सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

गुरुवार, 4 जून 2026

इंद्रपुत्र जयंत की दुर्दशा- जब इंद्र पुत्र जयंत रामजी का बल-प्रभाव देखने आया

 

जयंत देखता कि देवी-देवता चित्रकूट में रामजी के दर्शन के लिए जाया करते हैं । जयंत की पत्नी भी रामजी के दर्शन के लिए आई थी । देवता लोग रामजी से अपनी रक्षा और सहायता के लिए प्रार्थना करते । जयंत सोचता कि राम तो अयोध्या के राजकुमार हैं। फिर इनके दर्शन के लिए क्यों जाना ? इसलिए उसने रामजी के बल-प्रभाव देखने का निश्चय किया । सच ही गया है कि जब किसी पर नाश छा जाता है तो उसकी मति मारी जाती है । जयंत का राम जी का बल-प्रभाव देखने के लिए-पता लगाने के लिए आना किसी चींटी का  समुंद्र की थाह लगाने जैसा था 

 

  उसने काग का भेष बनाकर सीताजी के पैर में चोंच मारी । रुधिर बहने लगा । जब रामजी जान पाए तो सींक का धनुष बनाकर सींक का ही वाण छोड़ दिया । और वह मंत्र के प्रभाव से ब्रह्मास्त्र में बदल गया । जयंत भाग खड़ा हुआ । वाण उसका पीछा करने लगा ।

 भागकर देवराज इंद्र अपने पिता के पास पहुँचा । यह जानकर कि यह रामजी से द्रोह करके आया है इंद्र कोई सहायता नहीं कर सके । शंकरजी, ब्रह्माजी, विष्णुजी आदि सभी के पास सभी के लोक में गया । लेकिन यह जानते ही कि यह रामद्रोही है, सहायता की बात तो दूर किसी ने उसे बैठने तक को नहीं कहा । जल्दी निकलो यहाँ से यह सुनकर वह हताश हो गया ।

  जैसे एक बार भगवान का चक्र ऋषि दुर्वासा के पीछे पड़ गया था और उन्हें कहीं ठौर नहीं मिली थी ठीक वही दशा जयंत की भी हुई । वह बहुत निराश हो गया और मन में बड़ा भय उत्पन्न हो गया ।

  उसे बिकल देखकर नारदजी को उसपर बड़ी दया आई । उन्होंने उसे समझाया कि जयंत कब तक और कहाँ तक भागोगे । ब्रह्माण्ड में कोई शक्ति नहीं है जो रामद्रोही की रक्षा अथवा सहायता कर सके । रामजी बड़े दयालु हैं, शरणागतवत्सल हैं । तुम बिना देर किए रामजी की शरन में चले जाओ तो तुम्हारी प्राण रक्षा हो जायेगी ।

 

जयंत वापस चित्रकूट आ गया । और बोला कि हे रघुनाथ जी मैंने आपका प्रभाव देख लिया, भली-भाँति जान लिए । और मुझे मेरे कर्मो का फल मिल गया है । हे प्रभु अब मैं आपकी शरण में आया हूँ मेरी रक्षा करो ।

 

   उसकी दुख भरी वाणी को सुनकर रामजी ने उसके प्राण की रक्षा कर लिया । उसका वध नहीं किया । लेकिन रामजी का वाण अमोघ होता है इसलिए उसकी एक आँख को वाण का लक्ष्य बना दिया जिससे वह एक नयन हो गया ।

 

कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर वध उचित ।

प्रभु छाडेउ करि छोह कोउ कृपालु रघवीर सम ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

रविवार, 17 मई 2026

संसार और मनुष्य जीवन सनातन सिद्धांत के अनुसार चलता है-चरण चिंह रघुवीर के संतन सदा सहायका

संसार और जीवन सनातन सिद्धांत के अनुसार चलता है । कोई माने या ना माने, जाने या न जाने यह दूसरी बात है । सनातन का कर्म का सिद्धांत सब पर लागू होता है- ‘जो जस करै सो तस फल चाखा’ । पूर्व कर्म के अनुसार जीव को घर-परिवार, माता-पिता आदि सम्बंधी और सुख-दुख जन्म लेते ही मिलते हैं । प्रत्येक जीव सुख चाहता है । दुखी होना कोई नहीं चाहता । क्योंकि प्रत्येक जीव आनंद सिंधु-सुख राशि से ही निकला है-

