सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

हे श्यामल मृदुगात सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं

 

हे श्यामल मृदुगात सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं । 

सखियाँ पूछ रहीं रघुनाथ सखियाँ पूछ रहीं ।।

 

केहिके बल तू शिव धनु तोरेउ । जनकलली से नाता जोरेउ ।।

लै आएउ बारात ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रही ।।

 

ताड़का को केहिके बल मारेउ । मुनिवर कै पुनि काज सवाँरेउ ।।

भल कीन्हीं शुरुआत ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रही ।।

 

पाथर से नारी प्रगटायेउ । अहिल्या को पतिधाम पठायेउ ।।

जादूगर दियो मात ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं ।।

 

मुनिवर के संग मिथिला आयेउ । आवत ही पुर लोग लुभायेउ ।।

करनी कहि नहिं जात ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं ।।

 

हम जो कहैं हमरे मन आवै । तुमसे नहिं कछु भेद छुपावैं ।।

जो कछु हमैं बुझात ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं ।।

सुमन वाटिका हम सब देखे । पुष्प हेतु श्रम होत विशेषे ।।

पद कर सब जलजात ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं ।।

 

पहिले काम बने जेहिं कारन । पाछे भी सबकेर निवारन ।।

सियाजू की मुलाकात ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं ।।

 

दीन संतोष सब सिया सहेली । प्रेम बिबस कछु कहा जो बोलीं ।।

सुनि सुनि प्रभु मुस्कात ।। सुनिए बात सखियाँ पूछ रहीं ।।


।। जय श्रीसीताराम ।

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

रामजी की आई बरात जनकपुरवासी बलि बलि जात

 

रामजी की आई बरात |
जनकपुरवासी बलि बलि जात || जनकपुरवासी. ||


बने बराती किम कहि जाये |
अवधपुरी से मिथिला आये ||
विकसे जन जलजात || जनकपुरवासी.||


दुलहा बेष राम अति सोहैं |
सुर नर मुनि देखत छवि मोहैं ||
पुलकित जन मन गात || जनकपुरवासी.||


हरि हर विधि अरु सुर सब आये |
निरखि राम लोचन फल पाए ||
हिल मिल गए बरात || जनकपुरवासी.||


नारिन मिल बहु मङ्गल गावैं |

हास विनोद महा सुख पावैं ||

सुर तिय मिली घरात || जनकपुर वासी.||

तोड़त सुमन पसीना आवै |
केहि बिधि सो शिव चाप चढ़ावै ||

जनकलली की करामात || जनकपुरवासी.||

ताड़का सुबाहू को उद्धारे |
तुम्हरे गुरु माता को तारे ||
बिगड़ी बना दी बात || जनकपुरवासी. ||

व्याह उछाह सकल अवगाहे |
चारों तनय जनकपुर व्याहे ||
जोड़ी देखि जुड़ात || जनकपुरवासी||

दीन संतोष जथा मति गावै |
सीताराम विवाह मनावै  ||
सुख की है बरसात || जनकपुरवासी ||


|| श्रीसीताराम विवाह महामहोत्सव की जय ||

 

रविवार, 23 नवंबर 2025

तुम बिनु कौन हरै दुख मेरो

 

तुम बिनु कौन हरै दुख मेरो ।

श्रीरघुनाथ दीन जन बंधू ओर हमारी हेरो ।।१।।

जन दुख तम रवि रविकुलनायक उगि अब करो सबेरो ।

देर भई प्रभु दिन दिन बीतत अब जनि करिए देरो ।।२।।

दीनन को प्रभु वन-वन खोजेउ वन बिच कियो बसेरो ।

बालपने ते रघुवर भायेउ सुनि गुन सुजस घनेरो ।।३।।

जन गुन एक नहीं रघुनायक कहत कहावत तेरो ।

दीनदयाल शीलगुन सिंधू दीनन के अति नेरो ।।४।।

सबबिधि हीन दीन अति स्वामी बल नहिं दूजो केरो

मोसे दीन हीन जग पोसेउ अंत दिहेउ पुर खेरो ।।५।।

निज जन जानि राम मोरे रीझउ मुख जनि रघुवर फेरो ।

दीन संतोष नाथ रघुनंदन बेगि सुनो अब टेरो ।।६।।

 

