सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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मंगलवार, 21 जनवरी 2025

भज मन रामचंद्र दुखहारी

 

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

 

भज मन रामचंद्र दुखहारी ।

करुणासागर सदगुण आगर भगतवछल सुखकारी ।।

परम उदार दीनहित गाहक असरन सरन खरारी ।

दीनबंधु जन दीन रखैया कर सायक धनु धारी ।।

केवट कोल किरात रखैया भील भालु वनचारी ।

वानर गीध विभीषण निसिचर खलगन विपुल विकारी ।।

कादरहूँ आदर जेहि द्वारे कीरति जग उजियारी ।

दीनदयाल दीन संग्रही रघुवर राम अघारी ।।

दीन मलीन ते धाम भरैया सुर मुनि कहत पुकारी ।

दीन संतोष दीन जन ऊपर प्रीति राम की भारी ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

श्रीरघुनाथ शरन तेरी आयों


जीव के कल्याण का राजपथ श्रीरघुनाथजी की शरणागति है । जब तक जीव संसार से अपना हित चाहता है और संसार को अपना समझता है तब तक यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ नाना नाच नाचता रहता है ।


 दीनों पे दया करने वाले एक मात्र श्रीरघुनाथ जी हैं । जब तक जीव के यह समझ में नहीं आता, जब तक जीव यह नहीं समझ जाता तब तक वह संसार में संसारी लोगों के पीछे दौड़ता रहता है । और इस प्रकार कई जन्म वृथा ही बीत जाते हैं ।


लेकिन जब जीव यह जान लेता है, मान लेता है कि एक मात्र रघुनाथ जी ही दीनदयाल हैं, दीनों के सच्चे हितैषी हैं तो वह श्रीरघुनाथ जी की शरण में चला जाता है ।


शरण में जाते ही श्रीरघुनाथजी अपने स्वभाव के अनुसार दीन जानकर कृपा करके उसे अपना लेते हैं-


श्रीरघुनाथ शरन तेरी आयों । राजा राम शरन तेरी आयों ।।


दीन मलीन नहीं गुन एको, सुनि गुन विरद लुभायों । श्रीरघुनाथ. ।।


पूजा भजन भगति नहिं जानौं, मन नहि लखत लखायो । श्रीरघुनाथ. ।।


जग सो हित अपना करि मानैं, बहुतै नाच नचायो । श्रीरघुनाथ. ।।


दीनदयाल तोहिं बिनु जाने, वृथा जनम गवायों । श्रीरघुनाथ. ।।


मोसे दीन हीन को गाहक, तुम बिनु बहु दुःख पायों । श्रीरघुनाथ. ।।


कोल किरात भील बनवासी, काहू नहि ठुकरायो । श्रीरघुनाथ. ।।


सरल स्वभाव ठकुरई न जानत, दीनन हेरि बसायो । श्रीरघुनाथ. ।।


वानर भालु गीध आदिक भी, कृपा करि अपनायो । श्रीरघुनाथ. ।।


मोरे बल संबल रघुनायक, तुम सम और न पायों । श्रीरघुनाथ. ।। 


सीतानाथ करौ अब कृपा, भूले हमहु भुलायो । श्रीरघुनाथ. ।।


दीनबंधु तोहिं दीन पियारे, संत ग्रंथ सब गायो । श्रीरघुनाथ. ।।


दीन संतोष के राम रखैया, दीन सदा मन भायो । श्रीरघुनाथ. ।।

दीन हीन लखि श्रीरघुनायक, अपनी ओर लगायो । श्रीरघुनाथ. ।।



।। जय श्रीरघुनाथजी ।।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

राम जी को क्या प्रिय है ?

