एको देवो रामचंद्रो...

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।

सठ सेवक की प्रीति रूचि रखिहहिं राम कृपालु

सठ सेवक की प्रीति रूचि रखिहहिं राम कृपालु । उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ।। श्रीरामचरितमानस ।।

रविवार, 6 अगस्त 2017

विनयावली (१-३१)

।। श्रीसीतारामाभ्यां  नमः।।

विनयावली


मंगलाचरण

[१]

प्रथम पूज्य विनायक पद रज सादर मैं निज शीस चढ़ावउँ

शंकर सुवन भवानी नंदन सदा सब काज निर्विघ्न करावउ ।।१।।

मातु सरस्वती के चरननि महुँ सादर मैं निज शीस झुकावउँ ।

विद्या वुद्धि प्रकास करौ माँ दीनदयाल राम गुन गावउँ ।।२।।

नमन करौं दिनमणि सुखदायक मोह निसा प्रभु दूर भगावउ ।

प्रीति पुनीति राम रघुवर पद दीन मलीन जानि प्रगटावउ ।।३।।

बन्दौं महादेव पद पंकज पार्वती कर जोरि मनावउँ ।

तातु-मातु कृपालु होउ जेहि रामचरन अंबुज रति पावउँ ।।४।।

प्रनवँउ दुर्गा दुर्गार्तिशमनि मातेश्वरि दुख दोष नसावउ ।

श्रीरामचन्द्र के चरण कमल हित माँ मधुकर मन मोर बनावउ ।।५।।

विनवँउ रमा समेत रमापति नाथ सकल कलि-कलुष मिटावउ ।

मम हिय मंदिर में करुनानिधि मंगलमूरति रूप बसावउ ।।६।।

चरन शीश धरि सिया मातु के मैं अपनी सब व्यथा बतावउँ ।

रामप्रिया जगजननि भवानी रामशरन माँ मोहि दिलावउ ।।७।।

भरत लखन रिपुदवन चरन मैं दुहुँ कर जोरे शीस नवावउँ ।

होउ सकल कृपालु मोहि पर रामचरन अविरल रति पावउँ ।।८।।

अपर देवतन के चरननि महुँ करि प्रनाम कर जोरि मनावउँ ।

श्रीरामचन्द्र घनश्याम के खातिर मम चित चातक-मोर बनावउ ।।९।।

महावीर हनुमान चरन गहि सादर मैं निज बिपति सुनावउँ ।

संकटमोचन पवनतनय संतोष राम संयोग करावउ ।।१०।।   

सिर धरि धरनि विनय करि सादर गुरजन भगत समाज मनावउँ ।

होउ दयालु दीन लखि सब कोउ सीताराम चरन रति पावउँ ।।११।।

दुहुँ कर जोरि रामपद पंकज सादर अनुनय विनय सुनावउँ ।

करुनासागर विरद उजागर दीन मलीन जानि अपनावउ ।।१२।।

    
[२]

बन्दँउ तुलसीदास के पद जो हारेउ जनम रघुनाथ निहोरे ।

प्रगटत ही नहि रूदन करि जो रामहि राम उचारे ।।१।।

दीन मलीन लखेउ रघुनायक प्रेरेउ नरहरि दास पधारे ।

संग लिवाय गए अपने अरु पावन रामकथा परचारे ।।२।।

चारो वेद पुरान सभी छहो शास्त्र के अनुपम ज्ञान निखारे ।

रामकथा रसलीन भए जपि नाम रहे प्रभु को चित धारे ।।३।।

सुजन सुजान उदार महान चातक ज्यों घन राम पियारे ।

काल कराल जानि जग तारन ‘मानस-विनय’ दिए दुख हारे ।।४।।

साधु सुजान मुदित मन गावत आप तरे अरु लोकहु तारे ।

रामकथा अरु राम चरन रति गुरु पायँउ मैं उपदेश तुम्हारे ।।५।।

‘राम राम’ गुरू मंत्र लियों अरु राम की आस दिन-राति निहारें ।

साष्टांग प्रणाम करौं पग में गुरुदेव कीजे स्वीकार हमारे ।।६।।

            [३]

