सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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रविवार, 1 सितंबर 2024

विरक्ति, त्याग और वैराग्य

 

विरक्ति और वैराग्य को सामान्तया एक ही समझा जाता है लेकिन दोनों में सूक्ष्म अंतर है । विरक्ति वैराग्य की प्रथम अवस्था है ।

 

तीन चीजे हैं- विरक्ति, त्याग और वैराग्य । पहले विरक्ति आती है अथवा होती है  । विरक्ति होने पर त्याग होता है । जिस चीज से विरक्ति हो जाती है उसको त्यागा जा सकता है ।

 

यदि किसी को घर-गृहस्थी से विरक्ति  हो गई है । तो वह घर-गृहस्थी को त्याग सकता है । और कई लोग त्याग भी देते हैं । और लोग कहने लगते हैं कि इनको वैराग्य हो गया है । ये वैरागी हैं । लेकिन त्याग होना आसान है वैराग्य होना कठिन है ।

 

विरक्ति और वैराग्य को इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि बाहर के त्याग को विरक्ति कहते हैं और बाहर और भीतर-मन दोनों के त्याग को वैराग्य कहते हैं ।

 

उदाहरण देकर समझाने का प्रयास करते हैं । मान लीजिए किसी को धन-वैभव-स्त्री आदि भोगों  से विरक्ति हो गई और उसने त्याग कर दिया । अब क्या भीतर से भी उसने इन सबका त्याग कर दिया है ।

 

   यह समझने के लिए मान लीजिए सुंदर से सुंदर स्त्री और बड़ा से बड़ा वैभव उपस्थित हो जाता है  अब देखने वाली बात यह है कि क्या इस स्थिति में भी उसके मन में कोई विकार-लोभ नहीं आता है ? यदि इस स्थित में भी अर्थात भोग की सारी सामग्री उपस्थित होने पर भी भीतर-मन का त्याग बना रहता है । तब तो यह वैराग्य है अथवा विरक्ति थी, सचमुच का वैराग्य नहीं ।

 

।। जय श्रीराम ।।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

साधु, संत, भक्त, सदग्रंथ, धर्म और कलिकाल

संतों और भक्तों के गुण स्वयं भगवान गाते हैं । संतों की महिमा स्वयं भगवान कहते हैं । संतों और भक्तों की महिमा गाने वाले श्रीभक्तमाल ग्रंथ से कौन परिचित नहीं होगा । लेकिन कलियुग में साधु, संत, भक्त, सदग्रंथ और धर्म की बुराई करने वाले दिनों-दिन बढ़ते जाते हैं ।

 

भक्तमाल की कथाएँ भी होती रहती हैं । और भक्तमाल की पुस्तक लेकर भी पढ़ा जा सकता है । इससे बहुत लाभ होता है । यहाँ लाभ का मतलब मुख्यतः भजन-साधना में लाभ से है ।

 

 श्रीरामचरितमानस जी में संत और असंत का वर्णन कई बार आया है । भगवान श्रीराम ने स्वयं अरण्यकांड में नारद जी से संत महिमा कही है । इसी तरह  उत्तरकाण्ड में भी संत और असंत के लक्षण भगवान श्रीराम ने कहा है ।

 

  भगवान श्रीराम ने स्वयं दिखाया है कि साधु-संत का आदर और सत्कार करना चाहिए । इसलिए सभी को साधु-संत का आदर और सत्कार करना चाहिए ।


कलियुग का प्रभाव बढ़ने से सबका प्रभाव कम होने लगता है । अथवा प्रभाव जल्दी समझ में नहीं आता है । और इसलिए साधु, संत, सदग्रंथ और धर्म की बुराई करने वाले और इनको न मानने वाले बढ़ने लगते हैं ।

 

लेकिन जब कोई संत ही संतों की बुराई करने लग जाए तब इससे बड़ी बिडम्बना और क्या होगी ? पिछले पोस्ट में जिन संत से गोरे राम जी की चर्चा के बारे में बताया गया था ।  वे बड़े से बड़े संत की भी बुराई बड़ी आसानी से कर देते हैं ।

 

एक बार तो इन्होंने यहाँ तक कह दिया कि बड़ी-बड़ी कथाओं में जो संत-वक्ता के साथ कई संत आते हैं वे माल-पुआ काटने और मोटी दक्षिणा पाते हैं इसलिए आते हैं । शायद ऐसा कोई साधरण व्यक्ति भी नहीं कहेगा । अथवा वही कहेगा जिसने साधुओं और गुरजनों की सभाओं का ठीक से सेवन नहीं किया है-‘जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई’ ।

