सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

जाको आस राम सो बाटै

 

जाको आस राम सो बाटै

स्वान सरिस सो जग लोगन को पद पातर नहिं चाटै ।।

विरद और सदग्रंथ बतावत कबहुँ नहीं जन घाटै ।

दास मनोरथ तरुवर जोगवत कौन कहाँ अस काटै ।।

राम भरोस साच जग जाको दुर्घट दुख तम फाटै ।

दीनदयाल रघुनाथ कृपा हो जन दुख खाईं पाटै ।।

फिर क्यों मन बिलखाय जहाँ-तँह औरन ओर न हाटै ।

दीन संतोष राम को किंकर मन सिखवै अरु डाटै ।।


।। जय श्रीराम ।।  

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

श्रीविष्णु भगवान के प्रति कही हुई श्रीराम गीता



भगवान विष्णु ने राम जी के विश्वरूप का दर्शन किया । जिसमें उन्होंने अनेक अद्भुत विभूतियाँ देखीं । भगवान विष्णु ने राम जी से कहा कि प्रभो मैं आपके विभूतियों का अंत नहीं पा रहा हूँ । पहले कभी न देखे हुए स्वरूपों का भी आपके विश्वरूप में दर्शन हो रहा है । महेशान आप कौन हैं ? आपका यह विश्वरूप बड़ा अद्भुत है । आपको केवल आप ही जान सकते हैं । क्योंकि आपको जानने में कोई अन्य समर्थ नहीं है । पृथ्वी में स्थिति परमाणुओं का अंत तो मिल सकता है लेकिन अखंडस्वरूप आप में स्थित व्रह्मांडो का अंत नहीं है । *** *** *** ।


  भगवान विष्णु के द्वारा स्तुति किए जाने पर और उनके प्रश्न आदि को  सुनकर प्रसन्नवदन रामजी हँसते हुए बोले-


अहमात्मा परो नित्यः सन्मात्रो विभुरीश्वरः ।
सदसद्भावरहितो  भेदाभेदविवर्जितः ।। *** *** *** ।


भगवान श्रीराम ने कहा- मैं परमात्मा, अविनाशी सत्स्वरूप, सर्वव्यापक, परमेश्वर, सत-असतभाव से रहित , भेदाभेदशून्य, एक, अद्वितीय, अविकारी, निराकार और मायारहित हूँ । यह विश्व मेरी शक्तियों का ही विलास है, जो भिन्न-अभिन्न रूप से स्थित है । जिसमें तुम तथा अन्य बहुत से तत्वाधीश्वर देवता मेरे अंशांश के सहारे आकाश में जुगुनुओं की भाँति स्थित हैं ।


मैं ही आदि, आनंद स्वरूप, निरालम्ब, स्वराट, व्यापक, सर्वरूप, सर्वव्यापी, शांत, शुद्ध, चैतैन्यविग्रह और आकाश का भी आकाश हूँ । मैं ही दिशाओं की सनातनी दिशा हूँ । काल का भी महाकाल, ज्योतियोंकी उत्तम ज्योति, कारणों का कारण और इन्द्रियों का शासक मन –इंद्रिय मैं हूँ ।


मैं ही अणुओं में परमाणु, महनीयों में महत्तर, विभुओं में श्रेष्ठ विभु, तत्वों का उत्तम तत्व और निबृत्तमार्गियों का सनातन योग हूँ । मैं प्राणधारियों का प्राण हूँ । तपस्वियों का इंद्रिय-संयम हूँ । मुमुक्षुओं की शांति हूँ । और वाणियों में ओमकार हूँ । *** *** *** ।


जनार्दन ! इस प्रकार लोक में जितनी परमोत्कृष्ट वस्तुएँ हैं , वे सब मैं ही हूँ । विष्णो ! जिसका तेज अव्यक्त है, ऐसे मेरे द्वारा यह सारा विश्व व्याप्त है ।
*** *** *** 

