावण दल  का युद्ध कुल बहत्तर दिन अर्थात दो महीने और बारह दिन तक चला था । इससे ही इस युद्ध की भीषणता और विकरालता का थोड़ा अनुमान लगाया जा सकता है ।


 यह युद्ध दुनिया का एक मात्र ऐसा युद्ध है जो दो महीने से अधिक समय तक चला और जिसमें एक पक्ष से कोई जन हानि नहीं हुई ।


  जितने भी वानर-भालु युद्ध में मारे गए थे उन्हें भगवान राम ने जीवित कर दिया था । इस प्रकार रामादल से कोई जन हानि नहीं हुई थी । इसलिए ही ग्रंथों में राम जी को ‘मृतवानरजीवनः’ अर्थात मरे हुए वानरों को जीवन प्रदान करने वाले कहकर स्तुति की गई है ।


।। जय श्रीराम ।।


रविवार, 17 नवंबर 2019

अयोध्याजी का प्रभाव और अयोध्या में बसने का लाभ तथा अवधबासियों पर रामजी की कृपा


वेद, पुराण, और रामायण आदि में अयोध्या नगरी की महिमा गाई गई है । लेकिन अयोध्या नगरी की महिमा आसानी से सबके समझ में नहीं आती । इतना ही नहीं अयोध्या में रहकर भी, अयोध्या में जन्म लेकर भी लोग अयोध्या की महिमा नहीं समझ पाते ।


 अयोध्या में रहकर भी हो सकता है कि कोई राम जी से जुड़कर, रामजी का बनकर न रह पाए । हो सकता है कि अयोध्या में बसकर भी न राम जी को समझे और न ही अयोध्या जी की महिमा को । और रामजी तथा अयोध्याजी की बुराई करे । आदि ।


  इतना ही नहीं हो सकता है कि अयोध्या में बसकर भी कोई काम, क्रोध, लोभ और मोह-माया के वशीभूत होकर रहे, छल-कपट में अनुरक्त रहे । अपने जीवन को धन्य न कर सके । 


 लेकिन राम जी बड़े दयालु हैं । उदार हैं । सहजकृपालु है । इसलिए जो कोई भी अयोध्या में बसता है । वह भले ही जाने-अनजाने माया-मोह में फँसा हो,  उसे किसी न किसी जन्म में राम जी कृपा प्राप्त हो जाती है । और वह राम परायण हो जाता है -

कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई । राम परायण सो परि होई ।।


केवल मनुष्य ही नहीं अयोध्या में बसने वाले अन्य जीव-जन्तु भी किसी न किसी जन्म में राम परायण हो जाते हैं ।


  अयोध्या जी की महिमा तब तक जीव के समझ में नहीं आती जब तक वह राम परायण नहीं हो जाता । जब जीव राम परायण हो जाता है तब हाथ में धनुष लेकर राम जी उसके ह्रदय में बस जाते हैं –


अवध प्रभाव जान तब प्रानी । जब उर बसहिं राम धनु पानी ।।

 
 वेद, पुराण और अन्यान्य सदग्रंथों का यही मत है ।



।। जय श्रीराम ।।


रविवार, 22 सितंबर 2019

भगवान राम का वर्णन किस-किस ग्रंथ में है- सबकुछ राममय है


कई लोग समझते, सोचते अथवा मानते हैं कि भगवान राम का वर्णन केवल रामायण और श्रीरामचरितमानस जी में हैं । लेकिन ऐसा समझना, सोचना अथवा मानना अज्ञानता है ।


 भगवान राम का वर्णन किस-किस ग्रंथ में है ? ऐसा न पूछकर पूछना चाहिए कि भगवान राम का वर्णन कहाँ नहीं है ?