 

  लेकिन यह सोचने वाली बात है कि जो बीस-तीस-चालीस वर्ष से भजन में लगा है, बड़े संत का संग कर रहा है वह क्या माल-पूड़ी काटने के लिए अथवा दक्षिणा के लिए सत्संग करने जाएगा ? ऐसा बिचार मन में आ जाए तो वाणी में नहीं लाना चाहिए । कम से कम किसी से कहना नहीं चाहिए ।  यह कलिकाल का ही प्रभाव है ।

 

 इन्होंने एक बार कहा कि बड़े-बड़े आश्रमों में जाकर देखों कितना राग-द्वेष भरा है । मैंने इनको बताया कि वहाँ हजारों-लाखों की संख्या में लोग जुड़े हैं वहाँ ऐसा होना कोई आश्चर्य नहीं है । लेकिन आप से तो अभी बहुत कम लोग जुड़े हैं फिर भी लोगों में कितना राग-द्वेष है । तब इन्होंने मेरी बात को हँसी में टाल दिया ।

 

   उपरोक्त बातों का उल्लेख इसलिए किया गया है कि केवल नास्तिक प्रकृत के लोग जो वेद-भगवान को नहीं मानते केवल वे लोग ही साधु-संत की निंदा नहीं करते बल्कि कुछ साधु-संत भी बड़े-बड़े साधु-संतों की बुराई व निंदा करते हैं । कारण कुछ भी हो ।

 

इसलिए इस कराल कलिकाल में बहुत बच कर रहने की जरूरत होती है । कौन कब और कहाँ तथा किसलिए गुमराह कर दे अथवा गुमराह करने का प्रयास करे कुछ कहा नहीं जा सकता है । और ऐसे लोगों से बच कर रहना चाहिए-'जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई'  

 

।।  जय श्रीराम ।।

मंगलवार, 9 जून 2020

दान और धन की शुद्धता: दान देने से कौन सा धन पवित्र होता है ?


लोग ऐसा कहते, सोचते अथवा मानते हैं कि दान देने से धन शुद्ध हो जाता है, पवित्र हो जाता है । और यह बात सही भी है कि दान देना चाहिए और दान देने से धन पवित्र हो जाता है । लेकिन हर तरह से कमाया हुआ धन दान देने से पवित्र नहीं होता है । इसलिए यह जानना जरूरी है कि कौन सा धन दान देने से पवित्र हो जाता है और कौन सा धन दान देने से भी पवित्र नहीं होता है ।

   जो धन ईमानदारी पूर्वक कमाया जाता है वह धन दान देने से पवित्र हो जाता है । तथा जो धन चोरी, बेईमानी, घूस आदि से कमाया जाता है वह धन दान देने से भी पवित्र नहीं होता है ।

   बेईमानी से कमाया हुआ धन दूषित होता है और यह उपभोग करने वाले को भी दूषित कर देता है । अब ऐसे धन को यदि किसी संत को भी दान कर दिया जाय तो उसका भी अहित होता है । क्योंकि अशुद्ध धन से अन्तःकरण दूषित हो जाता है और इसलिए संत की भी तपस्या बिगड़ जाती है । इस प्रकार दूषित धन दान देने वाले और लेने वाले दोनों को दूषित कर देता है  

   यहाँ एक प्रश्न है । कोई सोच सकता है कि जो धन ईमानदारी पूर्वक कमाया जाता है वह तो पहले से ही शुद्ध होता है । तो फिर ऐसा क्यों कहा गया है कि ईमानदारी पूर्वक कमाया हुआ धन दान देने से शुद्ध हो जाता है ?