लक्ष्मीपते ! जब मेरी रमण करने की इच्छा हुई, तब मुझ निराकार से आकाश की कारणभूता ध्वनि प्रकट हुई । फिर सारा वाक्-प्रपंच मेरी इच्छा से ही उत्पन्न हुआ । तत्पश्चात उपसंहार का उद्भव हुआ ।


 जिसके विलीन हो जाने पर साक्षात अद्वीतीय स्वयं अकेला मैं ही स्फुरण करता हूँ । *** *** *** । मुरारे ! जैसे आकाश में अविनाशी तारे चमकते हैं, उसी प्रकार मेरी शक्तियाँ मेरे ही अंतराल में स्फुरण करती हैं । जिनसे तुम जिनमें प्रधान हो, ऐसे सारे देवगण प्रकट होते हैं । *** *** *** ।


तुम लोग मेरी भावनासे भावित तथा मुझमें ही मन लगाने वाले होओगे । अब अपने-अपने कर्मों का सम्पादन करते हुए निर्भय होकर रमण करो ।




 । जय श्रीराम 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

कलियुग में सब कुछ दूषित हो जाता है फिर भी क्या दूषित नहीं होता ?


कलियुग और दोष में बहुत गहरा सम्बंध है । इसलिए कलियुग में सब कुछ दूषित हो जाता है । प्रदूषित हो जाता है ।


  मन, चित्त, और वुद्धि दूषित हो जाती है । आचार और विचार दूषित हो जाता है । लगभग हर कार्य दूषित हो जाता है । हर क्षेत्र दूषित हो जाता है । वातावरण से लेकर नदी, जल, घर-गाँव, शहर आदि सब कुछ दूषित हो जाता है ।


  दोष रहित विशुद्द चीज का मिलना असम्भव नहीं तो दुर्लभ जरूर हो जाता है । अशुद्धता का बोलबाला हो जाता है । कहीं कुछ नहीं बचता ।


  भोजन और भजन आदि भी दूषित हो जाते हैं । शुद्ध भोजन, शुद्ध सामग्री का अभाव हो जाता है । जब मन, वुद्धि, विचार आदि दूषित हो जाते हैं तो इनका प्रभाव हर जगह और हर चीज पर पड़ना लाजिमी ही है ।


इसलिए किसी भी चीज का सही फल नहीं मिल पाता । यज्ञ, तप, आदि कर्म का भी अभीष्ट फल नहीं मिलता । छल-कपट श्रेष्ठ और सत्य-सदाचार भार स्वरूप हो जाते हैं ।


इस प्रकार कलियुग बड़ी विषमताओं का युग है । दोष युग है । दूषित कर देने वाला युग है । फिर भी जो रघुनाथ जी के शरणागत हैं वे अवश्यमेव कल्याण के भागी बनते हैं । क्योंकि कलियुग में भी रघुनाथ जी का विरद दूषित नहीं होता । उनका स्वभाव दूषित नहीं होता । उनकी करुणा में कोई दोष नहीं आता । उनका नाम दूषित नहीं होता । बस विश्वास करके रघुनाथ जी के चरण की शरण में जाने की देरी है- "विश्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू"  



।। जय श्रीसीताराम ।।



बुधवार, 26 सितंबर 2018

मन और तन का वैराग्य: कौन सा वैराग्य श्रेष्ठ होता है ?


वैराग्य अध्यात्मिक जीवन की एक अवस्था है । उच्च अवस्था है । इस अवस्था को प्राप्त कर पाना आसान नहीं है । हर कोई इस अवस्था को नहीं प्राप्त कर सकता है ।


 कई लोग बल पूर्वक वैराग्य को धारण करना चाहते हैं । हठात वैरागी बनने से प्रायः शरीर से वैरागी बना जा सकता है । लेकिन तन से वैरागी बनना श्रेष्ठ नहीं है । क्योंकि यह ज्यादा दिन तक ठहरता नहीं है । स्थाई नहीं होता है ।


  आजकल ऐसा सुनने में आता रहता है कि अमुक व्यक्ति जो वैरागी अथवा संत वेष में थे जेल भेज दिए गए हैं । इसका कारण मुख्य रूप से यही होता है कि ऐसे लोग हठात वैरागी बने होते हैं । तन से तो वैरागी बन गए लेकिन मन से वैरागी नहीं बन पाए । और एक दिन विषयों के शिकार हो गए ।


