सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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गुरुवार, 5 जून 2025

विभीषणजी पर भगवान शंकरजी की कृपा

 

जितने भी साधु-संत, ऋषि-मुनि और गृहस्थ आदि हैं उनको संसार से तरने और भगवान से जुड़ने का योग, संयोग, विवेक आदि शंकर जी की कृपा से ही मिलता है

  संसार में जन्म हो जाता है लोग आजीविका के लिए कार्य करके, खा-पीकर, घूमकर जीवन बिता लेते हैं और अचानक अंत समय आ जाता है लेकिन संसार में रहकर भगवान से भी जुड़ना चाहिए यह भी एक बहुत जरूरी कार्य है । इसका विवेक ही नहीं उत्पन्न हो पाता

 

 किसी-किसी को यह विवेक उत्पन्न होता है और जिस किसी को यह विवेक उत्पन्न होता है उसे शंकर जी की कृपा से ही यह विवेक उत्पन्न होता है- ‘बहु जन्म उपायन कर अनेक बिनु शिव कृपा नहिं भव विवेक’

 

 कुलमिलाकर भगवान शंकर की ही कृपा से लोग भगवान से जुड़ते हैं, भक्ति में लगते हैं और संसार सागर से तरते हैं । विभीषण जी जब तपस्या कर रहे थे उस समय भी ब्रह्मा जी के साथ शंकरजी विभीषण जी को वरदान देने आए थे और विभीषण जी को भक्ति का वरदान मिला था ।

इसके बाद विभीषणजी लंका में ही रहते आ रहे थे । सत्य, नीति और धर्म के रास्ते पर चल रहे थे । और अपने बड़े भाई रावण को भी धर्म के रास्ते पर लाना चाहते थे । लेकिन सफल नहीं हुए ।

   जब विभीषण जी को रावण ने लात मारा और लंका से निकाल दिया तब विभीषण जी के पास कोई रास्ता ही नहीं बचा था कि कहाँ जाएँ और क्या करें ? रावण का इतना प्रभाव था कि कोई भी उसके विरोध में नहीं जा सकता था । कोई भी देवता, नाग, यक्ष, दानव, असुर आदि विभीषण जी को नहीं रख सकता था- ‘राखि विभीषण को सके तेहि काल कहाँ को’

 

विभीषण जी पहले अपनी माता के पास गए और उन्हें सारी स्थिति और परिस्थिति से अवगत कराया । फिर अपने भाई कुबेर जी के पास गए और उन्हें सारा हाल बताया । यही प्रश्न था कि क्या किया जाय ?

   विभीषण जी और कुबेरजी सोच-विचार कर ही रहे थे और उन्हें शंकरजी के दर्शन हुए । शंकरजी बोले वत्स विभीषण ज्यादा सोच-विचार करने की जरूरत नहीं है और न ही भगवान के पास जाने में किसी विशेष मूहूर्त की ही जरूरत होती है । सारी शंकाओं को त्याग दो और असरन-सरन भगवान श्रीराम की शरण में चले जाओ । 

इस प्रकार जब विभीषण जी सोच-विचार में पड़े थे, शंका में घिरे थे तब एक बार फिर उन्हें शंकर जी की कृपा प्राप्त हुई । और शंकर जी ने आकर श्रीराम शरण में जाने का मार्ग प्रशस्त किया जो विभीषण जी के लिए केवल एक मात्र विकल्प और परम कल्याणकारी था । फिर विभीषण जी रामजी की शरण में चल दिए –

