जयंत देखता कि देवी-देवता चित्रकूट में रामजी के दर्शन के लिए जाया करते हैं । जयंत की पत्नी भी रामजी के दर्शन के लिए आई थी । देवता लोग रामजी से अपनी रक्षा और सहायता के लिए प्रार्थना करते । जयंत सोचता कि राम तो अयोध्या के राजकुमार हैं। फिर इनके दर्शन के लिए क्यों जाना ? इसलिए उसने रामजी के बल-प्रभाव देखने का निश्चय किया । सच ही गया है कि जब किसी पर नाश छा जाता है तो उसकी मति मारी जाती है । जयंत का राम जी का बल-प्रभाव देखने के लिए-पता लगाने के लिए आना किसी चींटी का समुंद्र की थाह लगाने जैसा था ।
उसने काग
का भेष बनाकर सीताजी के पैर में चोंच मारी । रुधिर बहने लगा । जब रामजी जान पाए तो
सींक का धनुष बनाकर सींक का ही वाण छोड़ दिया । और वह मंत्र के प्रभाव से
ब्रह्मास्त्र में बदल गया । जयंत भाग खड़ा हुआ । वाण उसका पीछा करने लगा ।
भागकर
देवराज इंद्र अपने पिता के पास पहुँचा । यह जानकर कि यह रामजी से द्रोह करके आया
है इंद्र कोई सहायता नहीं कर सके । शंकरजी, ब्रह्माजी, विष्णुजी आदि सभी के पास
सभी के लोक में गया । लेकिन यह जानते ही कि यह रामद्रोही है, सहायता की बात तो दूर
किसी ने उसे बैठने तक को नहीं कहा । जल्दी निकलो यहाँ से यह सुनकर वह हताश हो गया ।
जैसे एक बार भगवान का चक्र ऋषि दुर्वासा के पीछे
पड़ गया था और उन्हें कहीं ठौर नहीं मिली थी ठीक वही दशा जयंत की भी हुई । वह बहुत
निराश हो गया और मन में बड़ा भय उत्पन्न हो गया ।
उसे बिकल
देखकर नारदजी को उसपर बड़ी दया आई । उन्होंने उसे समझाया कि जयंत कब तक और कहाँ तक
भागोगे । ब्रह्माण्ड में कोई शक्ति नहीं है जो रामद्रोही की रक्षा अथवा सहायता कर
सके । रामजी बड़े दयालु हैं, शरणागतवत्सल हैं । तुम बिना देर किए रामजी की शरन में
चले जाओ तो तुम्हारी प्राण रक्षा हो जायेगी ।
जयंत वापस चित्रकूट आ गया । और बोला कि हे रघुनाथ
जी मैंने आपका प्रभाव देख लिया, भली-भाँति जान लिए । और मुझे मेरे कर्मो का फल मिल
गया है । हे प्रभु अब मैं आपकी शरण में आया हूँ मेरी रक्षा करो ।
उसकी
दुख भरी वाणी को सुनकर रामजी ने उसके प्राण की रक्षा कर लिया । उसका वध नहीं किया ।
लेकिन रामजी का वाण अमोघ होता है इसलिए उसकी एक आँख को वाण का लक्ष्य बना दिया
जिससे वह एक नयन हो गया ।
कीन्ह मोह बस द्रोह
जद्यपि तेहि कर वध उचित ।
प्रभु छाडेउ करि छोह कोउ
कृपालु रघवीर सम ।।
।। जय श्रीराम ।।