इसलिए मन से वैरागी होना ज्यादा श्रेष्ठ होता है । जो मन से वैरागी होगा वह अपने आप तन से भी वैरागी बन जायेगा । मन से वैरागी होना शुद्ध वैराग्य है । जो मन से वैरागी नहीं होगा वह कब और कहाँ और कैसे गिर जाय कहा नहीं जा सकता ।



 जो केवल तन से वैरागी होता है उसका मन विषयों की ओर आकर्षित होता रहता है । वह हठात अपने को विषयों से दूर रखने का प्रयास भले करता रहे तो भी मन के वैरागी न होने से विषयों के जाल में फँस ही जाता है ।


इस प्रकार वह अपने स्वयं को तथा साथ ही अन्य लोगों को धोखा देता हुआ जीता है । यह एक प्रकार का अपने और दूसरे से किया हुआ छल ही होता है । इसलिए हठात वैरागी न बनकर मन से वैरागी होना ही श्रेष्ठ है ।



।। जय श्रीसीताराम ।।



सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

श्रीरामचरितमानस जी से जीवन में सुख शांति आ जाती है-एक उदाहरण

आजकल लोंगो के मन में हाहाकार है । मन में अशांति है  । घर में अशांति है । जीवन में अशांति है । ऐसे में क्या करें ? समस्या बड़ी है ।  बढ़ी है और बढ़ती जा रही है ।


 समाधान क्या है ? समाधान कई हो सकते हैं । लेकिन सहज समाधान श्रीरामचरितमानस जी से प्राप्त किया जा सकता है । कई लोंगो ने प्राप्त किया है और कई लोग प्राप्त कर रहे हैं । यहाँ हम एक उदाहरण दे रहे हैं ।


मैं किराये के मकान में अपने छोटे-मझले भाई के साथ रह रहा था । वहाँ एक और किरायेदार रहते थे । कुछ दिन बाद वे वहाँ से दूर चले गए । और मैंने भी कमरा बदल दिया लेकिन  पास के मकान में ही शिफ्ट हो गये थे । विद्यार्थी जीवन था ।


एक दिन दूसरे किरायेदार पूछते हुए मुझसे मिलने आए । कभी ज्यादा बातचीत भी नहीं हुई थी । वे बहुत दुखी थे । घर में अशांति थी । मारपीट, गालियाँ, भोजन न बनना, दिन के दिन भूंखे रह जाना होता था । कारण बच्चों से समस्या थी । एक बहुत ही उदंड हो गया था । उससे माता-पिता बिल्कुल परेशान हो गए थे । कहीं कोई आत्महत्या न कर ले इतनी समस्या थी ।


मैंने एक दिन उनके बच्चों को बुलाकर समझाया । समझाने का आधार श्रीरामचरितमानस जी को ही बनाया था । उनको श्रीरामचरितमानस पढ़ने के लिए कहा । रोज अगर नहीं पढ़ सकते तो रविवार को रोज पढ़ना है । उनके घर में श्रीरामचरितमानस जी उपलब्ध नहीं थे । उन्होंने मँगवाया । और भगवान की कृपा से जो मैंने कहा था उस पर अमल करना शुरू कर दिए । इनके घर में मांस भी भोजन के रूप में लिया जाता था । मैंने छोड़ने के लिए इनसे कहा ।


कुछ दिन बाद वे मेरे भाई को मिले और बोले कि अब घर में सब ठीक चल रहा है । वे बोले हम एक जगह भोजन के लिए गए थे तो वहाँ हमने मांस खाने से मना कर दिया । लोग पूछने लगे क्या हुआ ? तब ये बोले कि अब हमारे घर में श्रीरामचरितमानस जी आ गए हैं और इसलिए हम लोंगो ने मांस खाना छोड़ दिया है ।


एक बार इनकी मुलाकात मुझसे भी हुई थी । इन्होंने बताया था कि अब हमारा घर और जीवन दोंनो बदल गया है । इस घटना में मैं तो एक निमित्त मात्र बना था, राम जी किसी बहाने से, माध्यम से ही कृपा करते हैं । श्रीरामचरितमानस जी पर मेरे कहने से इन्हें श्रद्धा और विश्वास हुआ जिसका  लाभ इनके परिवार को हुआ  



।। जय श्रीसीताराम ।।



रविवार, 23 जुलाई 2017

क्या भविष्य में विज्ञान मृत व्यक्ति को जीवित कर सकेगा ?