जो आनंदसिंधु सुखरासी । सीकर ते तिहुँलोक सुपासी ।।

सो सुखधाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक विश्रामा ।।

 

  प्रत्येक मनुष्य सुख के लिए प्रयत्न करता है । दुख के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता । क्योंकि वह सुखी होना चाहता है और दुख से दूर होना चाहता है । लेकिन उसे दुख मिलता ही रहता है । क्योंकि सुख-दुख कर्म के अनुसार मिलते हैं ।अगर वर्तमान का कर्म ठीक है तो भी पूर्व का कर्म दुख देता ही रहता है ।

जन्म और मृत्यु का सिद्धांत सब पर लागू होता है । हर प्राणी जो जन्मता है मरता है और जो मरता है जन्मता है जब तक मुक्त नहीं हो जाता । पृथ्वी के प्रत्येक मनुष्य का शरीर साढ़े तीन हाथ का ही होता है और साढ़े तीन हाथ में चौरासी अंगुल होता है । प्रत्येक जीव चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है इसलिए उसे चौरासी अंगुल लम्बाई का मनुष्य शरीर मिलता है-‘आकरि चारि लाख चौरासी  । योनि भ्रमत यह जिव अविनासी’

संसार चलता रहे इसलिए जन्म और मृत्यु दोनों जरूरी है । मृत्यु का कोई बानक उत्पन्न हो जाता है । जैसे कोई साँप के काटने से मरता है, कोई दुर्घटना से मरता है और कोई किसी रोग के कारण मरता है । आदि । भगवान अपने ऊपर नहीं लेते ।

 

सूर्य ग्रहण सदैव सनातन तिथि के अनुसार अमावस्या तिथि को ही लगता है । यह अटल सिद्धांत है । लेकिन किसी विशेष डेट (तारीख) को सदैव लगेगा ऐसा नहीं है । क्योंकि प्रकृति भी सनातन सिद्धांत के अनुसार ही चलती है ।

 

  इसी प्रकार चंद्र ग्रहण सदैव पूर्णिमा तिथि को ही लगता है । यह भी सनातन का अटल सिद्धांत है । लेकिन किसी विशेष डेट (तारीख) को सदैव लगेगा ऐसा नहीं है ।

 

इस तरह हम देख सकते हैं, समझ सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं कि संसार और जीवन सनातन सिद्धांत के अनुसार चलते हैं ।

 

    जब जीव मनुष्य योनि में गर्भ में आता है तो उसे पूर्व जन्म और कर्म का स्मरण हो जाता है । और वह भगवान से प्रार्थना करता है कि मुझे अब गर्भवास के दुख से मुक्त कीजिए अब मैं चौरासी से छूटने के लिए भजन करूँगा- ‘अब जग जाइ भजौं चक्रपानी’ । जीव के इस संकल्प के साथ ही उसके शरीर पर शंख और चक्र सनातन के दो प्रमुख प्रतीक चिंह आ जाते हैं ।

 

  हाँथ की अँगुलियों और अगूँठे के अग्र भाग पर ध्यान से देखने पर शंख और चक्र के निशान दिखते हैं । किसी मनुष्य में शंख और चक्र दोनों के और किसी-किसी में केवल शंख अथवा केवल चक्र के निशान होते हैं । 

 

  पुराने लोग एक कहावत भी कहते थे कि- दशो चक्र राजा दशो शंख जोगी । मतलब किसी किसी के अँगूठे और अँगुलियों पर केवल शंख अथवा केवल चक्र के चिंह होते हैं और दशो शंख वाले जोगी और दशो चक्र वाले राजा बनते हैं 

किसी-किसी के हाथ की हथेली और पैर के तलवें में भी सनातन प्रतीक पाए जाते है । क्योंकि प्रत्येक मनुष्य का मूल सम्बंध जाने-अनजाने राम जी से है और रामजी के पैर के तलवें में शंख, चक्र, ध्वजा आदि के अडतालीस चिंह बसते हैं-