।। रघुनंदन राम की जय ।।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

मुझे रघुनाथ की कृपा की जरूरत है

 

 रघुनाथ भगवान श्रीराम की कृपा से क्या नहीं हो सकता है ? अर्थात सब कुछ हो सकता है । साधु-संत और सदग्रंथ कहते हैं, ऐसा बताते हैं कि रघुनाथ जी की कृपा सब पर होती है, हो सकती है लेकिन दीन-हीनों पे विशेष कृपा होती है ।  

रामजी की कृपा से मच्छर भी व्रह्मा बन सकता है । ऐसी कृपा है रामजी की । असंभव भी संभव हो जाता है ।

 

    गोस्वामी तुलसीदास जी को पहले कोई पूछता नहीं था । लेकिन जब रघुनाथजी की कृपा हो गई तो तुलसीदास जी की महिमा बहुत बढ़ गई । जंगल में एक पौधा होता है जिसे वन तुलसी कहा जाता है । इसे कोई नहीं पूछता । और एक तुलसी का पौधा होता है जिसकी पूजा की जाती है । इसको लोग घर में लगाते हैं । भगवान की पूजा में भी इसका प्रयोग होता है । भगवान को भोग भी तुलसी दल-पत्र के साथ ही लगाया जाता है ।

कितना अंतर है वन तुलसी और तुलसी में । तुलसी दास जी कहते हैं कि पहले मैं वन तुलसी जैसा था लेकिन जब रघुनाथजी की कृपा हो गई तो मैं वन तुलसी से तुलसी-तुलसीदास बन गया-

कृपा भई रघुनाथ की तुलसी तुलसीदास ।

 

वानर-भालू को विकारी माना जाता था । इनका सुमिरन, इनका नाम लेना भी अशुभ माना जाता था- ‘अशुभ होइ जिनके सुमिरेते वानर भालु-विकारी’। लेकिन जब से राम जी कृपा हुई वानर-भालू भी पूजनीय हो गए, मंगलकारी हो गए-‘सब भए मंगलकारी’

 

साधु-संत का जो सम्मान होता है उसके पीछे रघुनाथ जी की कृपा ही होती है । इतना ही नहीं किसी भी को जो बड़ाई मिलती है वो भी रघुनाथ जी की कृपा से ही मिलती है । वो जाने या न जाने, माने या न माने यह बात दूसरी है ।


   राम जी करुणा की मूरत हैं । उनकी करुणा-कृपा की जरूरत किसे नहीं होगी । मुझे भी उनकी कृपा करुणा की जरूरत है । जिस पर किसी की कृपा-करुणा नहीं होती, उस पर रघुनाथ जी की विशेष कृपा-करुणा होती है ।

मुझे रघुनाथ की कृपा की जरूरत है ।

सियावर राम दया के धाम करुणा की मूरत हैं ।।

 

रघुनाथ जी ही ऐसे हैं जो अपनी ओर से खोजकर कृपा करते हैं । बस दीन दिखा नहीं की रामजी की कृपा हो गई । रामजी की कृपा के लिए दीनता विशेष पात्रता है-


खोजि-खोजि के दीन उधारेउ दीनन दिहेउ बड़ाई ।

दीनबंधु रघुनाथ दयानिधि कृपा कहाँ विसराई ।।

एक आस विश्वास तुम्हारो करुणाकर रघुराई ।

बल संबल अवलंब हमारो दीनन को सुखदाई ।।

देर भई प्रभु दिन-दिन बीते सुधि अजहूँ नहि आई ।

दीन संतोष बेर नहिं कीजे गुनगन निज चित लाई ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधिहुँ पर कोह न काऊ


भगवान श्रीराम के स्वभाव की चर्चा तीनों लोकों, चौदहों भुवनों और तीनों कालों में होती है । अर्थात सर्वत्र और हर काल में होती है । क्योंकि रामजी जैसा न कोई है और न कोई होगा । 


इसलिए ही महर्षि वाल्मीकि जी श्रीआनंदरामायण में कहा है कि- ‘रामेण सदृशो देवों न भूतों न भविष्यति’ अर्थात रामजी जैसा भगवान  न पहले यानी भूतकाल में था और न आगे यानी भविष्य काल में होगा ।

 