नमन करौं छहो गुर पद पंकज छमहुँ नाम प्रगटाई ।

तुलसीदास प्रगट जस जागै पाए परम बड़ाई ।।१।।

कलिकालहुँ राम प्रीति पुर पाए राम नाम गुन गाई ।

दूसर मानस मति पट खोलत जेहिं ते कछु मति आई ।।२।।

तीसर राम नाम जग पावन रीझत जेहिं रघुराई ।

चौथे गुरू श्रीराम प्रभू जो अखिल जगत गति दाई ।।३।।

सरल सबल स्वामी गुर सर्बस मोरे एक गति भाई ।

पंचम पवनतनय गुन सागर दीन मलीन सहाई ।।४।।

छठे विनय प्रभु पद रति दायक शरन गहे सुखदाई ।

संतोष प्रीति प्रतीत बसय मन कहेंउ न बात बनाई ।।५।।


        [४]

वन्दौं श्रीरामचरितमानस विमल ।

ज्ञान-विज्ञान, धर्म-कर्म जेहि सर विकसे सुंदर कमल ।।१।।

सर्व साधारण, साधु, विद्वान प्रिय खोलत मति पटल ।

दारुण कलिकाल महुँ भव पार हेतु सम्बल सरल ।।२।।

सप्त सोपान युत सुंदर सरोवर शिव-शिवा महिमा कहत ।

सादर निमज्जत राम पद अनुराग जग कोउ नहि लहत ।।३।।

अनुपम भगति-विराग संजुत कहत सुनत समुझत बनत ।

अति पठनीय पढ़त सुख शांति संतोष सहजेहिं मिलत ।।४।।

                        [५]

मानस सर जग परम सुहावन । निर्मल सुंदर जन मन भावन ।।१।।

सहित रामगुन अतिसय पावन । सेवत सब अघ ओघ नसावन ।।२।।

रामचरन दृढ़ प्रीति करावन । जन मन लोभी दाम लुभावन ।।३।।

संतोष मन अति मोद बढ़ावन । बिषय बिकार समूल ढहावन ।।४।।

                    [६]

हम करते मानस गुनगान । संतन को जीवनधन प्रान ।।१।।

जितने भी हैं सुजन सुजान । सब करते इनका बहु मान ।।२।।

जानौ इनको वेद समान । मुद मंगल दायक भगवान ।।३।।

अनेकों जन ले मानस ज्ञान । बनि गए संत महंत समान ।।४।।

कितनों ने है किया बखान । हो गया पढ़िके कविता ज्ञान ।।५।।

कितने जन गन बन विद्वान । मानस से पाए प्रभु ध्यान ।।६।।

आगम निगम स्मृति पुरान । इनमें मिलता सबका ज्ञान ।।७।।

सर में सात रुचिर सोपान । राम भगति के पंथ समान ।।८।।

सुगम हैं सबको एक समान । अगम उन्हें जो फिरें भुलान ।।९।।

 [७]

सियाराम यश सुधा सरोवर का है पावन निर्मल नीर ।

प्रभु महिमा जितनी गहराई हरता सब अवगाहत पीर ।।१।।

देखे ज्ञान नयन सुख उपजे रामचरन मन पाए तीर ।

दीन संतोष सुजन मन भाये राम राम जिमि गाए कीर  ।।२।।

[८]

निर्मल ज्ञान विराग बढ़ाकर काम कोह मद मोह मिटाए ।

अद्भुत जल की सितलाई से पाप दोष दुख ताप मिटाए ।।१।।

सादर मज्जन पान किए से दारुण भव बाधा मिट जाए ।

जन को पूरणकाम है मानस जो सरवर सप्रेंम नहाए ।।२।।

धन मानस धन धन गुरु तुलसी जो जग मानस सुगम बनाए ।

सुजन साधु जानत सर महिमा संतोष कहाँ लगि गुन गन गाए ।।३।।

[९]