सीतापति पद नित बसत एते मंगलदायका 

चरण चिंह रघुवीर के संतन सदा सहायका 


।। जय श्रीराम ।।

शुक्रवार, 1 मई 2026

पुनर्जन्म और चौरासी के चक्कर का एक जीवंत प्रमाण

 पुनर्जन्म और चौरासी के चक्कर के  अकाट्य सिद्धांत को कोई भी जान और समझ सकता है । यहाँ पर एक जीवंत प्रमाण के माध्यम से इस सिद्धांत को समझाया गया है

हाथ की कोहनी से मध्यमा अगुँली तक की माप को एक हाथ की माप कहा जाता है । प्रत्येक मनुष्य के शरीर की लम्बाई उसके हाथ की माप से साढ़े तीन हाथ ही होती है।  एक हाथ की माप मे केवल चौबीस अँगुल होता है । इस प्रकार साढ़े तीन हाथ चौरासी अँगुल के बराबर होता है । 

 

प्रत्येक मनुष्य के शरीर की लम्बाई चाहे वह छोटे कद का अथवा बड़े कद का हो, बच्चा हो या युवा  उसके हाथ के अँगुल की माप से चौरासी अँगुल ही होती है क्योंकि वह चार प्रकार  की चौरासी लाख योनियों में जन्मता और मरता रहता है-

आकर चारि लाख चौरासी । 

योनि भ्रमत यह जिव अविनासी ।। 

 

कोई भी मनुष्य (स्त्री अथवा पुरुष) आसानी से नाप लेकर देख सकता है कि उसके शरीर कि लम्बाई साढ़े तीन हाथ है । किसी भी हाथ की चार अँगुलियों को एक साथ रखते हुए माप लेकर देखा जा सकता है कि एक हाथ की माप चौबीस अंगुल के बराबर है । और इस प्रकार पूरे शरीर की लम्बाई चौरासी अंगुल की ही है । बच्चा अथवा युवा से और छोटे अथवा बड़े कद से कोई अंतर नहीं पड़ता है । शरीर की लम्बाई चौरासी अँगुल ही होती है-

आकरि चारि लाख चौरासी ।

जाति जीव जल थल नभ वासी ।।

 

 एक ही जीव कभी जरायुज, कभी स्वेदज, कभी अंडज और कभी उद्भिज के रूप में जन्मता है और कभी जल में, कभी थल में और कभी नभ में रहता है । यह भ्रमण- जन्म-मृत्यु का चक्कर चलता रहता है । जन्मता है फिर मरता है और मरता है फिर जन्मता है । इसे चौरासी का चक्कर भी कहा जाता है ।

 

 चूँकि चौरासी के चक्कर से छुटुकारा मनुष्य योनि पाकर ही हो सकता है इसलिए मनुष्यों को चौरासी अँगुल का शरीर मिलता है कि अब इस चौरासी के चक्कर से छूटने का उपाय कर ले-'भजि लै सारँगपानी' । चौरासी लाख योनियों में भटक-भटक कर चौरासी अँगुल का शरीर मिलता है । यह इस बात का द्योतक है कि तूँ चौरासी में भटक चुका है 

जनम-मरण के चक्कर से छूटने को चौरासी का छूटना भी कहा जाता है । और चौरासी अँगुल के शरीर के माध्यम से ही जीव इस चौरासी से छूट सकता है  

 

।। जय श्रीराम ।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

अब मैं जानी देंह बुढानी

 

अब मैं जानी देंह बुढानी 

सीस, पाँउ, कर कह्यौ न मानत, तन की दसा सिरानी ।।

आन कहत आनै कहि आवत, नैन-नाक बहै पानी ।

मिट गइ चमक-दमक अँग-अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी ।।

नाहिं रही कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात बिरानी ।

सूरदास अब होत बिगूचनि, भजि लै सारँगपानी ।।


।। जय श्रीराम ।।


बुधवार, 8 अप्रैल 2026

कहाँ कमी जाके राम धनी

 

सूरदासजी महाराज सूरसागर में कहते हैं कि जिसके स्वामी रामजी हैं उसको किस बात की कमी है ।....