इस मृत लोक में कोई भी व्यक्ति अथवा जीवधारी सदा के लिए नहीं रह सकता  । अर्थात कोई व्यक्ति अमर नहीं हो सकता । यह सिद्धांत है । फिर भी क्या विज्ञान से भविष्य में मृत व्यक्ति को जीवित कर देने जैसी कुछ घटनाएँ हो सकती हैं ?  ऐसी सम्भावना से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता ।



प्राचीन काल में ऐसी विद्याएँ विद्यमान थी । अतः यदि भविष्य में विज्ञान के माध्यम से ऐसा कुछ होता है या सुनाई पड़ता है तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिये । ऐसी घटनाओं से वे लोग जो अध्यात्म के तात्विक ज्ञान से दूर हैं भर्मित हो जाते हैं और दूसरों को भी भर्मित करने लग जाते हैं ।



  लेकिन साधक को बिना बिचलित हुए अपनी साधना में रत रहना चाहिए । विज्ञान के चकाचौध से चकित नहीं होना चाहिए ।



श्रीसीताराम जी के सेवा में लेखक द्वारा प्रस्तुत ‘विनयावली’ से लिए गए निम्नलिखित दो पद इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भविष्य में यदि ऐसा सुनाई पड़ता है तो भी किसी को बिचलित होने की जरूरत नहीं है । और ऐसी संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है -



                 (५६)

मन मेरे मत बने अजान । नहि अचरज कुछ भी तू मान ।।१।।
जो भी करता है विज्ञान । प्रकृति निहित यह नूतन ज्ञान ।।२।।
जग में छुपे रहस्य अबूझ । मानव खोजे जितनी सूझ ।।३।।
पहले भी होता था प्रयोग । शाला शरीर बहु जप तप योग ।।४।।
उद्देश्य था केवल आत्म विकास । भोग से रहते दूर उदास ।।५।।
जड़ पदार्थ के सारे गुन । तब भी थे ऐसी नहीं थी धुन ।।६।।
सब कुछ ईश्वरमय कृत मान । सब रहते करते प्रभु का ध्यान ।।७।।
आधुनिक भौतिकी के निष्कर्ष । बिना योग जीवों का उत्कर्ष ।।८।।
सद्ग्रंथो में कुछ संकेत । मिलता देखे जो कर चेत ।।९।।
कुछ है भाषा का बदलाव । सत्य एक नहि तहाँ घुमाव ।।१०।।
दोंनो का करिए ऊँचा ज्ञान । तब हो सकती है पहिचान ।।११।।


            (५७)

मृत जीवित कर दे विज्ञान । इसमें भी नहि अचरज जान ।।१।।
बढ़ जाए मानव अधिकार । मन माखे न करय बिचार ।।२।।
पहले भी यह हुआ सुजान । मत भर्मित हो प्रभु को मान ।।३।।
कलयुग अर्थ और भी जान । कल-मशीन युग भी पहिचान ।।४।।
होता जाए बहुत विकास । उसमें भी तो छुपा विनाश ।।५।।
वैभव जब मिलता बढ़य गुमान । मति हर लेता है अभिमान ।।६।।
तब जन होके बस प्रमाद । नाना भांति करय दुर्वाद ।।७।।
मिट जाए सब धर्म बिचार । बढ़ जाए बहु अत्याचार ।।८।।
आ जाए तब वो भी काल । पशु मानव की एक हो चाल ।।९।।
पशु ते बदतर बनय समाज । सुनय न कोई एक अवाज ।।१०।।
तब होता सारा समाधान । कलि का अंत तभी तो जान ।।११।।
कहाँ लगि कहै संतोष बखान । राम प्रभू कीजै कल्यान ।।१२।।