गुरू तुलसीदास ने लोंगो को सच्चा ज्ञान सिखाया है ।

जग में जाकर श्रीराम भजो जन-जन को समझाया है ।।१।।

दीन मलीनों को रघुवर ने सादर गले लगाया है ।

मानहिं केवल भक्ति का नाता मानस में यह आया है ।।२।।

परहित दया सत्य अहिंसा, को धर्म पुण्य बतलाया है ।

परपीड़ा निंदा झूठ हिंसा को, अधर्म-पाप बताया है ।।३।।

ज्ञान विराग भक्ति त्रिवेणी सुजनों को नहलाया है ।

उनके शुभ उपदेशों पे संतोष बहुत ललचाया है ।।४।।

[१०]

तुलसीदास गुरू ने सौंपी जन-जन को ऐसी थाती है ।

देखि जिसे सब साधु-सुजन की हर्षित होती छाती है ।।१।।

भवसागर से पार जो होना सीधा राह बताती है ।

श्रीराम नाम का जाप करो गति अनायास मिल जाती है ।।२।।

सत-पंच चौपाई मधुर-मनोहर चुन लो यह सिखलाती है ।

प्रेम से धर लो उर अंतर प्रभु राम कृपा हो जाती है ।।३।।

[११]

धरम-करम अरु पाप-पुण्य क्या मानस हमें बताती है ।

जन-जन से करिए प्रीति सदा मानस सबको समझाती है ।।१।।

सत्य-अहिंसा के मारग पर चलना हमें सिखाती है ।

गुरजन को आदर मान दया, सत्कर्म का पाठ पढ़ाती है ।।२।।

भारतीय-संस्कृत को मानस से जीवटता मिल जाती है ।

राम-राज्य का सुंदर वैभव मानस हमें दिखाती है ।।३।।

राजधर्म व जन्म-भूमि से प्रेम की ज्योति जगाती है ।

श्रीरामचंद्र के चरण-कमल में पावन प्रीति कराती है ।।४।।

[१२]

आर्य-धर्म के सद्ग्रंथों में मानस ऐसा गहना है ।

संत, साधारण, विद्वानों ने जिसे हर्षित होकर पहना है ।।१।।

अपने-अपने समझ वुद्धि से सब नाना अर्थ लगाते हैं ।

बहुतेरे उल्टा समझ रहे अरु उल्टा ही समझाते हैं ।।२।।

रामकृपा से मुझको भी कभी अपने मन का करना है ।

कल्याण छुपा है प्राणि-मात्र का मुझको इतना कहना है ।।३।।

[१३]

कैसे, क्या मैं कहूँ रचा गुर मानस ग्रंथ निराला है ।

धरम-करम के सभी मरम को मानस में कह डाला है ।।१।।

आर्य-संस्कृत के सारे रस को मानस सर में डाला है ।

साधु, सुजन मन मधुकर रस पी होता अति सुखवाला है ।।२।।

कुछ लोग भी ऐसे हैं जिसने दोंनो पे कीच उछाला है ।

उल्टा समझाकर नासमझों ने कुछ लोंगो का मन घाला है ।।३।।

समझ-समझ की बात है अपने नासमझों का मन काला है ।

इन संत-ग्रंथ दो रत्नों ने कितनों को दिया उजाला है ।।४।।

[१४]

गुरू तुलसीदास जो श्रीरामचरितमानस न गाते ।

परम मनोहर सहज कथा बिनु लोग अधिक भरमाते ।।१।।

भवसागर से तरने का सरल सुगम मारग न सुझाते ।

साधु सुजन जन प्रेरणादायक सुंदर उक्ति कहाँ पाते ।।२।।

बरबस ही लोंगो के मुख में पावन छंद कहाँ आते ।

सच में मानस न होती तो धरम-करम बहु मिट जाते ।।३।।

दीन संतोष हीन जन मोसे राम चरन नहि लगि पाते ।

मूढ़ मलीन बिबस कलिकाल जनम-जनम लगि फँसि जाते ।।४।।
    
 [१५]