  यहाँ पर सूक्ष्म बिचार है । पूर्ण ईमानदारी और पूर्ण निष्ठा से किए गए कार्य में भी किसी असावधानी बस जो न्यूनता रह जाती है उसके कारण प्राप्त धन में थोड़ी अशुद्धता आ जाती है । और यह अशुद्धता दान देने से दूर हो जाती है । इस प्रकार कमाया गया धन शुद्ध हो जाता है ।

 अतः ईमानदारी पूर्वक कमाए गए धन में जो थोड़ी-बहुत अशुद्धता होती है वह तो दान देने से पवित्र हो जाता है । लेकिन चोरी, बेईमानी और घूस आदि से कमाया गया धन दान देने से भी पवित्र नहीं होता है ।


।। जय श्रीराम ।।


सोमवार, 18 मई 2020

सनातन धर्म और अर्थ (धन) की पवित्रता: धन की पवित्रता सभी पवित्रताओं में श्रेष्ठ है


सनातन धर्म में धन की शुचिता (पवित्रा) पर बहुत जोर दिया गया है । ग्रंथों में कहा गया है कि धन की पवित्रता सभी पवित्रताओं में श्रेष्ठ है । इसलिए धन के अर्जन में बहुत सावधानी की जरूरत होती है । यदि सावधानी पूर्वक धन का अर्जन न किया जाय तो धन की शुचिता चली जाती है । और धन की पवित्रता के बिना जीवन पवित्र नहीं रहता ।


  संसार में जीवन यापन के लिए धन की आवश्यकता होती है । धर्म और काम के लिए भी धन की जरूरत होती है । इसलिए सामान्यतयः सभी लोग धन अर्जन के लिए कोई न कोई कार्य करते हैं । लेकिन सदग्रंथ कहते हैं कि धन का अर्जन धर्म पूर्वक ही होना चाहिए ।


  धर्म पूर्वक धन के अर्जन का मतलब है कि जो कार्य किया जाय उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से किया जाय तथा उस कार्य के बदले जितना धन देने को निश्चित किया गया हो उतना ही धन लिया जाय । अर्थात इसमें चोरी, बेईमानी अथवा घूस का एक भी पैसा नहीं होना चाहिए । और यदि कोई ऐसा नहीं करता तो उसका धन पवित्र नहीं रहता । और यदि धन पवित्र नहीं होगा तो वह व्यक्ति भी पवित्र नहीं रह पायेगा । अपवित्र धन से अन्तःकरण की पवित्रता नष्ट हो जाती है ।


  यदि किसी का धन पवित्र नहीं है तो वह अन्य किसी साधन से पवित्र नहीं हो सकता है-न ही दान देने से और न ही स्नान से ।


  मनु महाराज मनु स्मृति में कहते हैं कि सभी पवित्रताओं में धन की पवित्रता ही श्रेष्ठ है-


  सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योऽर्थे सुचिहि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ।।


 गोस्वामी तुलसीदास महाराज कहते हैं कि जिस धन पर धर्म पूर्वक अपना अधिकार नहीं है वह दूसरे के हिस्से का होता है । और जैसे कोई विष का उपभोग नहीं करता उसे त्याग देता है । ठीक इसी तरह दूसरे के धन को विष से भी बड़ा विष मानकर त्याग देना चाहिए- ‘धन पराव विष ते विष भारी’


इस प्रकार जितनी शुद्धतायें हैं उनमें धन की शुद्धता ही श्रेष्ठ है । जो धन के सम्बंध में पवित्र है, वही वास्तव में पवित्र है । अधिक धन की इच्छा से अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए ।


कलियुग में लोग धन कमाने में न्याय, अन्याय, उचित और अनुचित पर विचार नहीं करते । इससे ही लोगों का अन्तःकरण दूषित हो जाता है और तरह-तरह के अन्य पाप भी उत्पन्न होते रहते हैं । दूषित धन उपभोग करने वाले को भी दूषित कर देता है । इसलिए धन की पवित्रता बनाए रखना चाहिए ।


।। जय श्रीसीताराम ।।

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

पुराणों के अनुसार महामारी क्यों पड़ती है ?


सनातन धर्म में सामान्यतयाः जीवन से जुड़ी हर समस्या का उल्लेख मिलता है । तरह-तरह की बीमारियों और उनके निदान पर ऋषियों ने बहुत काम किया है और आयुर्वेद जैसे ग्रंथ की रचना करके तथा योग-अभ्यास आदि साधनों द्वारा मानव जीवन के कल्याण हेतु बहुत कुछ किया है ।


 मानव जीवन के कल्याण हेतु धर्म का भी बहुत महत्व बताया गया है । जैसे-जैसे लोग धर्म से दूर होते जाते हैं वैसे-वैसे अपने जीवन कल्याण से भी दूर होने लगते हैं ।