 वेद-उपनिषद, पुराण, नीति ग्रंथ, स्मृति-संहिता, महाभारत, रामायण और श्रीरामचरितमानस आदि सबमें रामजी का वर्णन है ।


चार वेद हैं । वेदों की अनेक शाखाएं हैं । ऋग्वेद की इक्कीस, यजुर्वेद की एक सौ नौ , सामवेद की हजार और अथर्वेद की पचास शाखाएं हैं । और वेदों की शाखाओं के अनेक उपनिषद हैं । 


 रामरहस्योपनिषद, रामतापनीयोपनिषद, वासुदेवोपनिषद, मुद्रलोपनिषद, शांडिल्योपनिषद, पैंगलोपनिषद, भिक्षुकोपनिषद, महोपनिषद, शारीरकोपनिषद, तथा योगशिखोपनिषद में भगवान राम के व्रह्म स्वरूप की महिमा का निरूपण किया गया है ।


इसीतरह लगभग सभी पुराणों में जैसे अग्नि पुराण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, शिव पुराण, विष्णु पुराण आदि में राम जी की महिमा का वर्णन हैं । इनमें से पद्मपुराण और स्कन्दपुराण में भगवान राम की कथा और महिमा का विशेष वर्णन है ।


महाभारत में भी भगवान श्रीराम की कथा और महिमा का वर्णन है । अनेक रामायण हैं । सबमें रामजी की महिमा का वर्णन है ।


 श्रीरामचरितमानस जी में कही गई प्रत्येक बात का उल्लेख किसी न किसी ग्रंथ में है । रामरहस्योपनिषद में कहा गया है कि सभी पुराणों, स्मृतियों, वेदों, शास्त्रों, चारों विद्याओं, तथा आध्यात्मिक दर्शन का परमतत्व श्रीराम हैं । इतना ही नहीं विघ्नेश्वर गणेश, सूर्य, ईश्वर, शक्ति आदि का मूल तत्व श्रीराम हैं । इन्ही सब तथ्यों को श्रीरामचरितमानसजी में इस प्रकार कहा गया है-


वन्दौं नाम राम रघुवर को । हेतु कृशानु, भानु हिमकर को ।।
विधि, हरि हर मय वेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ।।


इस प्रकार भगवान राम की अतुलित महिमा है ।  भगवान राम सभी के लिए पूजनीय, वंदनीय और आदरणीय हैं । सभी ग्रंथों, देवी-देवताओं और चर-अचर के मूल तत्व हैं । हर जगह राम जी का ही वर्णन है । सबकुछ राममय है । रामजी के सिवा कुछ नहीं है । 

  इसलिए सभी शंकाओं को त्यागकर 'रामहि सुमिरिए गाइए रामहि । संतत सुनिए राम गुन ग्रामहि ।। का अनुसरण करके मानव जीवन को सार्थक करना चाहिए ।


।। जय श्रीराम ।।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

युधिष्ठिर जी के प्रश्न और व्यास जी के उत्तर: तत्व, श्रेष्ठ मंत्र और मोक्ष देने वाला साधन क्या है ?


एक बार युधिष्ठिरजी ने व्यासजी से कहा कि आप योगियों में श्रेष्ठ हैं । संपूर्ण शास्त्रों के विद्वान हैं । अतः मैं आपके श्रीमुख से सुनना चाहता हूँ कि तत्व क्या है ? सर्वोत्तम जपनीय मंत्र क्या है ? तथा मोक्ष देने वाला साधन क्या है ?


वेदव्यासजी ने कहा कि हे महाभाग धर्मराज जो सर्वोत्कृष्ट, तीनों गुणों से अतीत, निर्मल एवं कल्याणमय है । वही परम तत्व है ।


 वेदव्यासजी ने आगे कहा कि ‘श्रीराम’ यह परम उत्तम जपनीय मंत्र है । इसीको ‘तारक व्रह्म’ कहा गया है । ऐसी वेदवेत्ताओं की मान्यता है ।


जो लोग ‘श्रीराम राम’ इस मंत्र का सदा जप करते हैं । उन्हें भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त होंगे । इसमें संशय नहीं है ।


  इस प्रकार वेदों का विभाग करने वाले परम संत, परम योगी और सभी पुराणों, अन्यान्य ग्रंथों के रचियता, महाभारत के प्रणेता और अनेकानेक ग्रंथ तथा रामायण लिखने वाले व्यासजी ने युधिष्ठिर जी से वेदवेत्ताओं से अनुमोदित तत्व, परम जपनीय मंत्र और मोक्ष के साधन का निरूपण किया ।