चलो रे मन श्रीराम की शरन ।

सबबिधि लायक श्रीरघुनायक, आरत आरति हरन ।।

अगजग नायक दीन सहायक, अघ अरु दोष दलन ।

करुणासागर विरद उजागर, सियावर शील सदन ।।

दीन मलीन नहीं जग कोई, आश्रय एक चरन ।

सबबिधि हीन नहीं गुन एको, सुजस सुने श्रवन ।।

शरन शबद सुनि प्रभुजी रीझत, फेरत नाहीं वदन ।

बानर भालु निसाचर राखे, दीनन भीर भवन ।।

सरल स्वभाव ठकुरई न जानैं, दीनन प्रीति गहन ।

राम स्वभाव रीति उर धरिये, तजि अघ दोष डरन ।।

दीन संतोष नहीं बल मोरे, जप तप आदि भजन ।

असरन सरन विरद बल जीवत, रखिए हेरि जतन ।।


।। हर हर महादेव ।।

रविवार, 25 मई 2025

राम के नाम की महिमा न्यारी । इसने कितनो की बिगड़ी सवाँरी

 

राम के नाम की महिमा न्यारी ।

इसने कितनो की बिगड़ी सवाँरी ।।

राम राम जपते हैं त्रिपुरारी।

चन्द्रमौलि गंगाधर कामारी ।।

जपती रहती हैं गौरा दुलारी ।। इसने. ।।

राम राम भजते हैं अज वेद धारी ।

जग के विधाता बने सृष्टिकारी ।।

दुख तम को है नाम तमारी ।। इसने. ।।

राम नाम के होके परायण ।

धाम बसते हैं अपने नारायण ।।

राम नाम पिता महतारी ।। इसने.।।

महामुनि गन हैं राम भजते ।

निस वासर रहें राम रटते ।।

बड़ा सरल सरस हितकारी ।। इसने. ।।

अर्जुन जी बोले कन्हैया ।

पार कैसे लगे जीवन नैया ।।

राम भजने से बोले मुरारी ।। इसने. ।।

युधिष्ठिर ने पूछा श्रीव्यास (जी) से ।

मुक्ती का साधन कहो नाथ मोसे ।।

रामनाम भव तरु को आरी ।। इसने. ।।

साधु सदग्रंथ गाते ही रहते ।

महिमा फिर भी नहीं वो समझते ।।

संतोष जैसे जो मूरख अनारी ।। इसने. ।।

 

।। श्रीराम नाम महाराज की जय ।।

सोमवार, 7 अगस्त 2023

शंकरजी की कृपा के बिना संसार और इससे तरने का विवेक नहीं होता-बिनु शंभु कृपा नहिं भव विवेक

 

न संसार अपना है न ही शरीर अपना है । इस संसार रुपी सागर से तरना है अर्थात हम रामजी के हैं और हमें रामजी से ही मिलना है । यह विवेक ही भव विवेक है । यह जानना, बोलना, बताना दूसरी बात है लेकिन अंदर से इसे मानना और समझना तथा इसके अनुरूप व्यवहार करना दूसरी बात है । और यह शंकर जी की कृपा से होता है 


 जैसे कोई किसी शहर में जाए और वहाँ एक कमरा लेकर रहने लगे तो वह उसमें रहता भले ही है लेकिन वह कमरा उसका नहीं रहता है । बस थोड़े दिन ठहरने के लिए उसे वह कमरा मिला है । इसी तरह हर जीव अपने शरीर रुपी कमरे में कुछ दिन के लिए रहता है । जैसे कमरा कुछ दिन रहने के लिए तो है लेकिन उसका नहीं है । ठीक ऐसे ही यह शरीर कुछ दिन रहने के लिए ही मिला है । कोई कहता है कि अमुक व्यक्ति की आयु तीस वर्ष है तो इसका मतलब होता है कि अमुक जीव को उस शरीर में रहते हुए तीस वर्ष हो गया । तीस वर्ष की अवस्था उस शरीर की है । जीव की कोई अवस्था निर्धारित ही नहीं की जा सकती क्योंकि वह अनादि है ।

 

 संसार की वास्तविकता क्या है ? संसार का असली स्वरूप क्या है ? जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है ? माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री, पुत्र-पुत्री, पति आदि सम्बंधी इनसे सम्बंध किसी प्रारब्ध के कारण ही है । फिर भी शरीर अपना है, घर-मकान अपना है, सभी सम्बंधी अपने हैं यह मानकर जीव भुलावे में रहता है । सबको पकड़कर रखना चाहता है । लेकिन कुछ पकड़ में आता नहीं है । एक-एक करके सब कुछ छूटता जाता है । एक दिन घर-मकान आदि और शरीर भी छूट जाता है । लेकिन आसक्ति छूटती नहीं है ।