।। जय सियाराम ।।



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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

पवनतनय के चरित सुहाए-८ (हनुमानजी का सीताजी को अपना परिचय कराना)

सीता जी ने मुँदरी की चमक को देखकर सोचा कि मानो अशोक वृक्ष ने अंगार दे दिया है । और यह सोचकर हर्षित होकर उसे हाथ में ले लिया ।  हाथ में लेते ही उन्होंने देखा कि यह तो परम सुंदर मन को हर लेने वाली मुद्रिका है जिस पर राम नाम अंकित हैं ।

  वे चकित होकर उसे देख रही थीं । पहचानने पर उन्हें हर्ष हुआ और फिर विषाद भी हुआ जिससे उनका ह्रदय अकुला उठा । उन्हें हर्ष इस बात का हुआ कि यह तो राम जी के पास से आई है और राम जी की निशानी है । विषाद इस बात का हुआ कि यह तो राम जी के पास थी  यहाँ कैसे आ गई ? सब कुछ ठीक तो है ।

वे मन में सोचने लगीं कि राम जी तो अजेय हैं । उन्हें कोई देवता, दानव, नाग, गंधर्व, राक्षस आदि कोई भी तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में कोई भी नहीं जीत सकता । वहीं दूसरी ओर इसे माया से बनाया भी नहीं जा सकता । फिर यह यहाँ कैसे आ गई ? सीता जी इसी तरह अनेकों विचार कर रही थीं । तब हनुमान जी मधुर वाणी में राम जी के गुणगणों को गाने लगे । जिसे सुनते ही सीता जी के सारे दुख दूर हो गए । यह राम जी की कथा और गुणों का प्रताप है ।

सीता जी मन लगाकर सुनने लगीं और हनुमान जी ने आरंभ से सारी कथा सुना दिया । कथा शुरू से आरंभ करके पूरी ही सुनानी चाहिए । और मन लगाकर कथा सुनने पर दुख तो दूर होते ही हैं ।

फिर सीता जी ने कहा  कि भाई जिसने कानों को अमृत तुल्य कथा सुनाई है वे प्रगट क्यों नहीं होते । राम कथा अमृत तुल्य ही है जो जीवन में नवीनता लाती है । आशा देकर निराशा का अंत करती है । बशर्ते कथा को मन लगाकर किसी रामभक्त वक्ता से सुना जाय ।

यह सुनकर हनुमानजी सीताजी के थोड़ा पास गए । हनुमानजी को देखकर सीताजी को संदेह हुआ । आश्चर्य हुआ । इसलिए वे हनुमान जी के तरफ पीठ करके बैठ गईं । लंका माया नगरी थी । यहाँ के राक्षस तरह-तरह की मायावी विद्याएँ जानते थे । और  राक्षस तरह-तरह के रूप भी धरना जानते थे । इसलिए सीता जी को संदेह हुआ कि कहीं यह धोखा तो नहीं है ।

तब हनुमान जी महाराज बोले कि हे माता जानकी मैं भगवान राम का दूत हूँ । मैं   करुणानिधान की सच्ची शपथ करके कह रहा हूँ ।  भगवान राम के अनेकों नाम हैं । वे बहुनाम हैं । उनका एक नाम करुणानिधान भी है । यह नाम सीता जी को बहुत प्रिय है । विवाह के पूर्व ही पार्बतीजी ने सबसे पहले रामजी के इस नाम से सीताजी को परिचित कराया था । इसलिए सीताजी रामजी को करुणानिधान ही कहती हैं ।

  सीताजी को विश्वास हो जाय कि हनुमानजी को रामजी ने ही भेजा है इसलिए हनुमानजी ने करुणानिधान नाम का ही प्रयोग किया । हनुमानजी महाराज बोले कि हे माता यह मुद्रिका मैंने ही लाई है । राम जी ने आपको अपनी निशानी यह मुद्रिका दिया है ।