।। जय श्रीराम ।।

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

वास्तविक विद्वान और वास्तविक मूर्ख: भगवान राम की लीला और गुण का प्रभाव


वेद, उपनिषद, रामायण, पुराण आदि भगवान राम की महिमा और उनकी ईश्वरता का गायन मुक्त कंठ से करते हैं । लेकिन भगवान राम की लीला देखकर-सुनकर कई लोग धोखे में पड़ जाते हैं और उनके मन में नाना तरह की शंकाएं घर कर लेती हैं ।

            
इसलिए शंकर जी, पार्वतीजी से श्रीराम कथा सुनाते हुए कहते हैं कि ‘हे उमा राम जी के गुण, उनकी लीला बहुत गूढ़ है । जो सबके समझ में नहीं आती । रामजी की लीला को देख-सुनकर विद्वान और मुनि जन को संसार से वैराग्य और रामजी से अनुराग हो जाता हैं । और वहीं दूसरी ओर जो विशेष मूर्ख हैं उनके मन में मोह उत्पन्न हो जाता है ।


विशेष मूर्ख अथवा वास्तविक मूर्ख वे लोग होते हैं जिन्हें धर्म से प्रेम नहीं होता है । अर्थात जो धर्म-अधर्म नहीं मानते । तथा जो भगवान से विमुख होते हैं ।


 वास्तविक विद्वान वे हैं जो भगवान से बिमुख नहीं हैं । तथा जिनके धर्म और अधर्म का बिचार होता है ।


ऐसे में जो विशेष यानी वास्तविक मूर्ख हैं उन्हें रामजी की लीला और गुण को देख-सुनकर मोह हो जाता है । अर्थात वे कहने अथवा सोचने लगते हैं कि रामजी तो राजकुमार थे । भगवान नहीं थे इत्यादि । और जो वास्तविक विद्वान हैं उन्हें भगवान राम की लीला-कथा से संसार से विराग और रामजी से अनुराग हो जाता है । इसलिए ये रामजी से जुड़ जाते हैं । और वास्तविक मूर्ख रामजी से मुड़ जाते हैं ।


इस प्रकार जो रामजी से जुड़ा है वही वास्तव में विद्वान है और जो रामजी से मुड़ा है वही वास्तव में मूर्ख है ।


।। जय श्रीराम ।।

बुधवार, 29 अगस्त 2018

गुरजन से प्रश्न और उनका अपमान: सनातन धर्म में प्रश्न और संवाद की महत्ता को कम करना बहुत गलत परंपरा है

अपने अधिकांश ग्रंथ पूछे गए प्रश्नों के उत्तर ही हैं । संवाद के रूप में हैं । रामायण और पुराण आदि संवाद ही तो हैं । प्रश्नों के उत्तर ही हैं । लेकिन आजकल संवाद और प्रश्न की परंपरा लगभग लुप्त होती जा रही है ।



मैंने कई बार कहा है कि सनातन धर्म के मूल सिद्धांत वैज्ञानिक हैं । गणतीय हैं । यह मेरा अनुभव है । और मैंने कई बार कई उदाहरणों से इसे स्पष्ट करने का भी प्रयास किया है । मेरा यह मानना और कहना है, और कई बार कह भी चुके हैं कि गणित और विज्ञान की जानकारी होने से सनातन धर्म को और अच्छी तरह से समझा जा सकता है । कई बार ऐसा भी बोल देता हूँ कि यदि किसी को गणित ठीक से समझ में आ जाये तो उसे भगवान समझ में आ जाएँगे । और अपने यहाँ तो गणित और विज्ञान आरंभ से ही धर्म-वेद के विशिष्ट अंग रहे हैं । सनातन धर्म में आयुर्विज्ञान और गणित आदि मूल धर्म ग्रंथ के भाग हैं । अन्यत्र ऐसा मैंने नहीं सुना है ।



  शास्त्रों में कहा गया है कि गुरजनों की सेवा प्रश्नों से करनी चाहिए । आजकल बताया जाता है कि गुरु से प्रश्न नहीं करना चाहिए । प्रश्न गुरजन से नहीं करेंगे तो किससे करेंगे ? और बिना प्रश्न के विकास कैसे होगा ? ज्ञान का प्रकाश कैसे होगा ?