जय गिरिजासुत जय गणनायक । विद्यानिधि सुंदर सब लायक ।।१।।

प्रथम पूज्य जय जयति विनायक । अष्ट सिद्धि नव निधि के दायक ।।२।।

सुर नर मुनि तेरे गुनगायक । जन रंजन गुननिधि वरदायक ।।३।।

जय लम्बोदर जयति गजानन । निरखत शम्भु उमा तव आनन ।।४।।

वेद शास्त्र आदिक के ज्ञाता । काव्य निपुण मानत पितु-माता ।।५।।

वदन कोटि रवि तेज बिराजै । सुमिरत सिद्ध होत सब काजै ।।६।।

मूषक वाहन मोदक भावै । जगतपूज्य जग तुमको ध्यावै ।।७।।

संतोष जथामति गुनगन गावै । विमल भगति रघुपति की पावै ।।८।।

   [१६]

जय दुर्गा दुर्गार्तिशमनि, भक्तन के दुख दोष दलनि ।

जगतजननि माँ शम्भु घरनि, देवन के भी त्रास हरनि ।।१।।

तव पद सेवत नहि दुर्लभ कछु, मुद् मंगल माँ सिद्धि सदनि ।

दुर्गमच्छेदनि दुर्गनाशनि माँ, पाप ताप भुवि भार दलनि ।।२।।

संतोष मन अभिलाषु मातु, दुरित दाह दारिद दरनि ।

दिन प्रति नेह बढ़े रघुपति पद, कबहूँ नहि माँ घटै लगनि ।।३।।

                       [१७]

गिरिजारमन चन्द्रमौलि गंगाधर, तुम सम दयालु कहाँ जग माहीं ।

बिषपान कियो देखत जग संकट, नाथ तव कृपा भव रोग नसाहीं ।।१।।

तव पद सेवत नहि दुर्लभ कछु, भाविउ को प्रभु मेंटि सकाहीं ।

गिरिजा अर्धंग त्रिपुरारि त्रिलोचन, कोउ अस जो तव शरन न चाही ।।२।।

शंकर महादेव जग स्वामी, भक्तन के दुख दूर कराहीं ।

औढरदानि सुदानि बड़ो, देखत दान खुद दान लजाहीं ।।३।।

महाकाल महेश अकाम दिगम्बर, राम नाम रूचि तव मन माहीं ।

तव पद प्रेम किए बिनु कोऊ, राम चरन रति पावत नाहीं ।।४।।

आशुतोष कृपालु प्रभू, मम अवगुन दोष धरौ चित नाहीं ।

सुत नारि समेत रहौ कृपालु, संतोष विनय करुनामय पाहीं ।।५।।

    [१८]

जय गिरिजापति जय अविनाशी । राजत रुचिर रचित हरि काशी ।।१।।

बसत हिमालय गिरि कैलाशा । शिखर रम्य पुरवत सब आशा ।।२।।

सोहत सिर पावन सरि गंगा । गरल कंठ अरु धरे भुजंगा ।।३।।

भाल चंद्रमा सुंदर सोहै । रूप अनूप जगत मन मोहै ।।४।।

कर डमरू त्रिशूल बिराजै । आभा वदन कोटि रवि लाजै ।।५ ।।

भगत कामतरु सब जग जानै । दनुज मनुज सुर नर मुनि मानैं ।।६।।

शारद शेष निगम गुन गावत । अमित अपार थाह कोउ पावत ।।७।।

दीनदयाल पुकारे आरत । सकल काज दीनन के सारत ।।८।।

दानि शिरोमनि वेद बखानै । औढरदानि  सकल जग जानै ।।९।।

राम भक्ति के प्रभु तुम दाता । जगतपूज्य जग के पितु-माता ।।१०।।

बेलपत्र जल भाँग धतूरे । इन्हते सकल कामना पूरे ।।११।।

तुम सम तुम प्रभु सत्य प्रशंसा । राम भगति सुंदर सर हंसा ।।१२।।

अगम अगोचर तुम भगवंता । मम मति थोरि न जानहिं संता ।।१३।।

दीन संतोष विमल यश गावै । राम चरन अबिरल रति पावै ।।१४।।

    [१९]