 सीता जी ने हनुमानजी से कहा कि नर और वानर का संग कैसे हुआ । किस प्रकार हुआ । आप यह बताएँ । तब हनुमान जी ने रामजी की और सुग्रीवजी की मित्रता की सारी कथा सीताजी को कह सुनाई ।


हनुमानजी के प्रेमपूर्वक कहे हुए बचनों को सुनकर सीताजी को हनुमानजी पर विश्वास हो गया । सीताजी ने जान लिया कि मन, वचन और कर्म से हनुमानजी कृपा से सागर रामजी के सेवक हैं ।

                                                            (शेष भाग-९ में ।)


।। जय श्रीसीताराम ।।



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शुक्रवार, 3 मार्च 2017

पवनतनय के चरित सुहाए-३ (सिहिंका का वध करके समुंद्र लाँघना )

हनुमान जी महाराज सुरसा जी (जो सापों की माता थीं ) से वरदान पाकर आगे चले । सिंहिका नाम की एक राक्षसी थी जिसने समुंद्र के जल में ही अपना निवास बना रखा था । वह माया से आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को पकड़ लेती थी । जो भी जीव अथवा जंतु आकाश मार्ग से समुंद्र के ऊपर से उड़ते थे उनकी छाया (प्रतिबिम्ब) जल में पड़ती थी जिसे देखकर वह छाया को ही पकड़ लिया करती थी । वह जिसकी भी छाया पकड़ती थी उसकी गति आकाश में रुक जाती थी । और इस प्रकार सदा आकाश मार्ग से चलने वाले जीवों को वह खा जाया करती थी ।


इस राक्षसी ने ऐसा ही छल हनुमान जी के साथ भी किया । हनुमान जी उसका कपट तुरंत पहचान गए । अर्थात हनुमान जी को पता चल गया कि राक्षसी ने मेरी गति को रोक दिया है और मुझे खा जाना चाहती है । इसलिए पवन के पुत्र वीर और मतिधीर हनुमान जी ने उसे मार कर समुंद्र के उस पार पहुँच गए ।


समुंद्र के उस पार वन था । हनुमान जी ने उसकी सुंदरता को देखा । वहाँ मधु के लोभ में भौरें गुंजायमान थे । तरह- तरह के पेड़, फल और फूल सुंदर लग रहे थे । पक्षियों और मृगों (पशुओं) के समूह हनुमान जी के मन को अच्छे लगे । हनुमान जी ने सामने एक बड़ा पर्वत देखा और उस पर बिना किसी डर के दौड़ते हुए चढ़ गए ।


शंकर जी श्रीरामचरितमानस जी की कथा सुनाते हुए पार्वती जी से कहने लगे कि हे उमा यह हनुमान जी की उपलब्धि नहीं है । यह तो राम जी के प्रताप की महिमा है जो काल को भी अपना ग्रास बना लेता है । अर्थात हनुमान जी ने जो भी किया वह सब राम जी के प्रताप से ही हुआ है । क्योंकि इतना साहसी, दुर्गम और बल तथा बुद्धिमतापूर्ण कृत कार्य करना वानर के लिए सहज नहीं है । यह तो राम जी के कृपा से ही संभव है ।


हनुमान जी ने उस पर्वत पर चढ़कर लंका को देखा । निरीक्षण किया । लंका ऐसा अद्भुत दुर्ग था जिसका वर्णन नहीं हो सकता । दुर्ग बहुत ही ऊँचा था तथा इसके चारो ओर समुंद्र का जल था । सोने के कोट थे जिनका अद्भुत प्रकाश था । कोट पर  मणियाँ जड़ी थी जिनकी बहुत अधिक सुंदरता थी ।


