संसार और जीवन सनातन सिद्धांत के अनुसार चलते हैं । कोई माने या ना माने, जाने या न जाने यह दूसरी बात है । सनातन का कर्म का सिद्धांत सब पर लागू होता है- ‘जो जस करै सो तस फल चाखा’ । पूर्व कर्म के अनुसार जीव को घर-परिवार, माता-पिता आदि सम्बंधी और सुख-दुख जन्म लेते ही मिलते हैं । प्रत्येक जीव सुख चाहता है । दुखी होना कोई नहीं चाहता । क्योंकि प्रत्येक जीव आनंद सिंधु-सुख राशि से ही निकला है-
जो आनंदसिंधु सुखरासी ।
सीकर ते तिहुँलोक सुपासी ।।
सो सुखधाम राम अस नामा ।
अखिल लोक दायक विश्रामा ।।
प्रत्येक मनुष्य सुख के लिए प्रयत्न करता है । दुख के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता । क्योंकि वह सुखी होना चाहता है और दुख से दूर होना चाहता है । लेकिन उसे दुख मिलता ही रहता है । क्योंकि सुख-दुख कर्म के अनुसार मिलते हैं ।अगर वर्तमान का कर्म ठीक है तो भी पूर्व का कर्म दुख देता ही रहता है ।
जन्म और मृत्यु का सिद्धांत सब पर लागू होता है । हर प्राणी जो जन्मता है मरता है और जो मरता है जन्मता है जब तक मुक्त नहीं हो जाता । पृथ्वी के प्रत्येक मनुष्य का शरीर साढ़े तीन हाथ का ही होता है और साढ़े तीन हाथ में चौरासी अंगुल होता है । प्रत्येक जीव चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है इसलिए उसे चौरासी अंगुल लम्बाई का मनुष्य शरीर मिलता है-‘आकरि चारि लाख चौरासी । योनि भ्रमत यह जिव अविनासी’ ।
संसार चलता रहे इसलिए जन्म और मृत्यु दोनों जरूरी
है । मृत्यु का कोई बानक उत्पन्न हो जाता है । जैसे कोई साँप के काटने से मरता है,
कोई दुर्घटना से मरता है और कोई किसी रोग के कारण मरता है । आदि । भगवान अपने ऊपर
नहीं लेते ।
सूर्य ग्रहण सदैव सनातन तिथि के अनुसार अमावस्या
तिथि को ही लगता है । यह अटल सिद्धांत है । लेकिन किसी विशेष डेट (तारीख) को सदैव
लगेगा ऐसा नहीं है । क्योंकि प्रकृति भी सनातन सिद्धांत के अनुसार ही चलती है ।
इसी
प्रकार चंद्र ग्रहण सदैव पूर्णिमा तिथि को ही लगता है । यह भी सनातन का अटल
सिद्धांत है । लेकिन किसी विशेष डेट (तारीख) को सदैव लगेगा ऐसा नहीं है ।
इस तरह हम देख सकते हैं, समझ सकते हैं और अनुभव कर
सकते हैं कि संसार और जीवन सनातन सिद्धांत के अनुसार चलते हैं ।
जब जीव
मनुष्य योनि में गर्भ में आता है तो उसे पूर्व जन्म और कर्म का स्मरण हो जाता है ।
और वह भगवान से प्रार्थना करता है कि मुझे अब गर्भवास के दुख से मुक्त कीजिए अब
मैं चौरासी से छूटने के लिए भजन करूँगा- ‘अब जग जाइ भजौं चक्रपानी’ । जीव
के इस संकल्प के साथ ही उसके शरीर पर शंख और चक्र सनातन के दो प्रमुख प्रतीक चिंह आ
जाते हैं ।
हाँथ की
अँगुलियों और अगूँठे के अग्र भाग पर ध्यान से देखने पर शंख और चक्र के निशान दिखते
हैं । किसी मनुष्य में शंख और चक्र दोनों के और किसी-किसी में केवल शंख अथवा केवल
चक्र के निशान होते हैं ।
पुराने लोग एक कहावत भी कहते थे कि- दशो चक्र राजा दशो शंख जोगी । और प्रातःकाल जगते ही हथेली दर्शन का एक रहस्य यह भी कि शंख-चक्र के चिंह को देखकर मनुष्य को अपने संकल्प ‘अब जग जाइ भजौं चक्रपानी’ की जो विस्मृत हो गई है स्मृत हो जाए ।
।। जय श्रीराम ।।