जय महेश जय जय त्रिलोचन । भगत त्रास त्रय ताप विमोचन ।।१।।

आशुतोष जय जलज विलोचन । भव संभव दारुण दुख मोचन ।।२।।

जयति जयति जय जय त्रिपुरारी । दनुज देव सेवक नर नारी ।।३।।

विश्वनाथ जय जय जग कर्ता । आदिदेव पालक संहर्ता ।।४।।

जय गंगाधर जय अहि भूषण । विगत विकार रहित सब दूषण ।।५।।

जगदगुरू जय जगत विभूषण । धारत सरिस सुता गिरि भूषण ।।६।।

जयति दयाकर सर्बस दाता । समरथ सदा दीन हित राता ।।७।।

वेद पुराण जगत यश जागै । संतोष भगति रघुपति की माँगै ।।८।।

भगत कामतरु करुणाधाम काशीनाथ विश्वंभरं ।
दीनानाथ धरु मम सिर हाथ पाहि शंकर उमा वरं ।।९ ।।

[२०]

श्रीकृष्णचंद्र देवकीनन्दन माँ जशुमति के बाल गोपाल ।

रुक्मणीनाथ राधिकावल्लभ मीरा के प्रभु नटवरलाल ।।१।।

मुरलीधर बसुदेवतनय बलरामानुज कालिय दहन ।

पाण्डवहित सुदामामीत भक्तन के दुख दोष दलन ।।२।।

मंगलमूरति श्यामलसूरति कंसन्तक गोवर्धनधारी ।

त्रैलोक उजागर कृपासागर गोपिन के बनवारि मुरारी ।।३।।

कुब्जापावन दारिददावन भक्तवत्सल सुदर्शनधारी ।

दीनदयाल शरनागतपाल संतोष शरन अघ अवगुन हारी ।।४।।

[२१]

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम भगति मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

[२२]

संकटमोचन मारुतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महावीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्हि बड़ाई ।।१।।

रामसुवेक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुम से तात उरिन मैं नाहीं कहि दीन्हेउ रघुराई ।।२।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त बिभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।३।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभू के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।४।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि दीन तदपि तव चरण की आस लगाई ।।५।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा दुख पाई ।।६।।

[२३]

मंगलमूरति मारुतनंदन अगमहु सुगम बनाई ।

मुनि मन रंजन जन दुख भंजन केहि बिधि करौं बड़ाई ।।१।।

असहाय सहायक तुम सब लायक गुनगन यश जग छाई ।

अतिबड़भागी तुम अनुरागी रामचरन सुखदाई ।।२।।

प्रभु हित आगर विद्या सागर राम कृपा अधिकाई ।

सिया सुख दीन्हेउ आशिष लीन्हेउ प्रभु संदेश सुनाई ।।३।।

बल गुन धाम सिया सुधि लायउ रावन लंक जराई ।

वैद्य सुषेन सदन संग लायउ मूरि कहेउ जनु आई ।।४।।

कालनेमि बधि लाइ सजीवन लछिमन प्रान बचाई ।

पैठि पताल अहिरावन मारेउ लायउ प्रभु दोउ भाई ।।५।।

विजय संदेश सिया को दीन्हेउ सुनि अति मन हर्षाईं ।

बूड़त भरत विरह जल राखेउ आवत प्रभु बतलाई ।।६।।

हाँक सुनत सब खल दल काँपे छीजैं सुनि प्रभुताई ।

मैं मूढ़ मलीन कहॅउ किम तव गुन शारद कहे न सिराई ।।७।।

दीनदयाल भयउ तुलसी को तुमही नाथ सहाई ।

मम चित करउ कहौं कर जोरे छमि अवगुन कुटिलाई ।।८।।

स्वामिनि स्वामि सिया रघुनाथ तव आरतपाल पितु-माई ।

रीति सदा जेहिं दीन को आदर कीरति जगत सुहाई ।।९।।

दीन सहायक प्रिय रघुनायक मम हित बात चलाई ।

करुनासागर जन हित आगर अब न रखो बिसराई ।।१०।।

अघ-अवगुन नहि देखि विरद निज करउ कृपा रघुराई ।

साधनहीन नहीं हित स्वामी भ्रमत है दुख पाई ।।११।।

दीनबंधु दीन संतोष की और बिलंब किए न भलाई ।

प्रनतपाल एक गति तुमही राखौ बाँह उठाई ।।१२।।

[२४]