 सनातन धर्म में धर्म बहुत ही सूक्ष्म और व्यापक भी है । जबतक हम सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को नहीं समझेगें, नहीं मानेगें तब तक अपार प्रगति कर लेने पर भी सुखी नहीं रह पाएंगे । ऐसा सनातन धर्म का मानना है । और सनातन धर्म समस्त विश्व के लिए -मानव धर्म है । प्राणिमात्र का धर्म है । चर-अचर सबका धर्म है 


 मनुष्य या तो धर्म करता है या अधर्म । अधर्म का मतलब पाप भी होता है । और श्रीमार्कंडेय पुराण के अनुसार महामारी का प्रमुख कारण पाप ही है ।


     इस प्रकार पुराणों के अनुसार पाप की अधिकता होने पर महामारी पड़ती है । और लोग अंहकार-गुमान के वशीभूत होकर धर्म का निरादर करके अधर्म में रत होते हैं । परंतु धर्म से ही संसार का भला होता है । ऐसा सनातन धर्म के सद्ग्रंथों का समझाना है । 


  प्राणिमात्र का हित करना, जल, जंगल, पर्वत, वायु आदि का आदर और संरक्षण करना धर्म है । यह धर्म किसी एक देश अथवा जाति का धर्म नहीं है । यह सनातन धर्म है । समस्त संसार के लिए यह धर्म है 


 इसलिए ही मनुष्य को कभी भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए –


‘परहित सरिस धर्म नहि भाई । परपीड़ा सम नहि अधमाई’ ।।

                                 - श्रीरामचरितमानस  

निम्नलिखित पंक्ति में भी रोग का एक कारण पाप को ही बताया गया है-


करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक वियोग ।।

                        - श्रीरामचरितमानस  


कलियुग में अकाल, दुर्भिक्ष और महामारी पड़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं है-


कलि बारहिं बार दुकाल परै । बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै ।।

                                 - श्रीरामचरितमानस  



।। जय श्रीराम ।।





शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

वास्तविक मूर्खों का प्रश्न: क्या तुलसीदास जी ने रामजी को भगवान बनाया है ?


इस कलिकाल में वास्तविक मूर्खों की बहुलता है । इसमें से कई अपने को विद्वान, पढ़ा-लिखा आदि भी समझते हैं । लेकिन वास्तव में ये वास्तविक मूर्ख होते हैं जिन्हें विमूढ़ भी कहा जाता है । ये कहीं भी और कुछ भी बकने लगते हैं । बिना तथ्य के, बिना किसी आधार के ।


ऐसे लोग कहते अथवा समझते हैं कि रामजी भगवान नहीं थे । कोई कहता है कि तुलसीदासजी ने रामजी को भगवान बना दिया । वे तो राजकुमार थे । मुगलकाल में हिंदुओं के लिए कोई आदर्श नहीं था और इसलिए तुलसीदासजी ने राम को भगवान बना दिया । और जनता के सामने एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया ।


लेकिन ऐसे महामूर्खों को कौन समझाए कि तुलसीदास जी तो पाँच सौ से छ सौ वर्ष पहले ही हुए थे । और इनके पहले भी राम जी की भगवान के रूप में पूजा होती थी । संत-मुनि और सदग्रंथ युगों-युगों से रामजी की यश-गाथा को गाते आ रहे हैं ।


 पुराणों और उपनिषदों की पुस्तक रूप में रचना तो तब हुई है जब तुलसीदास जी नहीं थे । एक दो नहीं कई हजार वर्ष पहले हुई है । तब न आज के महामूर्ख ही थे और न तुलसीदास जी ही । लेकिन वास्तविक मूर्ख को तो व्रह्माजी भी नहीं सिखा सकते, समझा सकते तो सामान्य व्यक्ति क्या कर सकता है ?


  पद्मपुराण, स्कंदपुराण आदि में राम जी का संपूर्ण चरित्र वर्णित है । पुराणों, उपनिषदों, संहिताओं आदि में राम नाम और राम जी की महिमा मुक्त कंठ से गाई गई है । व्यास, वाल्मीक, विश्वामित्र, वशिष्ठ, गर्ग इत्यादि ऋषियों ने राम जी के चरित्र और महिमा का अपने-अपने ग्रंथों में गायन किया है । फिर भी अज्ञानी वास्तविक मूर्ख कुछ भी बकते रहते हैं ।


