सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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रविवार, 6 अप्रैल 2025

राम जनमि जग कीन्ह उजागर । रूप शील सुख सब गुन सागर

 

भगवान श्रीराम ने जन्म-अवतार लेकर सारे संसार को आलोकित कर दिया । रामजी के प्रगट होते ही ही तीनों लोक और चौदहों भुवन आलोकित हो गए । सभी चर-अचर में सुख-शांति का संचार हो गया । रामजी के जन्म लेने से देवता-गंधर्व आदि के कष्ट मिटे, ऋषियों-मुनियों, मनुष्यों आदि के कष्ट मिटे । अनेकानेक शापित प्राणियों के जैसे ताड़का, अहिल्या, कबंध आदि के कष्ट मिटे । संसार में नियम-नीति, मर्यादा, ज्ञान, वैराग्य  और धर्म का प्रकाश हुआ ।

  

रामजी रूप के समुंद्र हैं, रामजी शील के समुंद्र हैं, रामजी  सुख के समुद्र हैं और रामजी सभी सदगुणों के समुद्र हैं ।

 

 रामजी ने अपने रूप से संसार को आलोकित किया । जो देखे वह देखता ही रह जाए । जिधर से निकलें उधर ही दर्शन करने वालों की भीड़ लग जाए । रामजी के रूप की चर्चा होने लगे । यहाँ तक राक्षस भी रूप देखकर मोहित हो जाएँ । परम वैरागी ऋषि मुनि भी इनके रूप पे मोहित होकर स्त्री भाव को प्राप्त होकर इन्हें पति रूप में वरण करने की कामना करने लग गए ।

 

रामजी ने अपने शील से सारे संसार को आलोकित किया । तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में रामजी के शील- उदारता की चर्चा होती है । अहिल्या, शवरी, केवट, निषाद, कोल, भील, किरात, गीध, वानर, भालू और राक्षस सभी को रामजी ने अपनाया । अपना बनाया । निषाद, वानर, भालू आदि रामजी के दरबार में विराजते हैं ।

 

रामजी ने अपने सुख से सारे संसार को अवलोकित कर रखा है । वैसे तो संसार को दुखमय कहा गया है लेकिन संसार में जो भी चर-अचर सुख का अनुभव करते हैं अर्थात संसार का सभी सुख, सुख समुद्र की एक बूँद मात्र है ।  

रामजी में कोई भी गुण न्यूनता में नहीं हैं । रामजी सभी गुणों के सागर हैं । इन गुणों के चलते ही शत्रु भी राम जी की बड़ाई करते हैं । सराहना करते हैं ।

 

समस्त पुरवासी, सभी परिवार के लोग, गुरूजी, माता जी, पिता जी और अन्य  सभी हित-मित्र और अन्य प्राणी भी रामजी के स्वभाव से सुख को प्राप्त होते थे । सुखी होते थे । रामजी का स्वभाव सभी को सुख देने वाला है । इस प्रकार रामजी ने सारे संसार को अपने स्वभाव से आलोकित किया । तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में सुर, नर, मुनि आदि सभी रामजी के स्वभाव की चर्चा करते हैं । रामजी के स्वभाव से राम जी की पहचान होती है । रामजी के शील और सरल स्वभाव से ही दीन हीन मलीन जैसे खोटे सिक्के भी चलते हैं ।

 

राम जनमि जग कीन्ह उजागर ।

रूप शील सुख सब गुन सागर ।।

पुरजन परिजन गुर पितु माता ।

राम सुभाउ सबहि सुखदाता ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

बुधवार, 1 जून 2022

भक्तवत्सलता में भगवान श्रीराम के आगे कोई नहीं ठहरता

 भगवान श्रीराम कई बातों में अनूठे हैं । साधु-सदग्रंथ तो कहते हैं कि भगवान श्रीराम निरुपम हैं । अर्थात भगवान राम की कोई उपमा नहीं है । किसी से रामजी की उपमा नहीं की जा सकती है । राम जी के सामने जैसे कोई युद्ध में नहीं ठहरता ठीक वैसे ही रूप, गुण, स्वभाव, प्रभाव और भक्तवत्सलता आदि में भी कोई नहीं ठहरता- ‘निरुपम न उपमा आन राम समान राम निगम कहैं’

 