आजके समय में प्रश्न करना गुरु की अवमानना समझा और समझाया जाता है । जबकि गुरु कुछ कहें अथवा बताएं तो उसमें भी विनम्रतापूर्वक अपनी बात कहने में कोई गलत नहीं है ।  इससे अपमान नहीं होता है । बल्कि संशय का समन और शुद्ध ज्ञान-विज्ञान का उदय होता है ।



अपने यहाँ ऐसा भी नहीं था कि जो मैंने ज्ञान-विज्ञान और भगवान के बारे में कह दिया वही अथवा उतना ही सही है । वही अंतिम सत्य नहीं माना जाता था । इदिमिथ्यम, नेति-नेति और चरैवेति-चरैवेति इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । नित नूतन ज्ञान-बिज्ञान की ओर अग्रसर होना और अंधकार से प्रकाश की ओर जाना सनातन धर्म का मूल लक्ष्य है ।



कुल मिलाकर प्रश्न करना, सुनना और उत्तर देना एक स्वस्थ परंपरा के जरूरी अंग थे । इसकी महत्ता को बनाये रखना और प्रोत्साहित करना चाहिए । इससे सनातन धर्म को जीवटता मिलेगी और लोग अधिक लाभांवित हो सकेंगे ।



।। जय श्रीसीताराम ।।


शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

माता-पिता को वृद्धाश्रम में रखने से सभी साधन निष्फल हो जाते हैं

माता-पिता का जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता है । रामायण आदि ग्रंथों में माता-पिता की महिमा गाई गई है । आजके समय में कई लोग माता-पिता को वृद्धाश्रम में डाल देते हैं । और समझते हैं कि इससे उनका जीवन सुखमय रहेगा । लेकिन यह भूल है । बहुत बड़ी भूल है ।


कई लोग ऐसा करके भी कथा सुनते हैं, कराते हैं, सत्संग करते, कराते हैं और तीर्थ यात्रा भी करने चले जाते हैं । लेकिन इसका क्या फायदा ? कई लोग समझते हैं कि माता-पिता से अब क्या प्रयोजन ? इनके घर में रहने से झंझट ही रहेगा । इसलिए इन्हें दूर कर दो इसी में लाभ है ।


लेकिन ग्रंथों के अनुसार माता-पिता के आदर से, सेवा से सुख-शांति आती है । जीवन सुखमय रहता है । इसके विपरीत माता-पिता को दूर करके सुख का भले अनुभव हो लेकिन वास्तविक सुख नहीं मिलता । चैन नहीं मिलता और अशांति बनी रहती है । लोग समझ नहीं पाते लेकिन जीवन में उपद्रव आते रहते हैं । और किसी तरह से इनसे निजात नहीं मिलती ।


ऐसे लोंगो को किसी भी साधन अथवा साधना से लाभ नहीं होता है । इनका कोई भी धार्मिक कर्म बुझी हुई अग्नि में आहुति डालने के समान निष्फल हो जाता है । लेकिन इस कराल कलिकाल में सबके सोच-विचार बदल गए हैं । लोग अवगुण को गुण और गुण को अवगुण समझने लगे हैं –


रामदास कलिकाल में मति सबकी गै रूठ ।
ठूठे को समझत हरा हरे पेड़ को ठूठ ।। 

                          (दोहा संग्रह- ‘मानव माने होय’ से । )


ऐसे में सही और गलत का विवेक कैसे होगा ? गलत करके सही समझेगा और सुख का अनुभव करेगा । और कल्याण से वंचित हो जाएगा ।


जैसे कभी-कभी कुत्ते भूख के चलते सूखी हड्डी चबाने लगते हैं । और हड्डी के मुख में गड़ने से उसके ही मुख से रुधिर निकलने लगता है और उस रुधिर का पान करके कुत्ता सुख का अनुभव करता है । वह यह नहीं समझ पाता कि हड्डी में कोई रस नहीं है वह तो स्वयं का खून पी रहा है । स्वयं का नुकसान कर रहा है । ऐसे ही विवेक शून्य व्यक्ति अपना ही नुकसान करके सुख का अनुभव करते हैं और जीवन में कष्ट भोगते रहते हैं ।