  रामजी और रामजी के चरित्र सनातन धर्म के आधार स्तंभ हैं । इनके बिना सनातन धर्म अपूर्ण हो जायेगा । और इतना ही नहीं श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत आदि जैसे ग्रंथ और श्रीकृष्णावतार भी अपूर्ण हो जाएगा । क्योंकि एक ग्रंथ दूसरे से और एक अवतार दूसरे से जुड़कर ही पूर्ण होता है । चूँकि रामजी कृष्णजी के पूर्वज (पूर्व के ) हैं इसलिए कृष्ण चरित्र रामजी के बिना अपूर्ण है । कृष्ण जी से जुड़े हुए ग्रंथ राम चरित्र के बिना अपूर्ण हैं । इस बात की गंभीरता को संत और भक्त समझते हैं ।


इसलिए मूर्खता की सीमा को पार नहीं करना चाहिए और अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए । रामजी धर्म स्वरूप, नित्य पूर्ण परमात्मा और सनातन व्रह्म हैं । संत, भक्त और ग्रंथ इस बात को जानते, मानते, समझते और समझाते हैं ।



।। जय श्रीराम ।।

 



शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

कल्कि भगवान-भगवान का कल्कि अवतार


सद्ग्रन्थों के अनुसार भगवान का एक प्रमुख अवतार होना अभी शेष है । यह  अवतार कलियुग के अंत में होना सुनिश्चित है । इस अवतार में भगवान कल्कि भगवान के नाम से विख्यात होंगे । जाने जाएँगे ।

         
    सनातन धर्म दुनिया का प्राचीनतम धर्म है । जब आज के अन्य कोई धर्म नहीं थे तब भी सनातन धर्म था । बाकी धर्म कलियुग में ही उत्पन्न हुए है । सतयुग, त्रेता और द्वापर में केवल सनातन धर्म ही पृथ्वी पर था । सातो द्वीपों में सनातन धर्म था । सनातन धर्म में अवतार पहले भी हुए हैं लेकिन धर्म को बचाने के लिए । सनातन धर्म सदा-सदा से चलता आ रहा है और चलता रहेगा । लेकिन जब अधर्म अधिक बढ़ जाता है तब भगवान प्रकट रूप में आते हैं ।


ऐसे ही जब कलियुग में सनातन संस्कार लोप होने लगेंगे । अधर्म का बोलबाला हो जाएगा तब भगवान संभल ग्राम में अवतार लेंगे । ये भगवान उच्चैश्रवा पर सवार होकर पापियों का वध करेंगे । लेकिन अभी इसमें समय शेष है ।


  अभी पूजा, पाठ, कथा, प्रवचन आदि बहुतायत होते हैं । सनातन संस्कार क्षीण हो रहे हैं पर विद्यमान हैं । धीरे-धीरे अधर्मी बढ़ते जाएँगे । पूजा-पाठ, कथा-प्रवचन लगभग समाप्त हो जायेंगे । उपद्रवी बढ़ जायेंगे । नाना उपद्रव करेंगे । कहीं शान्ति नहीं रहेगी । चारो तरफ त्राहि-त्राहि ही सुनाई पड़ेगी ।

 
  लोग पशुवत रहने लगेंगे । शादी-विवाह भी बंद हो जायेंगे । तब कल्कि भगवान सनातन धर्म की स्थपना करेंगे । सातो द्वीपों में सत्य सनातन धर्म की स्थापना होगी । इससे सत्य का युग आ जाएगा । अर्थात सतयुग लग जाएगा । और वर्णाश्रम धर्म की स्थपना हो जायेगी । और फिर से राजा लोग राज्य करने लगेंगे । अयोध्या राज्य का एक प्रमुख केन्द्र विंदु रहेगी । ऐसा ही पुराणों का मत है ।


।। जय श्रीराम ।।

रविवार, 16 दिसंबर 2018

अधर्म पूर्वक उपार्जित धन के दान से लाभ नहीं होता है


दान की बड़ी महिमा है । साधु, संत और ग्रंथ सभी दान की महिमा बताते हैं । कलियुग में दान का विशेष महत्व कहा गया है । यथा-शक्ति दान देना भी चाहिए । लेकिन किस धन का दान देने से लाभ होता है । यह जानना और समझना महत्वपूर्ण है ।


  नीति युक्त, धर्म युक्त उपार्जित धन का दान करना चाहिए । इस दान से लाभ होता है । अनीति अथवा अधर्मपूर्वक उपार्जित धन का दान देने से लाभ नहीं होता है । इसलिए ऐसे धन का दान नहीं करना चाहिए ।