 प्रेम ऐसी चीज है जिसकी भाषा मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी समझते हैं । बच्चे भी प्रेम को भलीभाँति समझते हैं । प्रेम लोगों को आपस में जोड़ता है और नफरत दूर करता है । प्रेम के बल पर ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है ।



   यदि कोई नफरत और द्वेष फ़ैलाने में लगा रहता है तो उसे भगवान कभी नहीं मिल सकते । उसे भगवान की भक्ति नहीं मिल सकती । भगवान की भक्ति केवल प्रेम से मिलती है । इसलिए मनुष्य को नफरत से दूर रहकर आपस में प्रेम से रहना चाहिए । कटुता, द्वेष आदि विकारों से दूर रहकर प्रेम फैलाना चाहिए । यह गुण राम जी से जुड़ने में सहायक है ।



यह समझने-बूझने की चीज है कि भगवान श्रीराम जी को केवल प्रेम प्रिय है । कोई भी जीव यदि राम जी से प्रेम करेगा तो राम जी उससे प्रेम करने लगेंगे । राम जी उसके हो जाएँगे । और यदि राम जी से प्रेम नहीं है तो लाख जतन करने पर भी राम जी नहीं मिलेंगे ।



   प्रेम ही वह चीज है जिससे राम जी आसानी से रीझ जाते है । फिर चाहे कोल-किरात-भील, केवट, गीध, वानर-भालू ही क्यों न हों सबको गले से लगा लेते हैं । अपना बना लेते हैं । और बखान-बखान के भीलनी शवरी के बेर बिना बेर किए खा लेते हैं ।


 
   प्रेम ही वह चीज है जो राम जी को वश में कर लेता है । राम जी को पाना है, मिलना है अथवा उनसे नाता जोड़ना है तो राम जी से प्रेम करना होगा । जो भी राम जी से नाता जोड़ने की इच्छा रखता हो उसे इस बात को भलीभाँति समझ लेना चाहिए-



रामहि केवल प्रेम पियारा । जानि लेउ जो जाननिहारा ।।


 
।। जय सियाराम ।।


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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

जटायुजी की जीत

भगवान श्रीरामजी सीताजी और लक्ष्मणजी के साथ जब पंचवटी में रहने आये तभी गीधराज जटायु से उनकी भेंट हुई और परिचय हो गया । जटायु जी दशरथजी के मित्र थे । इस नाते से रामजी ने उन्हें पिता के समान ही मानकर उनका आदर और सम्मान किया तथा हाथ जोड़कर प्रणाम किया । एक पक्षी को ऐसा सम्मान शायद इतिहास का पहला और अंतिम उदाहरण था । यह रामजी का आदर्श है जिसने आमिष भोगी जटायु को ‘तात’ की संज्ञा दे दिया ।


   रामजी पंचवटी में रहने लगे । कुछ दिन बाद रावण ने रामजी और लक्ष्मणजी की अनुपस्थिति में सीताजी का हरण कर लिया । सीताजी बहुत दारुण विलाप करती हुई जा रही थीं । उस विलाप को सुनकर कोई उन्हें छुड़ाने नहीं आया । लेकिन पक्षी होकर भी जटायु जी सीताजी की मदद के लिए आये । इन्होंने देखा कि सीताजी का हरण करके लंका का राजा रावण जा रहा है । जिसके बल पराक्रम से देवता भी भयभीत रहते हैं । फिर भी वृद्धावस्था के बावजूद इन्होंने हिम्मत नहीं हारी ।


रावण को इन्होंने ललकारा और रुकने को कहा । रावण को ऐसी आशंका नहीं थी कि वायु मार्ग में कोई उसका रास्ता रोकेगा । रामजी और लक्ष्मणजी बहुत दूर थे । और कोई अन्य चाहे वह कोई भी हो रावण का रास्ता रोकने की हिम्मत नहीं जुटा सकता । ऐसे में रावण आश्चर्यचकित होकर सोचने लगा कि आखिर यह कौन है ? जब जटायु जी थोड़ा पास आये जिससे रावण को इतना आभास हुआ कि कोई पक्षी है । तब उसने सोचा कि कहीं यह गरुण तो नहीं हैं । फिर सोचा कि आखिर गरुण क्यों आयेंगे ? एक बार जब मैंने उनका पीछा किया था तो भागते-भागते उन्हें क्षीर सागर में शरण लेनी पड़ी थी । गरुण की तो बात ही क्या उनके स्वामी विष्णुजी भी हमारे बल को भली-भाँति जानते हैं । ऐसे में यह कौन है ? तब तक जटायु जी और पास में आ गए तो रावण ने उन्हें पहचाना कि यह जटायु है ।