 लंका दुर्गम नगरी थी ।  एक तो समुंद्र के बीच में थी ।  फिर दुर्ग के बाहर बड़ी ऊँची दीवार  और फिर उसके बाहर गहरी-गहरी खाईं थी ।  कहते हैं भोगावती नगरी है जिसमें सापों का वास है और अमरावती में देवताओं का वास है और ये नगरियाँ बहुत ही सुंदर हैं ।  लेकिन लंका इनसे भी कहीं अधिक सुंदर व श्रेष्ठ थी ।  इसमें वन, उपवन, वाटिका और बगीचे थे । सुंदर घर, एक दूसरे को काटती सड़के, गलियाँ व बाजार था, नगर का निर्माण विविधि तरीके से हुआ था ।  पानी के समुचित साधन जैसे कूप, तालाब और बावड़ी आदि थे ।  नगरी में सुरक्षा बहुत थी । बड़े-बड़े राक्षसों से रक्षित थी ।


अनेकों हाथी, घोड़े और खच्चर थे । पैदल और रथी सेना का समूह था । अनेकों रूप में बलवान सेना की टुकडियाँ थीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता । कहीं बड़े-बड़े मल्ल गर्जना कर रहे थे और योद्धा अखाड़ों में लड़ रहे थे तो कहीं राक्षस गाय, भैंस, गधों, बकरियों आदि का भक्षण कर रहे थे । नाना तरीके से बिकट शरीर वाले योद्धा चारों दिशाओं से नगरी की रक्षा कर रहे थे ।



 हनुमान जी ने देखा कि लंका नगरी में अनेकों रक्षक हैं जो चारों दिशाओं से नगरी की रक्षा कर रहे हैं ।  इसलिए हनुमान जी ने मन में बिचार किया कि छोटा सा रूप बनाकर रात में नगरी में प्रवेश कर जाऊँ । इस प्रकार पर्वत से ही लंका को भली भांति देखकर, बिचार करके हनुमान जी ने बहुत ही सूक्ष्म आकार बनाकर और राम जी का सुमिरण करके लंका की ओर (लंका में प्रवेश करने के लिए) चल दिए ।
                            

  (शेष भाग-४ में ।)



।। जय सियाराम ।।



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बुधवार, 16 मार्च 2016

मंदिर में देव दर्शन: कुछ जरूरी बातें

मंदिर में देव दर्शन के लिए जाने और दर्शन करने का बहुत महत्व है । और तीर्थ स्थल पर जाकर देव दर्शन का विशेष महत्व है । घर में तो पूजा-पाठ करना ही चाहिए । इसके साथ  मंदिर में भी जाकर देव दर्शन करते रहना चाहिए । साथ ही तीर्थ स्थान में जाकर भी देव दर्शन करना चाहिए । मंदिर में देव दर्शन के समय कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए ।
   संत कहते हैं कि दर्शन के लिए जाएँ तो कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए । कुछ न हो अथवा कुछ न ले जा सकें तो कम से कम एक पुष्प ही लेकर जाना चाहिए ।
   दूसरी बात मंदिर में हमेशा अच्छे मन    भाव से जाना चाहिए । जहाँ तक हो सके साफ सफाई से जाना चाहिए । स्वच्छता का बहुत महत्व है ।
    मंदिर से कभी-कभी जूते अथवा चप्पल गायब हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में कभी भी किसी दूसरे का जूता अथवा चप्पल पहन कर नहीं चले आना चाहिए ।
 मंदिर की स्वच्छता बनाये रखनी चाहिए । गंदिगी नहीं फैलानी चाहिए । मंदिर में दर्शन करते समय क्रोध करने से बचना चाहिए । स्वयं दर्शन करें और दूसरों को भी मौका देना चाहिए । लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए ।
 भगवान से बड़ा कोई वीआईपी नहीं है । इसलिए मंदिर में वीआईपी बनकर नहीं जाना चाहिए । बिना वीआईपी बने भाव पूर्वक दर्शन करने से ज्यादा लाभ होगा । 
   भगवान से अपनी भलाई के लिए तो प्रार्थना कर सकते हैं लेकिन भगवान से कभी भी किसी दूसरे का बुरा करने के लिए प्रार्थना नहीं करनी चाहिए ।
कई बार लोग देव प्रतिमाओं के मुहँ में लड्डू अथवा अन्य मिठाई भर देते हैं । भगवान भाव के भूंखे हैं । भाव से यदि हम दूर से कुछ अर्पित करते हैं तो भी भगवान स्वीकार कर लेते हैं । इसलिए मुँह में  नहीं भरना चाहिए ।
    मंदिर की गरिमा, सात्विकता और पवित्रता बनाए रखना चाहिए । वहाँ के अध्यात्मिक वातावरण को अपने क्रिया-कलापों से दूषित नहीं करना चाहिए ।
    अध्यात्म जगत में प्रेम और भाव बहुत महत्वपूर्ण अंग हैं । बिना भाव और अनुराग के किए गए किसी भी काम का कोई महत्व नहीं है ।  भाव और अनुराग से भगवान की  कृपा अवश्य मिल जाती है ।