  रामजी का ऐसा स्वभाव है कि वे अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते । भरत जी कहते हैं कि- ‘मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधिहुँ  पर कोह न काऊ’ ।। अर्थात मैं अपने नाथ यानी रामजी का स्वभाव जानता हूँ कि वे किसी अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते हैं ।


रावण ने कितना बड़ा अपराध किया कि सीताजी का हरण कर लिया । जिनके भृकुटी के संकेत मात्र से प्रलय हो जाती है जिनके एक वाण से सब कुछ नष्ट हो सकता है इतनी सामर्थ्य होने पर भी रामजी ने अपनी शक्ति का प्रयोग ही नहीं किया । रावण पर भी क्रोध नहीं किया । जब अंगद जी को दूत बनाकर भेजा तो यही कहा कि- ‘काजु हमार तासु हित होई । रिपु सन करेहु बतकही सोई’ ।। अर्थात रावण से तुम वही बातचीत करना जिससे हमारा काम हो जाए और उसका हित-कल्याण हो ।

 

रामजी उपकार को तो सदा याद रखते हैं लेकिन अपने प्रति अपकार- अपराध को याद नहीं रखते । इसलिए ही दीन-हीनों पर करुणा ही बरसाते हैं और अद्वितीय दीनबंधु कहलाते हैं-


वानर भालू असुर को सखा बनावै कौन ।

दीनबंधु रघुपति सरिस हुआ न है नहिं होन ।।

 


।। जय श्रीराम ।।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

हे राम रघुनाथ हे दुखहरन । दीनों की तुम बिनु सुनेगा कवन

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

 

हे राम रघुनाथ हे दुखहरन । दीनों की तुम बिनु सुनेगा कवन ।।

दीनों की सुनते हो तुम नाथ मेरे । करते नहीं देर दीनों के टेरे ।।

सीतापती राम राजिवनयन ।। दीनों. ।।

दीनों के हित राम तुमसा न कोई । गुनगन विरद जग जानैं न गोई ।।

दीनों के बंधू करुणाभवन ।। दीनों. ।।

दीनों से सब नाथ करते किनारा । मुझ दीन को एक तेरा सहारा ।।

दयासिंधु रघुवीर असरन सरन ।। दीनों. ।।

दीनों से तुम हो बड़ी प्रीति करते । ऐसा ही सुर साधु सदग्रंथ कहते ।।

कपि भील भालू भी राखे भवन ।। दीनों. ।।

जब जब पड़ी भीर तूनेसंभारा । ऐसा लगे नाथ मानों बिसारा ।

उदार शिरोमणि शील सदन ।। दीनों. ।।

बालपने से तुमको पुकारे । कहता रहा राम रघुवर हमारे ।।

दीनों के पालक दशरथ सुवन ।। दीनों. ।।

संतोष रघुवर तेरे भरोसे । मुझसों को तुम नाथ पाले व पोसे ।।

दया दृष्टि कीजे सीतारमन ।। दीनों. ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

दीन दुखहारी मेरे राघव सरकार

 

दीन दुखहारी मेरे राघव सरकार

फँसि गई नैया अब भैया मजधार ।।

करुणा के सागर हो करुणा अपार ।

मोसे दीन दूबरे के तूँ ही अधार ।।

दूजा नहीं और कोई आस तुम्हार ।

काल करम जीव जग तेरे अधिकार ।।

दीनबंधु शील सिंधु सुनैं को हमार ।

जग तो हँसेगा जो हुआ नहिं पार ।।

राजाराम देखो निज ओर बिचार ।

रामानुज माता अरु पवनकुमार ।।

जिए संतोष तेरी ओर निहार ।

सुनौं रघुवीर अब दीन पुकार ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

 

 

 

 

शनिवार, 6 सितंबर 2025

बहुतै देर लगायेउ प्रभूजी काहे हमका भुलायेउ

 

