एको देवो रामचंद्रो...

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।

रविवार, 7 मई 2017

पवनतनय के चरित सुहाए-५ (हनुमान जी का लंका में प्रवेश और विभीषण जी से सम्वाद)

हनुमान जी महाराज बहुत ही सूक्ष्म रूप बनाकर और राम जी का सुमिरण करके लंका में प्रवेश कर गए । हनुमानजी ने प्रत्येक मन्दिर में सीता जी को खोजा । उन्हें जहाँ-तहाँ अनेकों योद्धा दिखाई पड़े । इसी क्रम में सीता जी को खोजते हुए हनुमान जी रावण के मन्दिर में गये जो बहुत ही विचित्र थी, जिसका वर्णन नहीं हो सकता । रावण वहाँ सो रहा था और मन्दिर में सीता जी नहीं थीं । 

 
हनुमान जी इस प्रकार सभी मंदिरों में जा-जाकर सीता जी को खोजा लेकिन सीता जी का कहीं पता नहीं चला । हनुमान जी थोड़ा सोच में पड़ गए कि अब क्या करूँ । तब मन ही मन श्री रघुनाथ जी का ध्यान किया और पं. राधेश्याम जी के शब्दों में ऐसी विनती किया कि -

श्रीराम जय राम जय जय राम ।
श्रीराम जय राम जय जय राम ।।
मेरा बल बुद्धि पराक्रम आए तनिक न काम ।
अपने बल से कार्य अब पूर्ण करा लो राम ।।
भटक अँधेरे में रहा स्वामी हो निराश अविराम ।
दो प्रकाश मुझ दास को हे रविकुल रवि राम ।।


  इतना कहते ही उन्हें एक घर दिखाई पड़ा जो बहुत ही सुंदर लग रहा था । और वहाँ अलग से एक हरि मन्दिर बना हुआ था । घर में रामजी के आयुध धनुष और वाण आदि अंकित थे घर की शोभा कही नहीं जा सकती है । नए-नए तुलसी पौधों के समूह थे जिन्हें देखकर हनुमान जी महाराज बहुत ही हर्षित हुए ।


उपरोक्त लक्षण सज्जन के घर के लक्षण थे । लेकिन लंका में तो राक्षसों का ही निवास था । इसलिए यह स्वाभाविक प्रश्न था कि राक्षसों के बीच में सज्जन कैसे रह सकता है । क्या यह सच है अथवा दिखावा है, धोखा है । हनुमान जी मन में ऐसा तर्क करने लगे । इसी बीच में विभीषण जी जाग उठे । सुबह का समय था और सज्जन सुबह तड़के ही यानी व्रह्म मुहूर्त में ही जगते हैं । दूसरे सज्जन जगते ही अपने ईष्ट का ध्यान यानी सुमिरण करते हैं । और विभीषण जी भी जगते ही राम-राम कहा जिससे हनुमान जी को हर्ष हुआ और उन्हें निश्चय हो गया कि यह सज्जन है । सज्जन का मतलब भक्त ह्रदय । जो राम जी का है वही सज्जन है ।


  सज्जन व्यक्ति से हर किसी का भला ही होता है । भला न भी हो तो बुरा तो कभी होता ही नहीं । इसलिए हनुमान जी ने सोचा कि इनसे जरूर जान-पहिचान करूँगा यानी मिलूँगा क्योंकि सज्जन व्यक्ति से कोई हानि नहीं होती है । यदि वह किसी का कोई काम नहीं बना सकता तो बिगाड़ता भी नहीं ।


हनुमान जी ने बिप्र का रूप बनाकर राम-राम कहा और सुनते ही विभीषण जी उठकर दौड़ते हुए आए और प्रणाम करके उनकी कुशल पूछा और कहा कि आप अपनी कथा सुनाइए । विभीषण जी ने कहा कि मेरे ह्रदय में बहुत प्रेम उमड़ रहा है इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप या तो भगवान के भक्तों में से कोई हैं अथवा आप दीनों से सहज ही प्रेम करने वाले दीनानुरागी साक्षात भगवान श्रीराम ही हैं जो अपनी ओर से मुझे बड़भागी बनाने के लिए चले आए हो ।


विभीषण जी के ऐसा कहने पर हनुमान जी ने अपना नाम बताया और राम जी की कथा सुनाई । भक्त भगवान की ही कथा सुनते-सुनाते हैं, अपनी अथवा किसी और की नहीं । सुनकर और सुनाकर दोंनो लोग के तन और मन पुलकित हो गए और राम जी के गुणों को याद करके आनन्दित हो गए ।