 

एक दो युग नहीं अनेकों कल्पों तक अनेक उपाय क्यों न किए जाएँ लेकिन संसार के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाता । संसार के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान भगवान शंकर की कृपा से ही होता है । जब तक जीव पर भगवान शंकर की कृपा नहीं होती तब तक वह संसार में ही उलझा रहता है । उसकी गति, उसकी मति रामजी की ओर हो ही नहीं पाती । गोस्वामी तुलसीदासजी जी कहते हैं कि विज्ञान के धाम पार्वती-रमण शंकर जी मेरे भय को दूर करने वाले हैं । क्योंकि शंकर जी संसार जनित समस्त भयों-भव भय को दूर करने वाले हैं -

 

बहु कल्प उपायन करि अनेक । बिनु शंभु-कृपा नहिं भव विवेक ।।

विग्यान-भवन गिरिसुता-रमन । कह तुलसिदास मम त्रास समन ।।

·        *   *    *    *     *   *     *   *    *   *

जा पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी ।।

 

 

।। विज्ञान भवन पार्वती रमण शंकरजी की जय ।।

 

मंगलवार, 1 मार्च 2022

होउ कृपालु महेश भवानी

    ।। नमः शिवाय  


जय महादेव रूप गुन धामा । प्रनत कामतरु पूरणकामा ।।१।।

ज्ञान विराग भगति एक ठामा । बसत लहत शिव पहिं विश्रामा ।।२।।

राम नाम श्रीराम सनेही । रमत नाम गुन प्रीति निबेही ।।३।।

राम भजत लखि अति सुख पावत । नाम अभास मोद मन आवत ।।४।।

जगतगुरु जग सकल सिखावत । राम भजो भजि राम बतावत ।।५।।

आशुतोष गुन गन सब गावत । फूल पत्र जल ते दुख जारत ।।६।।

महिमा अमित वेद नहि जानत । सुर मुनि असुर साधु सब मानत ।।७।।

साधु संत सदग्रंथ बतावत । राम भगति पथ शिव होइ आवत ।।८।।

द्रवत जब शिव औढरदानी । जोरत जन मन शारंगपानी ।।९।।

दीन संतोष दीन जन जानी । होउ कृपालु महेश भवानी ।।१०।।

      

       ।। महादेव भगवान शंकरजी की जय ।।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

होनी को भी बदल देने वाले भगवान शंकरजी-भाविव मेटि सकँइ त्रिपुरारी

महादेव भगवान शंकर जी की अतुलित महिमा है । शंकरजी भावी अर्थात होनी को भी बदल सकते हैं । कथा आती है कि मार्कंडेय ऋषि को केवल पाँच वर्ष की ही आयु मिली थी । लेकिन शंकर जी ने इस होनी को भी बदल दिया था । मार्कण्डेय ऋषि भगवान शंकर की कृपा से इतनी आयु प्राप्त कर लिए कि लगभग अमर हो गए ।

 

व्रह्माजी पार्बती माता से कहते हैं कि जिन लोगों के भाग्य में मैंने सुख की निशानी भी नहीं लिखी थी ऐसे लोगों के लिए भी सुख के साधन की व्यवस्था करते-करते मुझे नाको चने चबाने पड़ते हैं क्योंकि आपके पति भोले शंकर औढरदानी जब देने पे आ जाते हैं तो किसी को भी कुछ भी दे डालते हैं । देने में कुछ बिचार नहीं करते कि किसे और कितना देना है ।

 

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान शंकर माँगने वाले से कहते हैं कि देखो कम मत माँगना । इस लोक में कोई सुखी हो और परलोक में भी उसे इंद्र के समान सम्मान मिले तो यही समझना चाहिए कि जरूर इसने कभी न कभी शंकरजी को या तो मदार के चार पत्ते या धतूर के दो फूल अर्पण कर दिए होंगे ।