अनीति अथवा अधर्मपूर्वक धन कमाना ही नहीं चाहिए । ऐसा कभी नहीं सोचना अथवा समझना चाहिए कि अधर्मपूर्वक उपार्जित धन का दान देने से धन शुद्ध हो जाएगा ।


  नीति पूर्वक, धर्म पूर्वक कमाए गए धन की दान से शुद्धि होती है । अधर्म पूर्वक उपार्जित धन तो पहले से ही पूर्ण अशुद्ध होता है और दान देने से इसकी शुद्धि नहीं होती है ।


कई लोग इसी सोच के साथ बड़ा दान करते हैं कि इससे उनकी अधर्म की कमाई शुद्ध हो जायेगी । लेकिन ऐसा नहीं है । ऐसा दान जिसको दिया जाता है उसका भी चित्त अशुद्ध हो जाता है । अर्थात अशुद्ध धन का दान लेने वाले की भी हानि होती है ।


इस प्रकार धर्म पूर्वक उपार्जित धन का दान करके पुण्य लाभ करना चाहिए । और अधर्म पूर्वक धन का उपार्जन नहीं करना चाहिए । न ही ऐसे धन का दान करना चाहिए ।


।। जय श्रीराम ।।



रविवार, 28 अक्टूबर 2018

बच्चों को क्या सिखाएँ जिससे बुढ़ापे में वृद्धाश्रम न जाना पड़े


एक बार एक शहर में लोग मदर्स-फादर्स डे मना रहे थे ।  लोगों ने कई कार्यक्रम  रखा हुआ था ।  इसमें भाग लेने वाले एक से एक लोग थे ।  धन और पद में बड़े लोग थे ।  बाद में पता चला कि कार्यक्रम में ऐसे लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे जिनके खुद के माता-पिता वृद्धाश्रम में रह रहे हैं ।


 कुलमिलाकर बहुत ही खराब समय चल रहा है । और दिनों-दिन स्थिति और बिगड़ती जा रही है । इसलिए जहाँ तक हो सके बच्चों को उचित संस्कार देने का प्रयास करना चाहिए ।


 छ साल से चौदह साल तक में बच्चे जो सीखते हैं उसका प्रभाव जीवन भर रहता है । इस उम्र के बच्चों को नैतिक शिक्षा धार्मिक शिक्षा के माध्यम से देनी चाहिए । यदि बच्चे में छ से चौदह साल तक की आयु में धार्मिक रुझान-लगाव पैदा हो जायेगा तो इसकी छाप आजीवन रहेगी ।


  इससे बच्चा आस्तिक बनेगा । और धर्म-कर्म का मतलब समझेगा । और किसी भी स्थिति में अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में नहीं डालेगा ।


  इसके लिए बच्चों को श्रीरामचरितमानस पढ़ाना चाहिए । भक्तों की और प्राचीन महापुरुषों की कहानियाँ पढ़ानी व सुनानी चाहिए । इससे जीवन में बहुत बदलाव आता है ।


  आज के समय में स्कूली शिक्षा में नैतिक शिक्षा का स्थान नहीं रह गया है । आजकल का वातावरण ही ऐसा बन गया है कि बच्चे और बड़े मौज-मस्ती, रुपया-पैसा और ऐशोआराम को ही जीवन समझने लगे हैं । इसलिए घर पर ही सही धार्मिक-नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए । इससे बच्चे का चरित्र निर्माण होगा और माता-पिता को वृद्धाश्रम में नहीं जाना पड़ेगा ।


एक कहावत है कि ‘बूढ़ा तोता पढ़ाए नहीं पढ़ता’ अर्थात बड़ी उम्र हो जाने पर धार्मिक-नैतिक शिक्षा का ज्यादा असर नहीं पड़ता । इसलिए छ साल से चौदह साल में जो सीख गए वह ही हृदय पटल पर अंकित हो पाता है और आगे प्रभाव दिखा पाता है ।


कुछ समय पूर्व एक कविता में मैंने लिखा था-


देश समाज की स्थिति दिन-दिन और बिगड़ती जाती है ।

हिंसा, शीलहरण लूट डकैती रोज सुनने में आती है ।।

शुरू से अपने बच्चों को जो मानस पाठ पढ़ाए हम ।

अपने-आप बहुत सीमा तक समस्याएं हो जाएँ कम ।।

स्कूलों और कॉलेजों में जो मानस भी पढ़ी जायेगी ।

जन-जन से प्रेम, बड़ों को मान, सत्य अहिंसा की शिक्षा से क्या
                            निरपेक्ष छवी मिट जायेगी ।।