   भगवान के सभी रूप-अवतार एक हैं । फिर भी रूप, लीला और गुण में थोड़ी भिन्नता तो रहती है । भक्तवत्सलता भगवान का परम गुण है । भगवान के सभी  अवतार भक्तवत्सल हैं । लेकिन भगवान श्रीराम इस बात में भी अनूठे हैं । और भगवान श्रीराम के आगे भक्तवत्सलता में कोई नहीं ठहरता ।

 

भगवान श्रीराम ऐसे भगवान हैं जो अपने भक्तों के बीच पृथ्वी पर सबसे अधिक समय तक प्रत्यक्ष रहे ।

 

 जब भगवान वाराह बनकर आए तो थोड़े समय में ही लीला समाप्त करके चले गए । इसी तरह नरसिंह रूप में भी थोड़े समय में लीला समाप्त करके चले गए ।

 

 जब भगवान श्रीकृष्ण बनकर आए तो भी बहुत कम समय में ही लीला समाप्त करके चले गए । मथुरा से लेकर वृंदावन, द्वारका आदि की समस्त लीला भगवान श्रीकृष्ण केवल एक सौ पच्चीस वर्ष में ही पूरी करके चले गए ।

 

 लेकिन भगवान राम को कोई जल्दी नहीं थी । भगवान श्रीराम ने अपने भक्तों को बहुत समय दिया । भगवान श्रीराम पृथ्वी पर प्रत्यक्ष अनेकों वर्षों तक रहे ।

 

 ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम अपने भक्तों के बीच पृथ्वी पर प्रत्यक्ष सौ-दो सौ वर्ष नहीं बल्कि ग्यारह हजार वर्ष तक लीला करते रहे ।

 

इस प्रकार भगवान श्रीराम अपने भक्तों के बीच पृथ्वी पर अधिक समय तक रहने में भी अनूठे हैं । यह बात तो सभी जानते ही हैं कि रामजी प्रत्यक्ष लीला समाप्त करके गए भी तो अपने भक्तों को साथ लेकर गए । भक्तों को छोड़कर नहीं गए । और तो और पशु-पक्षी आदि को भी अपने साथ अपने धाम ले गए । ऐसी भक्तवत्सलता न देखने में आती है, न सुनने में और न ही रामजी के अतिरिक्त किसी और के लिए ग्रंथों में वर्णित ही है ।

 

इससे पता चलता है कि भगवान राम अपने भक्तों से कितना प्रेम करते हैं भगवान राम कितने भक्तवत्सल हैं । धन्य हैं रामजी । इसीसे संत, सदग्रंथ और भक्त कहते हैं कि- मेरे राम जैसा कोई नहीं ।

 

 लंका में राम-रावण युद्ध में जो वानर-भालू मारे गए थे उनको भी राम जी ने जीवन दान दिया । रामजी के अतिरिक्त और किसी ने भी ऐसा नहीं किया । यह रामजी की परम कृपालुता, भक्तवत्सलता और कृतज्ञता का ही उदाहरण है ।

 

भगवान के सभी अवतार भक्त वत्सल हैं । लेकिन उपरोक्त बातों से स्पष्ट है कि भक्तवत्सलता में भी राम जी अनूठे हैं । भक्तवत्सलता में भी कोई भी रामजी के आगे नहीं ठहरता ।

 

 

।। भक्तवत्सल भगवान श्रीराम की जय ।। 

रविवार, 10 मई 2020

भगवान और भगवान के नाम, रूप, लीला और गुण की अनंतता



सनातन भक्ति सिद्धांत के अनुसार भगवान और भगवान के नाम, रूप, लीला और गुण में अभेद होता है । जिस प्रकार भगवान अनंत हैं ठीक इसी तरह भगवान के नाम, रूप, लीला और गुण भी अनंत हैं ।


  भगवान के नाम, रूप, लीला और गुण की कोई सीमा नहीं है । इनका पूरा-पूरा वर्णन किसी के द्वारा अथवा किसी भी तरह संभव नहीं है । यह अनंतता का ही गुण है । इसलिए ही गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि भगवान शेष यदि अपने हजार मुखों से लगातार कई कल्पों तक भगवान की लीला-कथा का गायन करते रहें तो भी भगवान की लीला-कथा का गायन संभव नहीं है । क्योंकि भगवान की लीला कथा अनंत है- ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ । 


 अनंत का एक अर्थ यह है कि जिसका कोई अंत न हो अर्थात जो अंत रहित हो । जो अंत रहित होगा उसका कोई पार नहीं पा सकेगा । थाह नहीं पा सकेगा । जब अंत ही नहीं होगा तो कोई पार कैसे पायेगा ?