 

  इस प्रकार शंकरजी थोड़े में ही बहुत कुछ दे देते हैं । जिसके भाग्य में कुछ नहीं है उसको भी बहुत कुछ दे देते हैं । और तो और भावी को भी बदल देते हैं –

 

औढरदानि द्रवत पुनि थोरे । सकँइ न देखि दीन कर जोरे ।।

जो तप करइ कुमारि तुम्हारी । भाविव मेटि सकँइ त्रिपुरारी ।।

 

संत और ग्रंथ बताते हैं कि जब शंकरजी किसी से विशेष प्रसन्न हो जाते हैं तो उसे भगवान राम की भक्ति दे देते हैं । भगवान राम के चरणों में प्रेम दे देते हैं । इसलिए अध्यात्मिक दृष्टि में शंकरजी का यह कहना कि थोड़ा मत माँगना का मतलब है कि माँग ही रहा है तो राम जी के चरणों में प्रेम माँग ले । रामजी की भक्ति ही माँग ले-

 

जापर कृपा न करँइ  पुरारी । सोउ न पाउ मुनि भगति हमारी ।।

बिनु छल विश्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन ऐहू ।।

 

।। औढरदानी भगवान महादेव की जय ।।

 

रविवार, 1 मार्च 2020

रामजी की सही पहिचान उनका स्वभाव है : अस सुभाउ कहुँँ सुनउँ न देखउँ


संत और सदग्रंथ कहते हैं कि भगवान राम जैसा स्वभाव किसी का भी नहीं है । तथा ऐसा स्वभाव न कहीं देखने में आता है और न ही कहीं सुनने में आता है । यहाँ कहीं का मतलब तीनों लोकों, चौदहों भुवनों तथा तीनों कालों से है ।

                 
  जिसके चरणों की पूजा शंकर जी और व्रह्मा जी भी करते हों-‘शिव अज पूज्य चरण रघुराई’, जिसने शंकरजी, व्रह्माजी, और विष्णुजी को भी महिमावान बनाया हो- ‘शिवहिं शिवता विधिहिं विधिता हरिहिं हरिता जो दई’ । जिसकी इतनी महिमा हो, वह परम सरल हो, अपनी महिमा को प्रगट करके न दिखाए, नियम-नीति का सदा पालन करे, दीन-हीन पर विशेष कृपा करे, परम दयालु हो, परम उदार हो, कोल-किरात, भील, केवट वानर और भालू आदि को भी अपनाकर मित्र बनाकर सम्मान करे, गीध का भी आदर-सत्कार करे, पिता के समान माने तो उसकी समता दूसरा कौन कर सकता है ? ऐसा करने वाला राम जी के सिवा दूसरा कौन है ? ऐसा स्वभाव और किसका है ? 


  गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस संपदा को शंकरजी ने दश सिर अर्पित करने पर रावण को दिया था । उसी संपदा को राम जी ने विभीषण जी को सकुचाते हुए दिया । कहा कि हे विभीषण मेरे दर्शन का फल अमोघ होता है इसलिए जद्यपि आपकी इच्छा नहीं है फिर भी लंका के राज्य को मेरे देने से स्वीकार करो ।


कागभुसुंडि जी कहते हैं कि हे गरुड़ जी रामजी के समान उदार और सहज कृपालु स्वभाव वाला कौन है ? उनकी बराबरी का भला दूसरा कौन है ? उनसे समता करने वाला दूसरा कौन है ? किसे राम जी के समान कहा जाय ? क्योंकि ऐसा स्वभाव किसी का भी नहीं है । ऐसा स्वभाव न कहीं दिखने में आता है और न ही सुनने में आता है-


अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ । केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ ।