।। जय श्रीसीताराम ।।


शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

रामायण और कृतज्ञता: कृतघ्न का समाधान नहीं

जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त हम अनेकों लोंगो से, अनेकों चीजों से लाभान्वित होते हैं । इसमें चर-अचर सभी शामिल हैं । अनेक माध्यम से जीवन पर्यन्त कुछ न कुछ सीखते रहते हैं । हम जहाँ कहीं भी जिस किसी मुकाम पर होते हैं वहाँ तक पहुँचने में अनेक लोंगो की मदद हमें प्राप्त होती है । इसलिए हमें सबके प्रति कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए । यह सिलसिला घर-परिवार से शुरू होकर देश-समाज तक जाता है । यह शिक्षा हमें रामायण जी से और राम जी से मिलती है ।


रामायण एक तरह से मानव विज्ञान है । मानव मनोविज्ञान है । मानवता का विज्ञान है । मनुष्य को कैसे रहना चाहिए ? देश, समाज और परिवार के प्रति कैसा कर्तव्य होना चाहिए ? रामायण से हमें इसकी शिक्षा मिलती है ।


सनातन धर्म में कृतज्ञता का बहुत महत्व है । हर किसी को कृतज्ञ होना चाहिए । यहाँ तक कहा गया है कि कृतघ्न मनुष्य का कोई समाधान नहीं है । सुगति नहीं है । इसलिए कृतज्ञता का भाव होना बहुत जरूरी है । हमें चर-अचर सबके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए यह हमारी सनातन संस्कृति का हिस्सा है । सनातन धर्म की सीख है । रामायण की सीख है । राम जी की सीख है ।


हमारे राम जी बहुत ही कृतज्ञ हैं । और उन्होंने हम लोंगो को भी यही सिखाया है । चाहे गीध जटायु हों, चाहे वानर-भालु हों सबके उपकार की बड़ाई राम जी करते हैं । और इतना ही नहीं यहाँ तक कहते हैं कि मैं ही नहीं आपका यह उपकार रघुकुल कभी नहीं भूलेगा ।


जब हनुमान जी महाराज सीता माता का पता लगाकर राम जी के पास वापस आए तो राम जी ने कहा कि पुत्र हनुमान मैं तो आपका ऋणी हो गया हूँ । इस उपकार के बदले कोई प्रतिउपकार मुझसे नहीं बन पायेगा । मैं कभी भी आपसे उरिण नहीं हो पाउँगा । इस प्रकार से राम जी कृतज्ञता की सीमा हैं । परम कृतज्ञ हैं ।


कृतज्ञ होना मानव का लक्षण हैं और कृतघ्न होना दानव का लक्षण हैं । इसलिए प्रत्येक मनुष्य को कृतज्ञ होना चाहिए । कृतघ्नता का कोई उपचार नहीं है ।




।। जय श्रीसीताराम ।।

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सोमवार, 13 नवंबर 2017

देश प्रेम और रामायण: जन्मभूमि की मिट्टी का महत्व

हर किसी को अपने देश से प्रेम करना चाहिए । अपने जन्म भूमि की मिट्टी का आदर करना चाहिए । देश प्रथम की अवधारणा ऊँची और सही सोच को दिखाती है । यह संदेश हमें रामायण से मिलता है । रामराज्य से मिलता है ।


जन्म भूमि की मिट्टी का बड़ा महत्व होता है । एक तरह से यह हमारी माता है । तभी तो हमलोग भारत को भारत माता कहते हैं । जैसे माता-पिता का ऋण होता है ठीक वैसे ही  हर किसी पर देश का ऋण होता है । 


देश की मिट्टी का पूजन करना चाहिए । यह संदेश भी हमें रामायण से मिलता है । शायद अधिकाँश लोंगो को पता ही नहीं होगा कि राम जी भी अपनी मिट्टी की पूजा करते थे । वन जाते समय मिट्टी लेकर गए थे और पूजन करके शीस झुकाया करते थे ।