कहाँ कमी जाके राम धनी ।

मनसा नाथ मनोरथ-पूरन, सुख-निधान जाको मौज घनी ।।

अर्थ-धर्म अरु काम-मोक्ष फल, चारि पदारथ देत गनी ।

इंद्र समान हैं जाके सेवक, नर बपुरे की कहा गनी ।।

कहा कृपिन की माया गनियै, करत फिरत अपनी-अपनी ।

खाइ न सकै खरचि नहिं जानै, ज्यों भुजंग-सिर रहत मनी ।।

आनँद-मगन राम-गुन गावै, दुख-सँताप की काटि तनी ।

सूर कहत जे भजत राम कौ, तिन सौं हरि सौं सदा बनी ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

 

गुरुवार, 26 मार्च 2026

बड़भागिन कौशल्या माई

 

।। राम राम ।।

 

बड़भागिन कौशल्या माई ।

दशरथ घरनि भाग तव जागे राम प्रगट भए आई ।।१।।

दिनमणिकुल भूपतिमणि दशरथ तियमणि आप सुहाई ।

सुर नर मुनि तव भाग्य सराहत तिहुँपुर होत बड़ाई ।।२।।

मुनि मन अगम निगम नहिं जानैं शिव अज जेहि रहे ध्याई ।

सो श्रीराम गोद तव खेलत कहत बुलावत माई ।।३।।

दीन संतोष जगत पितु माता निज पय पान कराई ।

सुरमणि राम बाल सुख दीन्हे तो सम कोउ जग जाई ।।४।।

 

।। जय श्रीराम ।।

 

सोमवार, 2 मार्च 2026

श्रीराम गीता के कुछ अद्भुत अंश (श्लोक और हिंदी-अनुवाद)

 

जब हनुमानजी ने भगवान श्रीराम से उनका परिचय जानने के उद्देश्य से पूछा कि आप कौन हैं तब रामजी ने हनुमानजी को अपना विराट स्वरूप दिखलाया और भगवान श्रीराम ने अपने सर्वात्मक,निर्गुण-सगुण-उभयात्मक, महायोगेश्वरेश्वर, सर्वेश्वर और सर्वशासक  स्वरूप का परिचय देते हुए हनुमानजी को जो उपदेश दिया उस श्रीराम गीता के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं

 

 निर्गुण सगुण उभयात्मक रूपा । कहन लगे प्रभु आप सरूपा ।।

 सर्वात्मक सर्वेश्वर रामा । सर्वशासक परात्पर परधामा ।।   

 

हनुमान ! यह आत्मा मैं ही हूँ । मैं ही अव्यक्त मायाधिपति  परमेश्वर हूँ । मुझे ही संपूर्ण वेदों में सर्वात्मा और सर्वतोमुख कहा गया है । 

 

एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः 

 कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ।।

 

संपूर्ण कामनाएँ, संपूर्ण रस तथा संपूर्ण गंध मैं ही हूँ । जरा और मृत्यु मुझे छू नहीं सकते । मेरे सब ओर हाथ और पैर हैं । मैं ही सनातन अन्तर्यामी परमात्मा हूँ ।

सर्वकामः सर्वरसः सर्वगंधोऽजरोऽमरः ।

सर्वतः पाणिपादोऽहमंतर्यामी सनातनः ।।

 

मैं ही सर्वत्र व्यापक. शांत और ज्ञान स्वरूप परमेश्वर हूँ । मुझसे श्रेष्ठ कोई स्थावर-जंगम प्राणी नहीं है । जो मुझे जान लेता है वह मुक्त हो जाता है

  सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः ।

  नास्ति मत्परमं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते ।।

 

मैं ही संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और फल देने वाला हूँ । संपूर्ण देवताओं का शरीर धारण करके मैं सर्वात्मा ही सबकी स्तुति-प्रशंसा का विषय हो रहा हूँ

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रदः ।

सर्वदेवतनुर्भू‍‌त्वा सर्वात्मा सर्वसंस्तुतः ।।  

मेरे भक्तों का कभी विनाश नहीं होता । मेरे भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । मैंने पहले से ही यह घोषणा कर रक्खी है कि मेरे भक्त का नाश नहीं होता है

न मद्भक्ता विनश्यन्ते मद्भक्ता वीतकल्मषाः ।

आदावेत्तप्रतिज्ञातं न में भक्तः प्रणश्यति ।।

मैं ही योगियों को समस्त संसार बंधन से मुक्त करता हूँ । संसार का हेतु भी मैं ही हूँ और समस्त संसार से परे भी मैं ही हूँ

अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह ।

संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसार वर्जितः ।।

मैं ही स्रष्टा, पालक और संहारक हूँ । माया का स्वामी भी मैं ही हूँ । मेरी शक्तिस्वरूपा माया समस्त लोक को मोह में डालने वाली है

अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः ।

मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी।।

मैं ही संपूर्ण शक्तियों का प्रवर्तक, निवर्तक सबका आधारभूत तथा अमृत की निधि हूँ 

अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः ।

आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च ।।

 

कुछ साधक मुझे ध्यान के द्वारा देखते हैं । दूसरे लोग ज्ञान से, अन्य लोग भक्तियोग के द्वारा मेरा साक्षात्कार करते हैं । तथा कतिपय साधक कर्मयोग के द्वारा मेरा साक्षात्कार करते हैं

ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे ।

अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे ।।

सभी भक्तों में मुझे वह सबसे प्रिय है, जो विशुद्ध ज्ञान के द्वारा मेरी नित्य आराधना करता है, अन्य किसी साधन से नहीं

 

सर्वेषामेव भक्तानामेष प्रियतरो मम ।।

यो विज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा ।।

मेरी आराधना के अभिलाषी अन्य जो तीन प्रकार के भक्त हैं वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं और पुनः लौटकर इस संसार में नहीं आते

 

अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकान्क्षिणः ।

तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः ।।

 

जो मुझे इस प्रकार महायोगेश्वरेश्वर जानता है वह अविचल योग से युक्त होता है इसमें संशय नहीं है

यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम् ।

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ।।

 भगवान श्रीराम कहते हैं कि पवननंदन ! मैं संपूर्ण लोकों का एकमात्र स्रष्टा, सभी लोकों का एकमात्र पालक, सभी लोकों का एकमात्र संहारक, सबकी आत्मा सनातन परमात्मा हूँ ।

सर्वलोकैकनिर्माता  सर्वलोकैकरक्षिता ।

सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं  सनातनः ।।

 

इस बिषय में बहुत कहने से क्या लाभ यह सारा जगत मेरी शक्ति से ही उत्पन्न हुआ है, मुझसे ही इस विश्व का भरण-पोषण होता है तथा अंततोगत्वा सबका मुझमें ही प्रलय होता है

 

बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकंजगत ।।

मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं ब्रजेत् ।।

 

 

 

।। जय श्रीराम ।।

 

 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

रघुकुलभूषण कब सुधि लैहैं


।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।। 


घुकुलभूषण कब सुधि लैहैं ।

राम लखन धनुधर दो भाई चरण कमल घर धरिहैं ।।1।।

जोहत बाट बहुत दिन बीते कब उर शीतल करिहैं ।

जन मन भावन रूप लुभावन कब रघुनाथ देखैहें ।।2।।

 चरण कमल गहि रघुवर केरे प्रेम वारि दृग झरिहैं ।

वदनमयंक चकोर विलोचन निरखि मोद कब भरिहैं ।।3।।

दीनमलीन जानि रघुनंदन निज गुनगन अनुसरिहैं ।

दीन संतोष परिहरे न कबहूँ दीन जानि घर अइहैं ।।4।।

 

।। जय श्रीराम ।।

 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

मानहु तनु धरि राम प्रेम आयो है

 

हनुमानजी जैसा राम प्रेमी कोई नहीं है । हनुमानजी को देख-सुनकर ऐसा लगता है कि मानो रामजी का प्रेम ही मूर्तिमान होकर अर्थात शरीर धारण करके हनुमान जी के रूप में आ गया हो ।

 

 हनुमानजी का अंग-अंग रामजी के रंग में रँगा हुआ है । उनका जीवन, जीवन का हर पल रामजी के लिए है । ऐसा दूसरा कौन हो सकता है ।

 

 राम जी के प्रेम में हनुमानजी व्रह्मलोक के वैभव को भी कुछ नहीं समझते हैं-व्रह्म लोक वैभव विरागी । हनुमानजी को केवल रामजी चाहिए । राम जी का प्रेम चाहिए ।

 

हनुमान जी की रूचि रामजी में हैं , रामजी के नाम में है, रामजी की कथा में और क्या कहें हनुमानजी की काया-शरीर राम मय है-

 

राम नाम कथा रूचि राममय कायो है ।

मानहु तनु धरि राम प्रेम आयो है ।।

 

।। जय हनुमानजी ।।

 

 

 

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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