 जनकपुर के दूतों से राजा दशरथ ने पूछा कि क्या आप लोगों ने राम लक्ष्मण को ठीक से देखा है ? क्या आप राम जी को पहचानते हैं ? क्योंकि राम जी की सही पहिचान उनका स्वभाव ही है । यहीं उन्हें सबसे अलग करता है । सभी देवी-देवता आदि से रामजी को अलग करने वाला राम जी का स्वभाव ही है ।


  कैसा स्वभाव है मेरे राम जी का ? परम सरल स्वभाव है दीन-हीन और मलीन पर विशेष कृपा करने का स्वभाव है  अपने प्रभाव को प्रगट न करने का स्वभाव है । अपनी महिमा को प्रगट न करने का स्वभाव है । सबका यथा योग्य आदर सत्कार और मान-बड़ाई देने का स्वभाव है । आदि । इसलिए दशरथ जी दूतों से कहते हैं कि यदि आप रामजी को पहचानते हैं तो उनका स्वभाव बताइए- पहिचानहुँ तुम कहउ सुभाऊ ।


शंकरजी ने पार्वती जी से यहाँ तक कह दिया कि हे उमा जो मेरे रामजी का स्वभाव जान जाता है उसे राम जी के सिवा त्रिलोकी में और कोई तथा कुछ और भाता ही नहीं है । भाता है तो राम जी का भजन, चरित्र और राम जी स्वयं-


उमा राम सुभाउ जेहि जाना । ताहि भजन तजि भाव न आना ।



।। जय श्रीराम ।।

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

वेद विदित त्रिभुवन गुरू भगवान शंकर की कृपा के बिना जीव के अंदर भगवान राम की भक्ति का संचार नहीं होता


  भगवान शंकर जी की अतुलनीय महिमा है । भगवान शंकर परम वैष्णव हैं ।शंकरजी जगतगुरु और रामजी के बड़े भक्त हैं । राम जी के भक्तों पर शंकरजी की विशेष कृपा रहती है ।


  शंकर जी के भक्त तो शंकर जी की पूजा, अर्चना करते ही हैं । भगवान राम के भक्त भी शंकर जी की पूजा अर्चना करते हैं ।


  अध्यात्मिक दृष्टि से रामजी और शंकर जी में भेद नहीं है । इसलिए शंकर जी के भक्त को राम भक्त से और रामजी के भक्त को शंकर जी के भक्त से द्रोह नहीं करना चाहिए । इसी तरह भगवान राम के भक्त को शंकर जी की तथा शंकरजी के भक्त को राम जी की पूजा करनी चाहिए ।


  भगवान राम स्वयं कहते हैं कि यदि कोई ऐसा सोचता है कि वह शंकरजी से द्रोह करके मुझ तक पहुँच जाएगा तो ऐसा संभव नहीं है । क्योंकि शिव द्रोही मुझे स्वप्न में भी प्राप्त नहीं कर सकता है-‘शिव द्रोही मम दास कहावा । सो जन सपनेहुँ मोहि न पावा’


  संत, ग्रंथ कहते हैं और यह स्वयं के अनुभव में आया हुआ सत्य है कि बिना शंकर जी की कृपा के जीव के अंदर राम भक्ति का संचार होता ही नहीं है । क्योंकि शंकर जी गुरुओं के भी गुरू परम गुरू, आदि गुरू, जगत गुरू हैं । शंकर जी वेद विदित त्रिभुवन गुरू हैं- ‘तुम त्रिभुवन गुरू वेद बखाना । आन जीव पामर का जाना’



   जीव पर पहले शंकर जी की और बाद में भगवान राम की कृपा होती है । शंकरजी को रामजी, राम जी का नाम, रामजी के गुण, लीला और कथा बहुत प्रिय है । शंकर जी राम जी का नाम जपने से, लेने से बहुत प्रसन्न होते हैं ।


 शंकर जी कहते हैं कि जब किसी के मुँह से ‘र’ से आरंभ होने वाला कोई शब्द निकलता है तो राम नाम के ब्याज से मेरा मन पहले ही प्रसन्न हो जाता है ।


   भगवान शंकर की दयालुता, कृपालुता किसी से भी छिपी नहीं है । हमारी तो शंकर जी से यही पार्थना है-