 अनंत का दूसरा मतलब यह भी है कि जिसका आदि, मध्य और अंत न हो वह अनंत है । जिसका अंत हो जाय अथवा जिसके अंत का पता चल जाय वह अनंत की परिभाषा के अंतर्गत आएगा ही नहीं ।


 भगवान की अनंतता को कई प्रकार से समझा जा सकता है । यदि भगवान की विराटता की बात की जाय तो वे इतने विराट हैं कि न ही उनका आदि, न ही मध्य और न ही अंत पाया जा सकता है ।


  यहाँ यह उल्लेख करना बहुत जरूरी है कि भगवान दूसरे रूप में इतने सूक्ष्म भी हैं कि वहाँ आदि, अंत और मध्य की परिभाषा ही समाप्त हो जाती है । इसे ही भगवान का निराकार रूप कहा जाता है । और यह भगवान का कोई काल्पनिक अथवा मानसिक कल्पना वाला रूप नहीं है । सनत्कुमारसंहिता में भगवान श्रीराम की स्तुति करते हुए कहा गया है कि आप अणु से भी अणु हैं । इसी बात को गीता में भगवान ने कहा है कि मैं अति सूक्ष्म-शून्य हूँ ।


 भगवान आदि, मध्य और अंत से परे हैं इस बात को इस प्रकार भी परिभाषित किया जाता है- आदि, मध्य और अंत यह सब जीव के लिए लागू होता है । भगवान के लिए नहीं । उदाहरण के लिए भगवान का न आदि (आरंभ )है अर्थात भगवान अजन्मा हैं । इसीतरह भगवान का कभी अंत (विनाश) नहीं होता है । जिसका आरंभ और अंत नहीं है उसका मध्य परिभाषित ही नहीं किया जा सकता है । किसी चीज का मध्य तभी ज्ञात किया जा सकता है जब उसका आदि और अंत ज्ञात हो । पर भगवान का तो अंत ही नहीं है ।


 सामान्य जीव जन्मता है और उसके जीवन का अंत भी होता है और इसलिए उसके जीवन का मध्य भी होता है । सामान्य जीवों का शरीर काल चक्र से बदलता भी रहता है । लेकिन भगवान सदा एक रूप रहते हैं ।


  भगवान की अनंतता में अनेक अनंत समाहित हैं । ऐसे भगवान और उनके नाम, रूप, लीला-कथा तथा गुण का कौन पार पा सकता है ?  जब लोग संसार के रहस्यों को ही नहीं जान पाते तो संसार बनाने वाले और संसार से परे भगवान के रहस्यों को कैसे समझ सकेंगे ?


भगवान आदि, अंत और मध्य से परे हैं । अर्थात वे अनादि हैं । अंत रहित हैं । लेकिन यह चराचर जगत आदि, अंत और मध्य से परे नहीं है । यह चराचर जगत भगवान से ही उत्पन्न होता है और भगवान में ही समाहित हो जाता है । इस चराचर जगत के आदि में कुछ नहीं था। जो था वही ईश्वर है । इसके अंत में भी कुछ नहीं बचता । जो बचता है वही ईश्वर है । इसके आदि, अंत और मध्य भगवान ही हैं । इसलिए ही भगवान को जैसे आदि, अंत और मध्य रहित होने से  ‘नहि तव आदि, मध्य अवसाना' कहा जाता है ठीक ऐसे ही इन्हें ‘तुम ही आदि, मध्य अवसाना’ भी कहा जाता है ।


 ग्रंथ कहते हैं कि भगवान पूर्ण हैं । यदि हम पूर्ण में पूर्ण मिला दें तो भी पूर्ण ही प्राप्त होता है । और यदि पूर्ण में से पूर्ण निकाल लें तो भी पूर्ण ही शेष बचता है । पूर्णता का मतलब अनंतता से होता है । गणित में भी इस तथ्य का बहुतायत उपयोग किया जाता है । जैसे अनंत में अनंत के योग से अनंत ही प्राप्त होता है  तथा अनंत में से अनंत निकाल देने पर भी अनंत ही शेष  रह जाता है ।