भरत लखन रिपुसूदन दीनबंधु के भाई ।

अविरल प्रेंम राम पद पंकज प्रभु कृपा अधिकाई ।।१।।

रिपुहन लक्ष्मणानुज प्रिय राम भरत सुखदाई ।

भरत प्रीति लक्ष्मन की सेवा राम प्रभू मन भाई ।।२।।

राम प्रभू के निकट सनेही कृपा करि होउ सहाई ।

अवसर पाइ कहौ समुझाई असरन सरन सरन सुखदाई ।।३।।

आरतपाल कृपालु छ्मानिधि राम प्रभू बड़े भाई ।

संतोष चहत है भीख दया की वेगि द्रवउ रघुराई ।।४।।

[२५]

सीताराम प्रेमसिंधु दीनबंधु भरत भाई ।

अवध सो राज त्यागि लहेउ विराग गहेउ चरन सुखदाई ।।१।।

राम पद पनही धारि सिर लाइ पूजि कीन्हि सेवकाई ।

जप तप शील भगति नेम व्रत देखि महामुनिराज लजाई ।।२।।   

महिमा चरित देखि अगम निगम कोउ न सकुचाई ।

राम चरित वारि मीन प्रीति रीति सुप्रवीन सकै कोउ गाई ।।३।।

गुरजन समाज साधु तिहुँपुर काल तिहुँ बड़ी बड़ाई ।

राम भगत चरित प्रेम होत कस प्रगट जनाई ।।४।।

माण्डवीनाथ गुनगाथ रघुनाथ कहत मोसे मति रंक सो किमि कहि जाई ।

दीन मतिहीन संतोष हित होइ बिधि सोइ करौ दीनदयाल सुखदाई ।।५।।

[२६]

सुमित्रा सुवन शुभ लच्छण भवन राम प्रिय लखनलाल भाई ।

सुंदर सुजान शीलवान वीर रनधीर जनपाल सुखदाई   ।।१।।

सीताराम सेवारत भगति बिराग व्रत कहे न सिराई ।

उर्मिलानाथ दीनबंधु मोसे दीन दूबरे को संबल सहाई  ।।२।।

असरन-सरन राम रघुनाथ पद प्रेम सरन भगति दाई ।

दीन संतोष रामानुज कृपालु होत बात बनि जाई ।।३।।

[२७]

सुंदर सुशील सरल रिपुहन सुजान सुजन भाई ।

भरत लखन सीताराम प्रिय दीन मतिहीन जन सहाई ।।१।।

श्रुतिकीर्ति नाथ तव गुनगाथ मोसे किमि कहि जाई ।

रामभद्र रामचंद्र प्रीति पदकंज चहौं रहौं सरन सुखदाई ।।२।।

दीन संतोष हित होय कृपालु भए बात बनि जाई ।

और न उपाय सतभाय कहौं दीनबंधु दीन लहै दिहे बड़ाई ।।३।।

[२८]

रामप्रिया जगजननि भवानी लोक विदित प्रभुताई ।

दीन मलीन दुखी हूँ माई तव नाथ की आस रघुवीर दोहाई ।।१।।

सहजकृपाल गरीबनेवाज सेवत सुलभ शरन सुखदाई ।

दीनदयाल दुखहरन दयानिधि तिहुँपुर होत बड़ाई ।।२।।

चरन गहेंउ सुनि प्रभु प्रभुताई नाथ रहे बिसराई ।

जदपि कुटिल; प्रभु गुनगन बल माँ अमित दयालु रघुराई ।।३।।

होउ सहाय कहउ प्रभु से मोहिं न भूलहिं माई ।

महापतित मैं पतितपावन प्रभु बनिहैं एक उपाई ।।४।।

छ्मानिधि छ्माकर शिर कर धारैं मिट जाए बिकलाई ।

असरन सरन तव नाथ सरन बिनु संतोष रहा दुख पाई ।।५।।

[२९]