  जटायुजी ने पहले तो समझाया परंतु रावण से कोई उत्तर न मिलने पर युद्ध आरंभ कर दिया । रावण पर इन्होंने अपने पंजे और चोंच से कई भीषण आघात किए । रावण मूर्छित भी हुआ लेकिन अंततः उसने इनके पंख काट दिए । जिससे घायल होकर जटायु जी पृथ्वी पर गिर पड़े और राम-राम रटने लगे । इधर रावण सीताजी को लंका ले आया ।


   जटायु जी को बड़ा पछतावा हो रहा था कि मैं रावण को रोक नहीं सका ।  मेरे सामने वह मेरी पुत्रबधू सीताजी का हरण कर ले गया । दूसरी बात की चिंता थी कि बिना रामजी को सीताजी का हाल बताए प्राण छूटने वाले थे । वे इसी सोच में थे कि मैं रामजी के किसी भी काम नहीं आ सका । वे ऐसा सोचते और राम-राम रटते जाते थे ।


   रामजी और लक्ष्मणजी सीताजी को खोजते-खोजते इधर आ पहुँचे । रामजी को सुनाई पड़ा कि कोई उन्हें पुकार रहा है । फिर क्या था उन्हें सीताजी कि याद भूल गई और सबके सोच को मिटाने वाले सोचविमोचन और दयामय रामजी आवाज की तरफ चले  । पास जाकर देखा कि गीधराज जटायु घायल पड़े हैं-


सुनि निज नाम पुकारत कोई सिया की याद भुलाए ।
गीधराज ढिंग राम दयामय सोच विमोचन आए ।।


घायल जटायु को रामजी ने गोद में ले लिया और रामजी रो पड़े । मरते समय यह संयोग स्वयं राजा दशरथ को भी नहीं मिल सका था । लक्ष्मणजी ने जटायु जी को जल लाकर पिलाया । जटायु जी ने सीताजी के हरण की सारी बात बताई और बोले अब अंत समय है अब तक केवल आपके दर्शनों के लिए प्राण रुके थे । रामजी ने उन्हें प्राण न छोड़ने को कहा लेकिन वे जबाब में बोले कि सुर-नर-मुनि दुर्लभ यह संयोग फिर कहाँ मिलेगा ? जटायु जी ने अंतिम सांस रामजी के गोद में लिया । फिर राम जी ने पिता की तरह आँखों में आंशूं लिए हुए उनका अंतिम संस्कार किया-

      
ऐसा कहकर गीध जटायू प्रभु के धाम सिधाए ।
क्रिया किए निज कर रघुनायक जलजनयन जल लाए ।।


    रामजी के सिवा ऐसा दूसरा कौन है जिसकी गीध जैसे आमिष भोगी पक्षी पर इतनी कृपा हो ? ऐसा करने वाला दूसरा कोई न था, न है और न ही होगा । रामजी की कृपालुता, उदारता की तुलना नहीं हो सकती ।


  रामजी ने जटायुजी का श्राद्ध किया । उनकी ऐसी सदगति हुई । जिसकी कामना जन्म-जन्मांतर तक तपस्या करने वाले ऋषि-मुनि और योगीजन किया करते हैं । इस प्रकार जटायु जी धन्य और धरा-धाम पर सदा-सदा के लिए अमर हो गए । रामजी के यह गुण-स्वभाव में है कि वे उजड़े हुए को बसा देते हैं और हारे हुए को जिता देते हैं । जटायुजी रावण से हार गए थे लेकिन रामजी ने उन्हें जिता दिया और अपने धाम में बसा दिया ।


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शनिवार, 15 जून 2013

कैसे तुम्हें रिझाऊँ

हम सब चाहते हैं कि भगवान हमसे रीझ जांय । पर ऐसा होता नहीं है । ऐसा क्यों है ? क्या भगवान रीझना ही नहीं चाहते ? अथवा क्या भगवान बदल गए हैं ? ऐसा तो बिल्कुल नहीं है-