रामायण में तो जन्मभूमि की तुलना जन्म देने वाली माता से की गई है और जन्म भूमि को जन्म देने वाली माता के समान बताया गया है । रामजी ने तो यहाँ तक कहा कि लोग कहते हैं कि मैं वैकुण्ठ में रहता हूँ लेकिन मुझे अपनी जन्भूमि तो वैकुण्ठ से भी ज्यादा प्रिय है ।

                                          
जननी और जन्मभूमि की बड़ी महिमा है । इनका स्थान सबसे ऊँचा है । वाल्मीकि रामायण में रामजी ने जन्म देने वाली माता और जन्म भूमि दोंनो को स्वर्ग से भी ऊँचा बताया है- ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ ।





        ।। जय श्रीसीताराम ।।



रविवार, 24 मार्च 2013

गणित और व्रह्मांड



ईश्वर और संसार के कई गुण अथवा रहस्य उच्च गणित में मिलते हैं । व्रह्मांड के के कई रहस्य गणित से समझे जा सकते हैं । यह महज एक सयोंग अथवा हठात योग नहीं है । इस वात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । इसलिए ही सनातन धर्म के धर्म ग्रंथों में गणित को भी उचित स्थान मिला था । बाद में भले ही गणित का उचित विकास भारत में नहीं हो पाया । सनातन धर्म ही ऐसा धर्म है जिसके परम प्राचीन और पवित्रम ग्रंथ में गणित का वर्णन मिलता है ।


शून्य की खोज किसने की ? इस पर लोगों में मतभेद हो सकता है । लेकिन आर्यभट्ट से भी बहुत पहले वेदों में और रामायण में भी शून्य का उल्लेख मिलता है । और गणना में इसका उपयोग मिलता है । पुराणों और अन्य सनातन धार्मिक ग्रंथों में गणित और विज्ञान के सिद्धांतों का समावेश मिलता है ।


  वेदांग ज्योतिष में एक श्लोक है जो कहता है- “जैसे मयूरों में शिखा और नागों में मणि शीर्ष स्थान पर होती हैं । ठीक ऐसे ही सभी वेदांग शास्त्रों में गणित शीर्ष पर विराजमान है” । यह गणित के महत्व को बताने वाला श्लोक है । जिसे तब हमारे ऋषियों ने दिया जब विश्व के अन्य क्षेत्रों में किसी को भी गणित का कोई ज्ञान नहीं था ।


   महावीराचार्य ने तो यहाँ तक कहा है कि तीनों लोकों में सचर और अचर जितनी भी वस्तुएँ हैं उनका अस्तित्व गणित के बिना नहीं है । अर्थात बिना गणित के उन्हें ठीक से नहीं जाना जा सकता है ।

   

  इसका मतलब है कि व्रहमांड को समझने के लिए भी गणित की जरूरत है । और यह बात जो कई हजार साल पहले हमारे ऋषियों ने कहा था आज सही साबित हो चुकी है ।
                   
आजकल व्रह्मांड को गणितीय नियमों और समीकरणों (जैसे श्रोडिंगर समीकरण, डिराक समीकरण, मैक्सवेल समीकरण, आइंस्टीन समीकरण इत्यादि) के आधार पर वैज्ञानिक और गणितज्ञ समझने का प्रयास कर रहे हैं । ए सभी समीकरण पार्सियल डिफेरेंसियल समीकरण हैं जिनका उपयोग व्रह्मांड और इसकी संरचना को समझने में किया जा रहा है ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि व्रह्मांड गणितमय है । गणित का अब तक बहुत विकास हो चुका है । और दिनों-दिन विकास हो रहा है । और उच्च गणित जटिल होती जा रही है । और अब तक के गणित से व्रह्मांड का कुछ अंश मात्र ही समझा जा सका है । ऐसे में व्रह्मांड को और अधिक समझने के लिए बहुत ही जटिल गणित की जरूरत होगी ।


।। जय श्रीसीताराम ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए । तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

“नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू” ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

“रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं” ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

“प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े” ।

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

‘निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा’ ।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत ।

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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