गिरिजारमन चन्द्रमौलि गंगाधर, तुम सम दयालु कहाँ जग माहीं ।

बिषपान कियो देखत जग संकट, नाथ तव कृपा भव रोग नसाहीं ।।१।।

तव पद सेवत नहि दुर्लभ कछु, भाविउ को प्रभु मेंटि सकाहीं ।

गिरिजा अर्धंग त्रिपुरारि त्रिलोचन, कोउ अस जो तव शरन न चाही ।।२।।

शंकर महादेव जग स्वामी, भक्तन के दुख दूर कराहीं ।

औढरदानि सुदानि बड़ो, देखत दान खुद दान लजाहीं ।।३।।

महाकाल महेश अकाम दिगम्बर, राम नाम रूचि तव मन माहीं ।

तव पद प्रेम किए बिनु कोऊ, राम चरन रति पावत नाहीं ।।४।।

आशुतोष सुखधाम प्रभू, मम अवगुन दोष धरौ चित नाहीं ।

सुत नारि समेत रहौ कृपालु, संतोष विनय करुनामय पाहीं ।।५।।
                          
।। हर हर महादेव ।।

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बुधवार, 1 जनवरी 2020

रामजी छहों भगों से परिपूर्ण (षडैश्वर्य सम्पन्न) स्वयं भगवान हैं-‘रामस्तु भगवान स्वयम्’


सद्ग्रंथो के अनुसार छः भग होते है । और भगवान के अंदर छहों भग पूर्ण रूप से विद्यमान होते हैं । छहों भगों के नाम हैं- ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य । इन्हें ही षडैश्वर्य कहा जाता है 


 भगवान में संपूर्ण ऐश्वर्य, संपूर्ण धर्म, संपूर्ण यश, संपूर्ण श्री, संपूर्ण ज्ञान और संपूर्ण वैराग्य नित्य-निरंतर स्थित रहते हैं ।


भगवान शंकरजी रामजी की स्तुति करते हुए कहते हैं कि हे श्रीराम आप ही षडैश्वर्य सम्पन्न ईश्वर हैं और हम लोग (समस्त देवता) आप परमेश्वर के अनुरक्त भक्त हैं । परमार्थ दृष्टि से तो हम आपके वैभव के एकमात्र निवासस्थान हैं-


  राम त्वमेव भगवान्प्रणता वयं ते ।
  त्वद्वैभवैकनिलयाः परमार्थदृष्टया ।।

                - स्कंदपुराण ।


सद्ग्रंथो के अनुसार राम जी सबका भरण-पोषण करने वाले, सबके आधार, सबको शरण देने में समर्थ, सर्वव्यापक, करुनानिधान, और छहों भगों से परिपूर्ण  स्वयं  भगवान हैं-

 भरणः पोषणाधारः शरण्यः सर्वव्यापकः ।
करुणः खड्गुणैः पूर्णो रामस्तु भगवान स्वयम् ।।

-    महारामायण


 श्रीवाल्मीकि रामायण में देवता भगवान राम की स्तुति करते हुए कहते हैं कि आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयं भगवान हैं-

त्रयाणामपि  लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः ।
रुद्राणामष्टमो  रुद्रः साध्यानामपि पंच्चमः ।।

   - श्रीवाल्मीकि रामायण (युद्धकाण्ड) ।  



इसप्रकार रामजी परिपूर्णतम परमात्मा साक्षात परम व्रह्म है । जिनके अंश मात्र से व्रह्मा, विष्णु और शंकर जी की भी उत्पत्ति हो जाती है । श्रीरामचरितमानस जी में, उपनिषदों में, पुराणों में और रामायण आदि में ऐसा ही वर्णन हैं ।