करुणासागर की करुणा में कमी नहीं कोई आई है ।
न ही राघव ने अपनी विरद की रीति भुलाई है ।।

आखिर तब क्या कारण है ? कहते हैं कि ‘रोपा पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय’ । बबूल का पेड़ लगाकर आम खाना चाहो तो यह कहाँ सम्भव है ? आम खाना हो तो बबूल नहीं आम का ही पेड़ लगाना पड़ेगा । ठीक ऐसे ही हम लाख चाहें कि भगवान हमसे रीझ जांए तो ऐसा बिल्कुल नहीं होगा जबतक हम इसके अनुरूप काम न करें ।


   कुछ ऐसा है जिससे रघुनाथ जी रीझ जाते हैं । तभी तो शबरी, जटायु, केवट, कोल-किरात-भील और बानर-भालुओं से रामजी रीझ गए थे । हमें तो लगता है कि हमारे अंदर एक भी गुण ऐसा नहीं है जिससे रामजी रीझ सकें । इन गुणों को कैसे अपने अंदर उतारू , यह भी हम नहीं जानते । ऐसे में यदि रघुनाथजी ही कुछ करें तभी काम बन सकता है अथवा नहीं ।


 संतो ने समझ-बूझ कर बहुत कुछ करने को कहा है । ग्रंथो ने भी रास्ते दिखाए हैं । अंततः सभी का यही निर्णय मालुम पड़ता है कि जिस पर रघुनाथ जी की अहैतुकी कृपा हो जाय अर्थात जिससे रामजी रीझना चाहें उसी पर रीझ जाते है । जतनों का क्या भरोसा ?


   गोस्वामीजी ने कहा है कि कई संत-महात्मा आजीवन नाना जतन करते रहते हैं फिर भी अंत समय में राम नाम भी मुँह से नहीं निकल पाता है । वहीं दूसरी ओर कोलों-किरातों व भीलों ने क्या किया था ? गीध जटायु ने क्या किया था ? बानरों और भालुओं ने क्या किया था ? इनको रामजी ने अपना लिया । ऐसे में कहना पड़ता है कि प्रभुजी जिसको अपनी ओर से कृपा करके अपना लें वहीं उनका हो सकता है ।


   फिर भी हमें कुछ न कुछ तो करना ही होगा । हाथ पर हाथ रखकर बैठने से काम थोड़े बनेगा । न ही यह कहने से काम चलेगा कि यदि रामजी को रीझना होगा तो रीझ ही जायेंगे हम क्या करें ? हमें प्रयास करते रहना है ।  अपने अंदर उन गुणों को उतारना होगा जिससे केवट, गीध जटायु और शबरी आदि से भगवान रीझ गए थे

              
 ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

भक्ति-भाव न मेरे, भाव कहाँ से पाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

गुन हैं एक न मेरे, गुन मैं कहाँ से लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

करम शुभाशुभ घेरे,  कैसे इन्हें भगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

पाप बुद्धि है मेरी, कैसे स्वच्छ बनाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

मन चंचल है मेरा, कैसे इसे टिकाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

दशरथ सी आसक्ति प्रभूजी मैं कैसे उपजाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

मातु कौसल्या जैसे प्रभूजी कैसे लाड लडाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

लक्ष्मण जैसा भाव समर्पण पामर कर न सकाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

त्याग भरत सा नेह चरण में कैसे नाथ लगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

रिपुहन जैसी प्रीति सादगी रघुवर कहाँ से लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

सीता जैसे जीवन अपना कैसे तुम्हें बनाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

केवट सा अनुराग नाथ मैं कैसे हिय जगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

जटायु जैसी भाग प्रभूजी कैसे भाग लिखाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

शबरी सा विश्वास भगति नव कैसे मैं उपजाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

हनुमत जैसे राम लखन सिय कैसे हिय बसाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

भोले शंकर जैसे मन को कैसे राम रमाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

तुलसी जैसा ध्यान प्रभू बिन ज्ञान कहाँ से लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

करनी अपनी समुझि-समुझि प्रभु मैं तो लाज लजाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

जनमि-जनमि बहु दूर हुए हम पास में कैसे आऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

जैसे-तैसे जो भी बनता गुन तेरे ही गाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

संतोष समुझि गुनगन की करनी विरद ते आस लगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।








रविवार, 1 जनवरी 2012

ऐसो भगवान कहाँ ?