फिर विभीषण जी हनुमान जी से बोले कि हे पवनपुत्र मेरी रहनी सुनिए कि लंका में मैं किस प्रकार रहता हूँ । मैं लंका में ठीक वैसे ही रहता हूँ जैसे बत्तीस दांतों के बीच में जिह्वा रहती है । कब कौन सा दाँत जीभ को काट दे पता नहीं होता । और जीभ दांतों को तो काट नहीं सकती । वह बस चाट सकती है । जब दाँत में दर्द हो अथवा कुछ फस जाय तो जीभ उसे सहलाती रहती है । लेकिन दाँत मौका मिलते ही जीभ को भी चबा लेते हैं ।


हे तात क्या कभी मुझको अनाथ जानकर रघुकुल के नाथ श्रीराम जी मेरे ऊपर कृपा करेंगे । क्योंकि मेरा शरीर तामसी है और मेरे पास कोई भी साधन जैसे पूजा, जप, तप आदि नहीं है । और न ही रामजी के चरण कमलों में प्रेम ही है ।


 फिर विभीषण जी ने कहा कि अब मुझे विश्वास हो गया है कि बिना राम जी की कृपा के साधु जन से मिलना नहीं होता । राम जी ने मेरे ऊपर कृपा की है तभी तो आप अपनी ओर से मुझे दर्शन देने चले आए ।


हनुमान जी ने विभीषण जी को समझाते हुए कहा कि विभीषण जी  राम जी की रीति सुनिए । राम जी सदा अपने सेवक से प्रेम करते हैं । यह उनकी रीति और सेवक से प्रीति है ।  आप अपने मन को छोटा न कीजिए । मेरी ओर देखिए । मैं ही कहाँ बहुत कुलीन हूँ । बानर हूँ । और स्वभाव से ही चंचल हूँ और हर प्रकार से हीन हूँ । मतलब कोई योग्य नहीं हूँ । इतना ही नहीं कोई सुबह नाम भी ले ले तो उसे उस दिन आहार नहीं मिलता । मैं ऐसा अधम हूँ फिर भी मुझ पर भी रघुवीर राम जी की कृपा हुई है । राम जी की कृपा और गुण को याद करके हनुमान जी के आँखों में आँसू भर आए ।


वानर और भालुओं को बिकारी समझा जाता है । राम जी से पहले किसी ने बानर-भालुओं से ऐसा प्रेम नहीं किया था । ऐसा सम्मान नहीं दिया था । राम जी ने सबको अपना लिया, मित्र बना लिया, गले से लगा लिया । इसलिए विभीषण जी को समझाते हुए उनको बल देने के लिए हनुमान जी ने ऐसा कहा कि दीनता और हीनता भगवत प्राप्ति में बाधक नहीं हैं । राम जी तो दीन-हीन पर विशेष कृपा करते हैं ।


हनुमान जी ने कहा कि सहज कृपालु ऐसे स्वामी को जो लोग भूल कर संसार में भ्रमते हैं यदि वे दुखी रहें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । इस प्रकार राम जी के गुण समूहों को कहते हुए हनुमान जी को अपार-अलौकिक विश्राम-आनंद प्राप्त हुआ ।


फिर विभीषण जी ने सारी कथा कह सुनाई जिस प्रकार से सीता जी  अशोक वाटिका में रह रही थीं । तब हनुमान जी ने कहा कि हे भाई विभीषण अब मैं सीता माता का दर्शन करना चाहता हूँ । विभीषण जी ने सारी युक्ति बताई और हनुमान जी महाराज विभीषण जी से विदा लेकर चल दिए । हनुमान जी महाराज ने फिर से वही छोटा सा आकर बना कर अशोक वन में जहाँ सीता जी रहती थी चले गए ।


                                               (शेष भाग-६ में ।)




।। जय श्रीसीताराम ।।



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लोकप्रिय पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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श्रीराम चालीसा

।। श्री गणेशाय नमः ।।

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल राम नाम श्रीराम ।

चहु गुर पद रज शीस धरि सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुःख नासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ तिनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । तिनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दे दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

दे मुंदरी हनुमन्त पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाए ।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़े प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दियेउ बड़ाई । संकट मोचन नाम धराई ।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहि राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु मान बड़ाई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनूग्रह कीजे नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कह भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।


राम चलीसा नेम ते पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु ताके हृदय निकेत ।।


।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।