 भगवान और उनके नाम, रूप, गुण, लीला का मन, वुद्धि और वाणी से न तो पूरा-पूरा वर्णन किया जा सकता है और न ही समझा जा सकता है । ज्ञात संसारिक अथवा वैज्ञानिक ज्ञान या अन्य साधनों से भी भगवान को समझा नहीं जा सकता क्योंकि एक तो भगवान अनंत हैं - जथा अनंत राम भगवाना । तथा कथा कीरति कल गाना ।। और दूसरे भगवान मन, वुद्धि तथा वाणी से अतर्क्य हैं- 'राम अतर्क्य वुद्धि मन वानी' 


।। जय श्रीराम ।।


रविवार, 13 जनवरी 2019

तीन गुण जिनके आ जाने से जीव भगवत स्वरूप हो जाता है


जीव कभी भगवान नहीं बन सकता है । फिर भी तीन गुण ऐसे कहे गए हैं जिनके आ जाने से जीव भगवत स्वरूप कहे जाने का अधिकारी हो जाता है ।


 कहने का मतलब इतना है कि निम्नलिखित तीनों गुण एक साथ जिसमें आ जाएँ वह भगवत स्वरूप ही होता है । भगवत स्वरूप ही हो जाता है । भगवान नहीं होता क्योंकि भगवान ही भगवान हैं और वे एक और अद्वितीय हैं और भगवान में अनंत गुण हैं ।


ऐसे गुण, जिनके आ जाने से जीव भगवत स्वरूप हो जाता है, बड़े महत्वपूर्ण होंगे । अर्थात एक साथ किसी के भी अंदर ये जल्दी नहीं आते ।


  पहला गुण कहा गया है कि वह जितेन्द्रिय हो । दूसरा गुण यह है कि उसने क्रोध को जीत लिया हो । तीसरा गुण है कि उसने लोभ को जीत लिया हो ।


सुग्रीवजी महाराज श्रीरामचरितमानसजी में भगवान राम से कहते हैं कि हे भगवन ! जो स्त्री के नयन रुपी वाण से विधता नहीं है, जो क्रोधरूपी भयंकर अंधियारी रात्रि में भी जागता रहता है अर्थात जो क्रोध के समय भी विवेकवान बना रहता है-क्रोधान्ध नही होता । तथा जिसने कभी लोभ रुपी फांसी से अपने गले को बंधने नहीं दिया वह तो आपके समान हो जाता है ।

 
   ऐसा कौन होगा जो स्त्री के नयन वाण से कभी न विधा हो तथा जिसे कभी किसी चीज का भी लोभ न हुआ हो-न होता हो तथा जो क्रोध न करता हो- क्रोध की स्थिति में भी विवेक को धारण करता हो ?


भगवान में तो अनंत गुण हैं । लेकिन जीव केवल उपरोक्त तीन गुणों को धारण करके भगवत स्वरूप कहलाने का अधिकारी हो जाता है ।



।। जय श्रीसीताराम ।।


शुक्रवार, 1 जून 2018

साधारण जीव और भगवान राम: चार चीजें जो भगवान राम को याद नहीं रहती


भगवान श्रीराम परम सरल, कृतज्ञ, उदार, सर्व समर्थ एव संकोची स्वभाव के हैं  । संत और सदग्रंथ कहते हैं कि राम जी के समान सिर्फ राम जी हैं । उनके जैसा दीनदयाल और आरतपाल  भला दूसरा कौन हो सकता हैं । जिसे दीन हीन विशेष प्रिय हों ।


गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि हमारे रामजी ऐसे हैं कि राम जी को चार चीजें बिल्कुल ही याद नहीं रहती हैं । १. रामजी को अपना गुण याद नहीं रहता है । रामजी अनंत गुणों के धाम हैं । फिर भी उन्हें उनका कोई भी गुण याद नहीं रहता । इसलिए ही भक्त, संत और सदग्रंथ राम जी की अस्तुति करते हैं और उनका गुणगान करते रहते हैं । भक्तों को इससे विशेष लाभ यह होता है कि अपने गुण को सुनकर याद करके उसी के अनुरूप भक्त का कल्याण कर देते हैं ।


२. राम जी को किसी के द्वारा किया हुआ अनहित, अपकार, अपमान भी याद नहीं रहता । किसने क्या कहा अथवा कौन सा अपकार कर दिया है । रामजी इसे भी याद नहीं रखते ।


३. राम जी अपने सेवकों के दोष को क्षमा कर देते हैं । सेवकों के थोड़े से गुण का भी बखान करते हैं । लेकिन उनका दोष रामजी को याद नहीं रहता ।