।। जय श्रीराम ।।




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मंगलवार, 1 सितंबर 2015

राम कथा महात्म्य

श्रीराम कथा की महिमा अनंत है, अपार है । वेद-पुराण, रामायण , श्रीरामचरितमानस, संत व भक्त  सभी राम कथा की महिमा मुक्त कंठ से गाते हैं । लेकिन कोई न ही कथा का पार पा सकता है और न ही पाता है ।


  संसार के लोग संसारिक कार्यों के कारण भूले रहते हैं और दुख में जीते हैं और दुख में ही मर जाते हैं । सच्चा सुख नहीं मिल पाता । सच्चा सुख राम जी से, राम नाम से राम जी की कथा से जुड़ने से ही मिलता है । राम कथा से हर किसी का कल्याण होता है-



राम कथा सुर नर मुनि गाते हैं । अमित अपार कोई पार नहीं पाते हैं ।।

भाँति अनेक सब कहते सुनाते हैं । मति अनुरूप गाइ-गाइ सुख पाते हैं ।।

राम कथा गंगा में जो भी नहाते हैं । पापी, तापी, शापी सभी भव तर जाते हैं ।।

राम कथा में जो मन को लगाते हैं । भाल कुअंक सुअंक बन जाते हैं ।।

पाप, ताप, शाप कथा सुने मिट जाते हैं । प्रगट प्रभाव भूले लखि नहीं पाते हैं ।।

सुनि गुनि कथा जो मन में बसाते हैं । राम धाम सुजन ये सहज सुहाते हैं ।।

राम कथा रस पिए रसिक बताते हैं । पीते ही जाते सदा कभी न अघाते हैं ।।

राम कथा में जो मन को रमाते हैं । संतोष-भाई उसे अपना बनाते हैं ।।





।।  जय श्रीसीताराम ।।



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शुक्रवार, 1 मई 2015

श्रीराम नाम की आरती






श्रीराम नाम की आरती







आरती कीजे श्रीराम नाम की ।
ज्ञान विज्ञान विराग धाम की ।।



सुमिरत सुलभ सकल दुख हारे  ।
दारुण दोष अविद्या जारे ।।
त्रिविधि ताप भय रोग निवारे  ।
अविरल अमल भगति दायक की ।।



संकट दुर्घट सोच मिटाए ।
रज गिरि गरल सुधा हो जाए ।।
भाल कुअंक सुअंक बनाए ।
सहस नाम अतुलित महिमा की ।।




सब सुख खानि सकल सिधि दायक ।
जगत बीज जन दीन सहायक ।।
सकल नाम श्रेष्ठ सब लायक  ।
वेद तत्व चर-अचर तेज की ।।



संसृति सूल समूल मिटाए ।
पतितपावन अघ ओघ नसाए ।।
प्रगट प्रभाव लोक तिहुँ गाए ।
चार पदारथ करतल कर की ।।



मंगलमूल अमंगल हारी ।
काम, कोह मोहादि मद आरी ।।
स्वामि सखा गुर पितु-महतारी ।
पूरणकाम सुजन हितकर की ।।



रामनाम चहुँ युग फलकारी ।
कलि बिशेष महिमा विस्तारी ।।
महामंत्र सब साधन भारी ।
राम समान सरल सुंदर की ।।





।। जय श्रीराम ।।


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चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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