आज बहुत से लोग खुद को भगवान कहने अथवा समझने लगे हैं । लेकिन मैं उन भगवान के बारे में बता रहा हूँ । जो संसार के एकमात्र ऐसे भगवान हैं । जिनके समान सिर्फ और सिर्फ वे ही हैं । ये भगवान पुराणपुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी हैं । इनका नेम, व्रत, शील ऐसा है जैसा किसी का नहीं है । श्रुतियाँ जिन्हें साक्षात धर्मस्वरूप कहती हैं ।
श्रीराम जी को ऐसे लोग बहुत प्रिय होते हैं जो सामान्यतः किसी को प्रिय नहीं होते । भला दीन मलीनों से कौन अनुराग करेगा ? लेकिन रामजी करते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि ‘वन्दौं सीताराम पद जिन्हहिं परमप्रिय खिन्न’ ।
रामजी इतने दयावान हैं कि दीनों पर उनकी दीनता देखकर ही द्रवित हो जाते हैं । ऐसा दयावान और कौन हो सकता है ?
कोई कितना ही बड़ा पापी अथवा अपराधी क्यों न हो । यदि शरण में चला जाये तो चाहे उन्हीं का ही अपराधी हो, वे ऐसे छ्मावान हैं कि छमा करने में देर नहीं करते । इस तरह का छ्मशील कहाँ मिलेगा ?
रामजी ऐसे दानी हैं कि सब कुछ दे देते हैं । बदले में कुछ लेते नहीं हैं । वे ऐसे दाता हैं जो देकर कभी यह जाहिर नहीं करते कि हमने इसको यह अथवा इतना दिया है । बल्कि देकर भूल जाते हैं । ऐसा उदार धनवान दाता कहीं हो सकता है क्या ?
उनके गुणगण तो ऐसे हैं कि शेष, महेश, गणेश, सनक, सनन्दन , नारद, शारद और व्रह्मादि विशारद गाते रहते हैं । लेकिन अघाते नहीं हैं । ऐसा गुणवान और कौन होगा ?
रामजी सभी के हितकारक हैं । वैसे तो कोई उनका शत्रु नहीं है । फिर भी वे अपने हित और अनहित का भी सदा हित ही करते और चाहते हैं । भला ऐसा हितवान और कौन होगा ?
रामजी की छवि करोड़ो कामदेवों को भी लजाने वाली है । ऐसे लोकाभिराम महाछविधाम हैं कि सारे चर और अचर मोहित हो जाते हैं । खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे क्रूर हिंसारत प्राणी भी जिसकी रूप माधुरी से प्रभावित हो जाएँ । उनकी छवि की समानता और कौन कर सकता है ?
रामजी बल के सागर हैं । सब कुछ करने में समर्थ हैं । बावजूद इसके परम सरल हैं । बहुत ही विनयशील हैं । ऐसा स्वभाव है कि रिपु भी सराहना करते नहीं थकते । रावण को सारी सृष्टि प्रतिकूल ही दिखती थी । कुछ अगर अनुकूल लगता था तो यह श्रीरामजी का स्वभाव ही था । परशुरामजी मारने-काटने की बात कर रहे थे । अपशब्द बोल रहे थे । और रामजी शिर झुकाए खड़े थे । ऐसा और कोई बलवाला न ही देखा गया है, न सुना गया है और न ही देखा जाएगा जो सबकुछ करने में समर्थ होकर भी सरलता, दया और विनय का प्रतिमूर्ति हो ।
करुणा की खान होने के कारण ही भक्तों और संतो के खातिर रामजी नंगे पैर वन-वन फिरे । कोमलता भी जिसे देखकर सकुचा जाए ऐसे श्रीराम जी नंगे पैर चलकर भक्तों के पास जाकर मिले और दीनों का उद्धार किया । ऐसा करुनामय और दूसरा कौन हो सकता है ?