बहुतै देर लगायेउ प्रभूजी काहे हमका भुलायेउ ।

चौथेपन दशरथ घर जायेउ । मातु-पिता गुर आस पुरायेउ ।।

पुरजन भाग्य जगायेउ ।। प्रभूजी. ।।

मुनिवर कै प्रभु यज्ञ करायेउ । अहिल्या को पतिधाम पठायेउ ।

जनक कै मान बढ़ायेउ ।। प्रभूजी. ।।

निषाद को प्रभू मीत बनायेउ । केवट से निज पाँव धुलायेउ ।

सुरनर मुनि यश गायेउ ।। प्रभूजी. ।।

दीन मलीन हीन प्रभु भायेउ । शवरी के घर पद चलि आयेउ ।

बानर भालू अपनायेउ ।। प्रभूजी. ।।

सुग्रीव विभीषन कंठ लगायेउ । सुर नर मुनि के काज बनायेउ ।।

उजरे सकल बसायेउ ।। प्रभूजी. ।।

दीनन पे करुणा बरसायेउ । साधु संत सदग्रंथ बतायेउ ।

सुनि गुन आस लगायेंउ ।। प्रभूजी. ।।

कायर क्रूर कपूत बसायेउ । बिगड़ी प्रभु निज ओर बनायेउ ।।

संतोष निपट बिसरायेउ ।। प्रभूजी .।।

 


।। जय श्रीसीताराम ।।

सोमवार, 4 अगस्त 2025

का चुप साधि रहेउ बलवाना- हनुमानजी का समुंद्र लाँघने और राक्षसों का सामना करने के लिए साधना

 

जब सीताजी को खोजने के लिए तीन दिशाओं के वानर चले गए तब शेष दक्षिण दिशा में जाने वाले वानरों और भालुओं की बारी आई । दक्षिण दिशा में जाने वाले वानर और भालू भी जाने लगे । और सबसे बाद में हनुमान जी महाराज भी जाने के लिए प्रस्तुत हुए और रामजी को प्रणाम करके चलने वाले थे तो राम जी ने हनुमानजी को अपनी अगूंठी देकर सीता जी से कहने के लिए संदेश भी दिया ।

 

हनुमानजी को रामजी ने रामकाज के लिए चयनित कर लिया था । और लंका में बड़े-बड़े राक्षस थे एक से बढ़कर एक शक्तिशाली और दूसरे लंका तक पहुँचने के लिए सौ योजन का समुद्र भी पार करना था । रामजी को तो पता ही था कि सीताजी लंका में हैं-

जद्यपि प्रभू जानत सब बाता ।

राजनीति राखत सुरत्राता ।।

 

हनुमानजी को रामजी ने रामकाज के लिए चुना था यह तो हनुमानजी के लिए बड़े सौभाग्य की बात थी । लेकिन इतने बड़े उत्तरदायित्व को पूर्ण कैसे किया जाए यह प्रश्न हनुमानजी के मन में था ।

इसलिए हनुमानजी ने रामजी से पूछा कि हे नाथ मैं सौ योजन के समुद्र को कैसे पार कर पाऊँगा ? इतनी शक्ति कहाँ से आएगी ? और उसके बाद लंका में बड़े-बड़े असुर हैं उनसे सामना करने का उनसे भिड़ने की शक्ति कैसे प्राप्त करूँगा ?

तब रामजी ने हनुमानजी को एक मंत्र दिया । रामजी बोले हनुमान ‘श्रीराम’ इस मंत्र के एक पुरश्चरण जप से तुम्हारे अंदर समुद्र पार करने और राक्षसों का सामना करने की शक्ति आ जायेगी और तुम सीता का समाचार लाने में सफल हो जाओगे ।

सफलता का मंत्र प्राप्त करके हनुमानजी प्रसन्न होकर चल दिए । जब समुंद्र के किनारे बैठकर अन्य सभी वानर-भालू समुद्र पार करने के लिए विचार-विमर्श कर रहे थे और अपने-अपने बल का वर्णन कर रहे थे,  उस समय हनुमान जी चुपचाप यही साधना करने में व्यस्त थे- ‘का चुप साधि रहेउ बलवाना’

 

  इस प्रकार हनुमानजी ने सौ योजन के समुद्र को पार करने और राक्षसों का सामना करने की शक्ति प्राप्त करके रामकाज को पूर्ण किया

 

।। जय श्रीराम ।।

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

रघुनाथं जगदगुरूं

 

संसार में प्राणिमात्र के गुरू रामजी हैं । रामजी सच्चे अर्थों में सबके गुरू हैं । कोई माने न माने तो भी राम जी उसके गुरू हैं क्योंकि रामजी जगद्गुरू हैं- रघुनाथं जगदगुरूं

 

 