जन-जन से प्रेम करने, बड़ों को मान देने, सत्य का आचरण करने और अहिंसा का पालन करने वाली शिक्षा से निरपेक्ष छवी पर कोई आँच थोड़े आएगी । इसलिए स्कूलों में भी मानस जी की शिक्षा दी जानी चाहिए । क्योंकि मानस जी की यह शिक्षा हर व्यक्ति के लिए, देश के लिए, समाज के लिए जरूरी और महत्वपूर्ण है ।


 स्कूल करें या न करें लेकिन हम-सब तो अपने घर पर अपने बच्चों के लिए इसकी व्यवस्था तो कर ही सकते हैं । और अपने तथा उनके जीवन में परिवर्तन लाने का प्रयास कर सकते हैं ।


।। जय श्रीसीताराम ।।

बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

वह दिन जब लोग विवाह नहीं करेंगे- जब विवाह होना बंद हो जाएगा


सनातन धर्म में विवाह एक संस्कार है । सोलह संस्कारों में से एक है । लेकिन धर्म हानि से जैसे धीरे-धीरे एक-एक संस्कार, मान्यताएं अपना दम तोड़ रहीं हैं एक दिन विवाह जैसी पवित्र परंपरा भी अपना दम तोड़ देगी । पुराणों का ऐसा ही मत है ।


धर्म की हानि से धार्मिक मान्यताएं धीरे-धीरे क्षीण होने लगती हैं । संस्कार और परम्पराएँ अनावश्यक समझी जाने लगती हैं । लोग हँसी उड़ाने लगते हैं ।


  सनातन धर्म के अनुसार विवाह एक पवित्र बंधन है । इस बंधन से बंधकर फिर अलग नहीं हुआ जा सकता है । सनातन धर्म में विवाह के बाद स्त्री-पुरुष सदा के लिए पति-पत्नी बन जाते हैं । किसी भी कारण से अलग रहें तो भी पति-पत्नी बने रहते हैं क्योंकि यह सम्बंध अटूट माना गया है । सनातन धर्म में तलाक की कोई व्यस्वथा नहीं है ।


  लेकिन धीरे-धीरे लोग भगवान में अविश्वास करने लगे । संतों और ग्रंथों की बातों की उपेक्षा करने लगे । इससे मनमाना होने लगा । लोग विवाह करके अलग भी रहने लगे । जिसे तलाक कहा जाने लगा । इतना ही नहीं लिव इन रिलेशन का कांसेप्ट आया जिसमें बिना विवाह किए भी लोग पति-पत्नी की तरह रहने लगे । अभी यह सब आगे आने वाली बड़ी घटना की बानगी मात्र हैं ।


  धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आ जाएगा कि लोग इतने आधुनिक हो जाएँगे कि विवाह को बिना मतलब और फालतू समझने लगेंगे । जो लोग विवाह नहीं करेंगे वे ज्यादा श्रेष्ठ समझे जाएँगे । विवाह स्वतंत्रता में- स्वतंत्र जीवन में बाधक समझा जाने लगेगा ।


  मनुष्य की स्थिति भी कुछ भेंड़ जैसी ही है । एक को पुरानी परंपरा-रीति-रिवाज को तोड़ते, धर्म विरुद्ध आचरण करते देख और लोग भी कूद पड़ते हैं । कौन अपने को पिछड़ा कहलवाये ? इसलिए आधुनिक और समझदार कहे जाने के लिए लोग आगे आते हैं और भेंड़ बन जाते हैं ।


  ऐसा ही एक दिन आगे आएगा जब विवाह करने वाले लोग पिछड़े और पुरानी मान्यताओं को मानने वाले माने जायेंगे । बस देखते ही देखते इस पुरातन परंपरा का अंत हो जाएगा । और विवाह नहीं होंगे । ऐसी स्थिति में सब पशुवत रहने लगेंगे । 


  पुराणों में ऐसा संकेत मिलता है । अभी से कई लोग विवाह को स्वतंत्रता में बाधक मानने लगे हैं । और इसे अनावश्यक कहने लगे हैं । धीरे-धीरे और लोग इस मुहिम से जुड़ते जाएँगे । और परम आधुनिक बन जाएँगे । यदि यही आधुनिकता है तो लोग पीछे क्यों रहेंगे । कलियुग जो न करा ले वही कम है-