आज बहुत से लोग खुद को भगवान कहने अथवा समझने लगे हैं । लेकिन मैं उन भगवान के बारे में बता रहा हूँ । जो संसार के एकमात्र ऐसे भगवान हैं । जिनके समान सिर्फ और सिर्फ वे ही हैं । ये भगवान पुराणपुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी हैं । इनका नेम, व्रत, शील ऐसा है जैसा किसी का नहीं है । श्रुतियाँ जिन्हें साक्षात धर्मस्वरूप कहती हैं ।

    श्रीराम जी को ऐसे लोग बहुत प्रिय होते हैं जो सामान्यतः किसी को प्रिय नहीं होते । भला दीन मलीनों से कौन अनुराग करेगा ? लेकिन रामजी करते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि ‘वन्दौं सीताराम पद जिन्हहिं परमप्रिय खिन्न’ ।
 
 रामजी इतने दयावान हैं कि दीनों पर उनकी दीनता देखकर ही द्रवित हो जाते हैं । ऐसा दयावान और कौन हो सकता है ?

   कोई कितना ही बड़ा पापी अथवा अपराधी क्यों न हो । यदि शरण में चला जाये तो चाहे उन्हीं का ही अपराधी हो, वे ऐसे छ्मावान हैं कि छमा करने में देर नहीं करते । इस तरह का छ्मशील कहाँ मिलेगा ?

 रामजी ऐसे दानी हैं कि सब कुछ दे देते हैं । बदले में कुछ लेते नहीं हैं । वे ऐसे दाता हैं जो देकर कभी यह जाहिर नहीं करते कि हमने इसको यह अथवा इतना दिया है । बल्कि देकर भूल जाते हैं । ऐसा उदार धनवान दाता कहीं हो सकता है क्या ?
 
  उनके गुणगण तो ऐसे हैं कि शेष, महेश, गणेश, सनक, सनन्दन , नारद, शारद और व्रह्मादि विशारद गाते रहते हैं । लेकिन अघाते नहीं हैं । ऐसा गुणवान और कौन होगा ?


  रामजी सभी के हितकारक हैं । वैसे तो कोई उनका शत्रु नहीं है । फिर भी वे अपने हित और अनहित का भी सदा हित ही करते और चाहते हैं । भला ऐसा हितवान और कौन होगा ?
 
  रामजी की छवि करोड़ो कामदेवों को भी लजाने वाली है । ऐसे लोकाभिराम महाछविधाम हैं कि सारे चर और अचर मोहित हो जाते हैं । खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे क्रूर हिंसारत प्राणी भी जिसकी रूप माधुरी से प्रभावित हो जाएँ । उनकी छवि की समानता और कौन कर सकता है ?

  रामजी बल के सागर हैं । सब कुछ करने में समर्थ हैं । बावजूद इसके परम सरल हैं । बहुत ही विनयशील हैं । ऐसा स्वभाव है कि रिपु भी सराहना करते नहीं थकते । रावण को सारी सृष्टि प्रतिकूल ही दिखती थी । कुछ अगर अनुकूल लगता था तो यह श्रीरामजी का स्वभाव ही था । परशुरामजी मारने-काटने की बात कर रहे थे । अपशब्द बोल रहे थे । और रामजी शिर झुकाए खड़े थे । ऐसा और कोई बलवाला न ही देखा गया है, न सुना गया है और न ही देखा जाएगा जो सबकुछ करने में समर्थ होकर भी सरलता, दया और विनय का प्रतिमूर्ति हो ।

   करुणा की खान होने के कारण ही भक्तों और संतो के खातिर रामजी नंगे पैर वन-वन फिरे । कोमलता भी जिसे देखकर सकुचा जाए ऐसे श्रीराम जी नंगे पैर चलकर भक्तों के पास जाकर मिले और दीनों का उद्धार किया । ऐसा करुनामय और दूसरा कौन हो सकता है ?