४. रामजी जैसे देने वाला कोई नहीं है । रामजी बड़े दाता हैं । लेकिन किसी को कुछ देकर भूल जाते हैं । उन्हें यह बिल्कुल याद नहीं रहता कि किसे कब और कितना दिया था ।


जीव की रहनी ठीक इसके विपरीति होती है ।  जीव को अपना गुण याद रहता है । दोष नहीं । जीव दूसरे का दोष याद रखता है । जीव दूसरे के द्वारा बना अपकार और अपमान याद रखता है और इतना ही नहीं बदला लेने के लिए मौके की तलाश में रहता है ।


 साधारण जीव की दृष्टि दोषपरक होती है । दूसरे के थोड़े से दोष को भी कहता और सुनता है । गुण की चर्चा कम और दूसरे के दोष की चर्चा अधिक करता है । जीव अपना गुण और दूसरे का दोष याद रखता है ।


  साधरण जीव किसी को कुछ देता है तो उसे हमेशा याद रखता है । कहता भी और जनाता भी हैं । यहाँ तक दान देकर भी घोषणा करवाता है । अपने घर-परिवार का नाम तक अंकित करा देता है जिससे लोग जान सकें कि अमुक व्यक्ति ने अमुक बस्तु अमुक व्यक्ति को दिया है ।


  धन्य हैं राम जी जो सर्वगुण सम्पन्न, सर्व समर्थ, और महादानी होकर भी अपने गुण, दूसरे के अपकार और दिए हुए दान को कभी याद नहीं रखते ।


।। जय श्रीसीताराम ।।


शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

माता-पिता को वृद्धाश्रम में रखने से सभी साधन निष्फल हो जाते हैं

माता-पिता का जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता है । रामायण आदि ग्रंथों में माता-पिता की महिमा गाई गई है । आजके समय में कई लोग माता-पिता को वृद्धाश्रम में डाल देते हैं । और समझते हैं कि इससे उनका जीवन सुखमय रहेगा । लेकिन यह भूल है । बहुत बड़ी भूल है ।


कई लोग ऐसा करके भी कथा सुनते हैं, कराते हैं, सत्संग करते, कराते हैं और तीर्थ यात्रा भी करने चले जाते हैं । लेकिन इसका क्या फायदा ? कई लोग समझते हैं कि माता-पिता से अब क्या प्रयोजन ? इनके घर में रहने से झंझट ही रहेगा । इसलिए इन्हें दूर कर दो इसी में लाभ है ।


लेकिन ग्रंथों के अनुसार माता-पिता के आदर से, सेवा से सुख-शांति आती है । जीवन सुखमय रहता है । इसके विपरीत माता-पिता को दूर करके सुख का भले अनुभव हो लेकिन वास्तविक सुख नहीं मिलता । चैन नहीं मिलता और अशांति बनी रहती है । लोग समझ नहीं पाते लेकिन जीवन में उपद्रव आते रहते हैं । और किसी तरह से इनसे निजात नहीं मिलती ।


ऐसे लोंगो को किसी भी साधन अथवा साधना से लाभ नहीं होता है । इनका कोई भी धार्मिक कर्म बुझी हुई अग्नि में आहुति डालने के समान निष्फल हो जाता है । लेकिन इस कराल कलिकाल में सबके सोच-विचार बदल गए हैं । लोग अवगुण को गुण और गुण को अवगुण समझने लगे हैं –


रामदास कलिकाल में मति सबकी गै रूठ ।
ठूठे को समझत हरा हरे पेड़ को ठूठ ।। 

                          (दोहा संग्रह- ‘मानव माने होय’ से । )


ऐसे में सही और गलत का विवेक कैसे होगा ? गलत करके सही समझेगा और सुख का अनुभव करेगा । और कल्याण से वंचित हो जाएगा ।


जैसे कभी-कभी कुत्ते भूख के चलते सूखी हड्डी चबाने लगते हैं । और हड्डी के मुख में गड़ने से उसके ही मुख से रुधिर निकलने लगता है और उस रुधिर का पान करके कुत्ता सुख का अनुभव करता है । वह यह नहीं समझ पाता कि हड्डी में कोई रस नहीं है वह तो स्वयं का खून पी रहा है । स्वयं का नुकसान कर रहा है । ऐसे ही विवेक शून्य व्यक्ति अपना ही नुकसान करके सुख का अनुभव करते हैं और जीवन में कष्ट भोगते रहते हैं ।



।। जय श्रीसीताराम ।।


चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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