इतिहास, वेद, पुराणादि साक्षी हैं कि किसी भी ने किसी गीध का इतना सम्मान नहीं किया ।
जितना रामजी ने जटायु का किया । उसे पिता कहकर बुलाये । पिता की तरह उसका श्राद्ध किया । भिलनी, जिसे लोग बहुत अपवित्र समझते थे, को माता कहा । गीध और भिलनी का इतना सम्मान करने वाला और दूजा कोई महान नहीं है । ऐसे एकमात्र श्रीरामजी हैं ।
वानर , भालू , गीध और राक्षस को भी कोई अपना मित्र बनाता है क्या ? इनको मित्र बनाकर अपने साथ रखने वाले एकमात्र हमारे रघुनाथ जी हैं । यह सच ही कहा जाता है कि जिसका कोई सम्मान नहीं करता । रामजी उसका भी आदर, मान और सम्मान करते हैं ।
अपने सेवकों, भक्तों का रामजी सदैव मान रखते हैं । सम्मान करते हैं । यदि भक्त के अंदर धूल के कण के बराबर भी कोई गुण हो तो रामजी भरे दरबार में उसका बखान करते हैं । ऐसा बखान कहीं होता है क्या ?
रामजी को प्रेम से खिलाओ तो चाहे वह झूठी बेर अथवा साग पात ही क्यों न हो बखान-बखान कर खाते हैं । रूखा-सूखा सब खा जायेंगे । बस प्रेम होना चाहिए । और यदि प्रेम नहीं है तो मेवा-मिष्ठान चाहे जो कुछ हो ये नहीं खाते । इनकी भूँख खत्म हो जाती है । ऐसा भूँखा और कौन है ?
रामजी ऐसे धर्म-धुरंधर हैं कि वेद-पुराण इन्हें धर्म का ही स्वरूप कहते हैं । साक्षात धर्म ।
जो करें, जो बोले वहीं धर्म । भला ऐसा और कोई धर्मवान है ?
इतनी और ऐसी सभी विशेषताओं वाला और कोई नहीं है । संत-भक्त और सदग्रंथ ऐसा ही कहते हैं । हरि, हर और विधाता के भी विधाता श्रीराम जैसा महिमावान कोई हो ही नहीं सकता । सच है हमारे श्रीराम के समान केवल और केवल एक श्रीराम जी हैं । ऐसा दूसरा कोई भगवान नहीं है----
ऐसो भगवान कहाँ ?
दीन मलीन जाहिं मन भावत ऐसो श्रीमान कहाँ ।।
दीनन दीनता देखि जो द्रवै ऐसो दयावान कहाँ ।
छमि अघ शरन गहे जो राखत ऐसो छ्मावान कहाँ ।।
सब कुछ देये कुछ नहीं लेये ऐसो धनवान कहाँ ।
सुर नर मुनि जेहि गुनगन गावैं ऐसो गुनवान कहाँ ।।
हित अनहित सबकर हित ताके ऐसो हितवान कहाँ ।
जासु महाछवि जग मन मोहै ऐसो छविवान कहाँ ।।
सरल स्वभाव विनय बल आगर ऐसो बलवान कहाँ ।
भगत के खातिर बन-बन डोलै ऐसो करुनाखान कहाँ ।।
गीध को पितु भिलनी मातु बुलाये ऐसो महान कहाँ ।
बानर, भालू, गीध, निसाचर को सनमान कहाँ ।।
साधु सभा जन रज गुन भाखत ऐसो बखान कहाँ ।
प्रेम भगति बस पाये रूखो-सूखो ऐसो तृप्तिमान कहाँ ।।
धरम स्वरूप जासु श्रुति गावत ऐसो धर्मवान कहाँ ।
शील नेम व्रत जगत उजागर पुरुषपुरान कहाँ ।।
हरि, हर, बिधि जो सबको बिधाता ऐसो महिमावान कहाँ ।
संतोष के राम आन नहि दूजो राम समान कहाँ ?
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