।। जय श्रीराम ।।

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

व्रह्माजी, विष्णुजी, शंकरजी आदि को भगवान राम के विश्वरूप (विराट स्वरूप) का दर्शन


भगवान राम के विश्वरूप (विराट स्वरूप) का दर्शन माता कौशल्या को, परशुरामजी को और हनुमानजी को हुआ है । इसका वर्णन पिछले लेखों में किया जा चुका है । यहाँ पर व्रह्माजी, विष्णुजी, शंकरजी आदि को भगवान राम के विश्वरूप (विराट स्वरूप) के दर्शन होने का वर्णन किया जा रहा है ।

              
 रामजी के विश्वरूप (विराट स्वरूप) का दर्शन व्रह्माजी, विष्णुजी और शंकरजी को भी हुआ है । इसका विस्तृत वर्णन स्कन्दपुराण में आता है ।


 रावण वध के पश्चात व्रह्माजी, विष्णुजी, और शंकरजी आदि रामजी का दर्शन करने के लिए आए । सभी ने भगवान राम की अद्भुत स्तुति की है । विष्णु भगवान ने भी राम जी की बहुत उत्तम स्तुति किया है । जिसका वर्णन अगले लेख में  ‘भगवान विष्णु द्वारा भगवान राम की स्तुति’ शीर्षक के अंतर्गत किया जाएगा ।


 जब व्रह्माजी, विष्णु जी, शंकरजी और देवतागण लंका पहुँचते हैं । तो राम जी के विश्व व्यापी स्वरूप का दर्शन करते हैं । सबने देखा कि रामजी सारे व्रह्मांड मंडल में व्याप्त हैं ।


माया से जिन-जिनकी वुद्धि पर पर्दा पड़ा हुआ था वे रामजी को नहीं समझ रहे थे-मनुष्य समझ रहे थे । रामजी के विश्व रूप को देखकर उनकी आँखे मुद गईं । और भयभीत हो गए । फिर देवताओं ने स्तुति करना शुरू किया । और त्रिदेवों आदि ने पृथक-पृथक स्तुति किया । और रामजी के अद्भुत स्वरूप का दर्शन किया ।



  ।। जय श्रीसीताराम ।।




रविवार, 15 सितंबर 2019

श्रीराम स्तवराज स्त्रोत पाठ और महिमा


श्रीराम रक्षा स्त्रोत का नाम तो सबने सुना ही होगा । इसकी रचना श्रीविश्वामित्रजी ने किया है । भगवान शंकरजी ने स्वप्न में जैसा उपदेश दिया सुबह जगने पर विश्वामित्र जी ने वैसा ही लिपिबद्ध कर दिया । इस प्रकार श्रीविश्वामित्रजी श्रीराम रक्षा स्त्रोत के ऋषि हैं । प्रणेता हैं । इसीतरह श्रीसनत्कुमार जी श्रीराम स्तवराज स्त्रोत के ऋषि हैं ।


  समस्त ऋषियों-मुनियों के पुरोधा हैं- सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार । ये सनातन धर्म के आदि ऋषि हैं । इनकी उत्पत्ति सृष्टि के आरंभ में ही होती है । इनपर काल चक्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । ये हमेशा बालक ही रहते हैं ।  छोटे-छोटे पाँच वर्ष के बालक जैसे ही रहते हैं- देखत बालक बहु कालीना  । अर्थात केवल देखने में बालक जैसे हैं । इनकी उम्र बहुत है । बहुत ज्ञानवान और तेजवान हैं । भगवान के परम भक्त हैं ।


 इनमें से सनत्कुमार जी ने सनत्कुमार संहिता की रचना किया है । इसमें बड़े अद्भुत श्लोकों में रामजी की महिमा गाई गई है । इसी ग्रंथ में श्रीराम स्तवराज स्त्रोत का वर्णन है ।


 श्रीराम स्तवराज में रामजी की अद्भुत महिमा का वर्णन है । बहुत ही उत्तम श्लोक हैं । बहुत उत्तम स्त्रोत है । प्राचीन काल में एक बार नारदजी ने श्रीराम स्तवराज स्त्रोत का पाठ करके रामजी से वरदान और उनका दर्शन प्राप्त किया था ।