  इतिहास, वेद, पुराणादि साक्षी हैं कि किसी भी ने किसी गीध का इतना सम्मान नहीं किया ।
जितना रामजी ने जटायु का किया । उसे पिता कहकर बुलाये । पिता की तरह उसका श्राद्ध किया । भिलनी, जिसे लोग बहुत अपवित्र समझते थे, को माता कहा । गीध और भिलनी का इतना सम्मान करने वाला और दूजा कोई महान नहीं है । ऐसे एकमात्र श्रीरामजी हैं ।
  वानर , भालू , गीध और राक्षस को भी कोई अपना मित्र बनाता है क्या ? इनको मित्र बनाकर अपने साथ रखने वाले एकमात्र हमारे रघुनाथ जी हैं । यह सच ही कहा जाता है कि जिसका कोई सम्मान नहीं करता । रामजी उसका भी आदर, मान और सम्मान करते हैं ।
 
  अपने सेवकों, भक्तों का रामजी सदैव मान रखते हैं । सम्मान करते हैं । यदि भक्त के अंदर धूल के कण के बराबर भी कोई गुण हो तो रामजी भरे दरबार में उसका बखान करते हैं । ऐसा बखान कहीं होता है क्या ?

  रामजी को प्रेम से खिलाओ तो चाहे वह झूठी बेर अथवा साग पात ही क्यों न हो बखान-बखान कर खाते हैं । रूखा-सूखा सब खा जायेंगे । बस प्रेम होना चाहिए । और यदि प्रेम नहीं है तो मेवा-मिष्ठान चाहे जो कुछ हो ये नहीं खाते । इनकी भूँख खत्म हो जाती है । ऐसा भूँखा और कौन है ?

रामजी ऐसे धर्म-धुरंधर हैं कि वेद-पुराण इन्हें धर्म का ही स्वरूप कहते हैं । साक्षात धर्म ।
जो करें, जो बोले वहीं धर्म । भला ऐसा और कोई धर्मवान है ?

  इतनी और ऐसी सभी विशेषताओं वाला और कोई नहीं है । संत-भक्त और सदग्रंथ ऐसा ही कहते हैं । हरि, हर और विधाता के भी विधाता श्रीराम जैसा महिमावान कोई हो ही नहीं सकता । सच है हमारे श्रीराम के समान केवल और केवल एक श्रीराम जी हैं । ऐसा दूसरा कोई भगवान नहीं है----


ऐसो भगवान कहाँ ?

दीन मलीन जाहिं मन भावत ऐसो श्रीमान कहाँ ।।

दीनन दीनता देखि जो द्रवै ऐसो दयावान कहाँ

छमि अघ शरन गहे जो राखत ऐसो छ्मावान कहाँ ।।

सब कुछ देये कुछ नहीं लेये ऐसो धनवान कहाँ ।

सुर नर मुनि जेहि गुनगन गावैं ऐसो गुनवान कहाँ ।।

हित अनहित सबकर हित ताके ऐसो हितवान कहाँ ।

जासु महाछवि जग मन मोहै ऐसो छविवान कहाँ ।।

सरल स्वभाव विनय बल आगर ऐसो बलवान कहाँ ।

भगत के खातिर बन-बन डोलै ऐसो करुनाखान कहाँ ।।

गीध को पितु भिलनी मातु बुलाये ऐसो महान कहाँ

बानर, भालू, गीध, निसाचर को सनमान कहाँ ।।

साधु सभा जन रज गुन भाखत ऐसो बखान कहाँ ।

प्रेम भगति बस पाये रूखो-सूखो ऐसो  तृप्तिमान कहाँ ।।

धरम स्वरूप जासु श्रुति गावत ऐसो धर्मवान कहाँ ।

शील नेम व्रत जगत उजागर पुरुषपुरान कहाँ ।।

हरि, हर, बिधि जो सबको बिधाता ऐसो महिमावान कहाँ ।

संतोष के राम आन नहि दूजो राम समान कहाँ ?
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चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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