संसार में व्यक्ति जब आता है तो उसे सबसे पहले माता-पिता मिलते है । फिर धीरे-धीरे वह कई सम्बंध बना लेता है अथवा सम्बंध बनते जाते हैं । इसमें से एक सम्बंध गुरू का होता है और आजकल गुरू, जगद्गुरू, सार्वभौमगुरू, व्रह्मांडगुरू आदि मिल जाते हैं ।

 

 गुरू, माता-पिता, भाई-बंधु-मित्र और लौकिक स्वामी (मालिक-बॉस) को हितैषी कहा जाता है । क्या इनसे बढ़कर हितैषी और कोई है ? क्या गुरू से बढ़कर हितैषी कोई है ? हाँ सबसे बढ़कर भी जो व्यक्ति का हित करने वाले हैं वे हैं रामजी ।

 

 रामजी से बड़ा हितैषी न तो गुरू, न माता-पिता, न भाई-बंधु-मित्र और न ही लौकिक स्वामी ही होते हैं । क्योंकि रामजी के जैसा हितैषी कोई हो ही नहीं सकता । भगवान शंकरजी माता पार्वतीजी को श्रीराम कथा सुनाते हुए कहते हैं कि-

 

उमा राम सम हित जग माहीं । गुर पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं ।

 

 रामजी जगद्गुरू हैं और सबके सच्चे और सबसे बड़े हितैषी हैं –

 

राज राजं रघुवरं  कौशल्यानन्दवर्धनं ।

भर्गं वरेण्यं विश्ववेशं रघुनाथं जगदगुरूं ।।

 

।। जगद्गुरू रघुनाथजी की जय ।।

 

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

युधिष्ठिरजी को कष्टों से छुटकारा और राज-पाट को पुनः प्राप्त करने हेतु 'श्रीराम जय राम जय जय राम' जपने का उपदेश

 

पांडवों पर एक बाद एक कष्ट आते रहते थे । और  दुर्योधन ने छल करके उनका राज-पाट भी छीन लिया था । पांडव एक वन से दूसरे वन में भटक रहे थे ।

 

  एक बार युधिष्ठिरजी ने भगवान श्रीकृष्ण जी से पूछा कि हम लोगों के कष्टों का अंत ही नहीं हो रहा है । एक के बाद एक कष्ट आते रहते हैं और अब तो राज-पाट भी चला गया है । कष्टों से मुक्ति मिल जाए और राज-पाट पुनः मिल जाए । इसका कोई उपाय बताइए ।

 

तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर जी को ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ जपने का उपदेश दिया । युधिष्ठिरजी ने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए और राज-पाट पुनः प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ मंत्र का जाप किया और उद्यापन भी किया ।

 

इससे उनके जीवन के सारे कष्ट समाप्त हो गए और उन्हें राज-पाट ही नहीं मिला वे चक्रवर्ती सम्राट भी बन गए ।

 

 

।। जय श्रीराम ।।

रविवार, 8 जून 2025

हे करुणा के सिंधू दया के भवन, मुझे भी निहारो सीता रमन

 

।। श्रीसीतावल्लभाय नमः ।।

 

हे करुणा के सिंधू दया के भवन, मुझे भी निहारो सीता रमन ।

मोसे बहुत नाथ द्वारे पे तेरे, तुम बिनु नहीं कोई मुझ दीन केरे ।

दीनों के बंधू है तुमसा कवन ।। मुझे. ।।

रखते सदा दीन रहते हैं नेरे, वन वन में रघुवीर दीनों को हेरे ।।

उदार शिरोमणि शील सदन ।। मुझे. ।।

दीनन को तुम नाथ टारे न फेरे, कपि भील भालू भी रहते हैं घेरे ।।

दीनदयालू असरन सरन ।। मुझे. ।।

हे नाथ रघुनाथ रघुवर हमारे, गुन गन विरद बल तेरे सहारे ।।

दीनों से कब नाथ फेरे वदन ।। मुझे. ।।

शिशु मातु बल पे रहता है जैसे, मुझ दीन को राम राघव हो तैसे ।।

बुधि बल नहीं नाथ कोई जतन ।। मुझे. ।।

संतोष रघुनाथ तुमको पुकारे, कोमलचित राम धनु वान धारे ।।

दीनों के पालक भव भय हरन ।। मुझे. ।।

 

।। सीतारमण भगवान श्रीरामचंद्र की जय ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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