गीता प्रेस से श्रीराम रक्षा स्त्रोत और श्रीराम स्तवराज लगभग दश रूपये में ही दोनों प्राप्त किए जा सकते हैं । और पाठ किया जा सकता है । श्रीराम स्तवराज की अतुलनीय महिमा है ।


।। जय श्रीराम ।।





गुरुवार, 15 अगस्त 2019

श्रीरामार्चा पूजन : मनोवांछित फल देने वाली और व्रह्माजी, विष्णुजी और शंकरजी द्वारा भी की जाने वाली एक पूजा


सनातन हिंदू धर्म से जुड़े हुए लोग अनेक त्योहार, अनेक व्रत, और पूजन आदि के बारे में जानते हैं । लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं जो श्रीरामार्चा पूजन के बारे में सुने हों अथवा जानते हों ।


   श्रीरामचरितमानस जी में आता है कि शंकरजी, विष्णुजी और व्रह्माजी आदि सृष्टि से सम्बंधित कार्य आदि तपस्या के बल पर करते हैं । तपस्या के केंद्र में कोई न कोई देवता होता है । मंत्र होता है । बिधि होती है । लेकिन जब विष्णुजी, व्रह्माजी और शंकरजी तपस्या करते हैं तो केंद्र में कौन देवता होता होगा ? यह एक प्रश्न है ?


  इस प्रश्न का उत्तर श्रीशिव संहिता में है । भगवान शंकर जी स्वयं कहते हैं कि हे पार्वती भगवान विष्णु को पालन की, व्रह्माजी को सृष्टि की और मुझे संहार की शक्ति- योग्यता श्रीरामार्चा से मिलती है । शंकरजी कहते हैं कि सृष्टि के समय भगवान विष्णु व्रह्मा जी को श्रीराम का अर्चन करने का उपदेश देते हैं । आदि ।


 इस प्रकार बड़े-बड़े देवता और ऋषि-मुनि भी श्रीरामार्चा पूजन करते हैं । इसकी एक विधि है । और बड़ी महिमा कही गई है । जिन्हें कोई सहारा देने वाला नहीं है, उन्हें यह सहारा देने वाला-सन्मार्ग दिखाने वाला है । मनोवांछित फल को देने से लेकर रोग, दोष, दुर्भाग्य आदि को दूर करके सुख और सौभाग्य देने वाला अर्चन है । जब देवी-देवता भी इससे बल और योग्यता पाते हैं तो मनुष्य के लिए तो मंगलकारी और लाभकारी तो होगा ही ।


यहाँ तक कहा गया है कि संपूर्ण कामनाओं की सिद्धि करनेवाली, संपूर्ण विघ्नों को नष्ट करनेवाली, मंगलमयी रामार्चा का अनुष्ठान करके मनुष्य सुखी हो जाता है । और रामार्चा से बढ़कर कोई यज्ञ नहीं है । रामार्चा से बढ़कर कोई तप नहीं है । रामार्चा से बढ़कर कोई दान नहीं है । रामार्चा से बढ़कर कोई जप नहीं है । तीनों लोकों में रामार्चा से बढ़कर कोई उत्तम पुण्य नहीं है । 


शंकरजी कहते हैं के हे देवि  रामार्चन के अतिरिक्त संपूर्ण अभीष्टों को पूर्ण करने वाला कोई दूसरा साधन मैं नहीं देख रहा हूँ ।  और न ही मैंने कोई दूसरा साधन सुना ही है । आदि  पूरी महिमा का उल्लेख कर पाना मुश्किल है ।


  चूँकि यह कुछ गोपनीय है । अतः हर कोई इसके बारे में नहीं जानता । किसी सुयोग्य पंडित से संपर्क कर ‘श्रीरामार्चा’ पूजन के बारे में जाना जा सकता है और कराया भी जा सकता है । जितने मनोयोग-श्रद्धा से पूजन किया और कराया जाएगा उसके अनुरूप फल मिलना लाजिमी ही है ।



।। जय श्रीराम ।।





चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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