सीता माई दयालु रघुराई काहे को सुधि बिसराई ।

आरतपाल कृपाल तवनाथ क्या विरद की रीति भुलाई ।।१।।

आरतहित जन प्रीति की रीति वेद रहे गुन गाई ।

दीनबंधु दुखहरन दयानिधि काहे किए निठुराई ।।२।।

सदग्रंथ कहैं प्रभु अधम उधारे मोहि लजात अधमाई ।

महाअवगुनधाम नहीं गुन ऐकौ विबस किए जड़ताई ।।३।।

नाथ सुधारहिं तो बनै माता और नहीं कोउ उपाई ।

मैं दीन मलीन प्रभू जग स्वामी तजहिं तो काह बसाई ।।४।।

शरन गहे की लाज रखत प्रभु त्यागि सकहिं नहि माई ।

दीन दया बस रीझत स्वामी सोचि घटै बिकलाई ।।५।।

तवनाथ चरन तजि ठौर नहीं फिर काहे दया नहि आई ।

दीन दशा प्रभु से कहौ माता संतोष रहा दुख पाई ।।६।।

[३०]

जगतजननि राजा जनक दुलारी । हम तेरे बालक तूँ महतारी ।।१।।

करुनानिधान रघुनाथ पियारी । जगत विमोहनि तिहुँपुर न्यारी ।।२।।

जग पालन उद्भव लय कारी । महिमा अपरंपार तुम्हारी ।।३।।

सुखसागर श्रीराम सुखारी । शील सुशील जगत उपकारी ।।४।।

कूर कपूत अविनय अघ भारी । छमि चितवौ माँ ओर हमारी ।।५।।

चितये पूरै आसा सारी । करुणाखानि सकौ दुख जारी ।।६।।

जदपि मातु सब भाँति अनारी । कृपा दया तव हृदय भारी ।।७।।

विनती माता सुनहुँ हमारी । दया करि जननी लेहु निहारी ।।८।।

याचक जन माँ कबहुँ न टारी । द्वारे देखि दुष्ट सत्कारी ।।९।।

जदपि महाखल मैं कुविचारी । जननी तेरे द्वार भिखारी ।।१०।।

मातु मिलाउ रघुनाथ खरारी । माँगत यह संतोष दुखारी ।।११।।

             [३१]     
 
सीता मैया मोहिं राम से मिला दो ।

करुणा की खानि सहज उपकारी, करि करुणा करुणा बरसा दो ।।१।।

दीन मलीन गवाँर निहारी, दीन-दशा प्रभु सो बतला दो ।

गुनगनधाम दीनजन गाहक, गुनगन की माँ याद दिला दो ।।२।।

रीति-प्रीति जन दीन को आदर, विरद की रीति पुनीत बता दो ।

जनम-जनम को दीन-दुखारी, बिगड़ी जनम की मातु बना दो ।।३।।

असर-सरन राम रघुवर की, करि कृपा माँ सरन दिला दो ।

दीन संतोष याचक कर जोरे, माँ रघुकुल की रीति निभा दो ।।४।।



।। श्रीसीतारामार्पणमस्तु ।।


_____________________________________________





कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय पोस्ट

विशिष्ट पोस्ट

की तुम राम दीन अनुरागी………

साधन संपन्न लोगों से तो बहुतेरे प्रेम करते हैं । अनुराग रखते हैं । लेकिन जो बिपन्न हो, दीन-हीन हो उससे कोई अनुराग नहीं रखता । ऐसे लोगों से...

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

___________________________________________

विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

_________________________________________

प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

_________________________________

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

____________________________________________

भगवान की तलाश

___________________________________

सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

___________________________________

भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

___________________________________

भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

___________________________________

संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

__________________________________




रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

__________________________________________

।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु मान बड़ाई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

_________________________

।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

______________________________