रामदास कलिकाल में, मति सबकी गय रूठ  । 
ठूठे को समुझत हरा, हरे पेड़ को ठूठ  । 

पहले का कहते गलत, अब आया नवचार 
दिशा बिना है दुर्दशा, खोजि रहे उपचार 

अंकुश नहि जब धर्म का, नहीं नीति का मान  । 
रामदास वन पशु सरिस, कहैं कहाँ भगवान । 



।। जय श्रीसीताराम ।।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

किसी भी देश-समाज को कमजोर करना हो तो उसे धर्म से दूर कर देना ही पर्याप्त होता है


धर्म मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है । धर्म जीवन है । सनातन धर्म जीवन जीने की कला है । धर्म मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने के लिए जरूरी है । मनुष्य को धर्म बंधन में बँधे रहने की जरूरत है । धर्म बंधन में बँधे मनुष्य के जीवन में सत्य और सदाचार की प्रधानता होती है ।


सत्य, सदाचार और नैतिकता का मूल धर्म है । धर्म रहित जीवन सत्य, सदाचार और नैतिकता से रहित हो जाता है । धर्म से बंधन जितना दृढ होता है सत्य, सदाचार उतनी ही अधिक दृढ़ता से मनुष्य के साथ होते हैं ।


  जिसके जीवन में सत्य और सदाचार है वह कभी दूसरे का हक नहीं मारता । कभी किसी के साथ छल नहीं करता । अपने लाभ के लिए दूसरे को हानि नहीं पहुंचाता । आजकल हर जगह अधर्म और अनीति का बोलबाला है । क्योंकि  जीवन में धर्म या तो है नहीं अथवा बहुत कमजोर है । धर्म बंधन नहीं है । अथवा इसमें दृढ़ता नहीं है ।


 इससे सत्य और सदाचार का हर जगह अभाव दिखने लगा है । आज लोग अपने लाभ के लिए, स्वार्थ के लिए क्या-क्या नहीं करते ? दूसरे का जीवन तक लेने में संकोच नहीं करते ? क्योंकि जीवन में धर्म नहीं है, सत्य नहीं है, सदाचार नहीं है ।


 अभी कुछ समय पूर्व ही देश समाज में वीर शिवाजी, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, बाल गंगाधर तिलक आदि जैसे लोग थे, होते थे । इनके जीवन में धर्म था, सत्य था, सदाचार था । बचपन से ही इन्हें धर्म, सत्य, सदाचार सिखाया गया और इससे इनके जीवन में निखार आया, सत्य आया और देश-समाज के लिए बहुत कुछ करके दिखाया । तिलक जी ने गीता जी पर भाष्य लिखा था । कैसा जुड़ाव था इन लोगों का धर्म से । देश से । समाज से । आज विल्कुल बिपरीत हो रहा है । धर्म से विमुखता देश-समाज की दुर्दशा का कारण है ।


किसी भी देश-समाज को कमजोर करना हो तो उसे धर्म से दूर कर देना ही पर्याप्त होता है । धर्म विमुख मनुष्य सत्य, सदाचार से भी विमुख हो जाता है । और देश-समाज में मनमाने आचरण होने लगते हैं । और उस देश समाज की सभ्यता, संस्कृति भी समाप्त हो जाती है । अनीति, अनाचार बरजोरी और भ्रष्टाचार का साम्राज्य स्थापित हो जाता है ।


 
।। जय श्रीसीताराम ।।


शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

धर्म के अभाव से व्यक्ति, घर, समाज और देश का न रुकने वाला पतन


आजकल हम लोग अपने को पढ़ा-लिखा, आधुनिक और पता नहीं क्या-क्या समझते हैं । लेकिन जो समझना चाहिए वह नहीं समझते हैं ।

      
 इसीतरह आजकल लोग बहुत कुछ मनाते भी रहते हैं । जैसे पिता दिवस, माता दिवस, महिला दिवस और न जाने क्या-क्या ? मैं अक्सर कहता हूँ कि आजकल लोग मनाते तो बहुत कुछ हैं लेकिन मानते नहीं हैं ।


 मानना जरूरी है मनाना नहीं । जो जरूरी है उसे करते नहीं, मानते नहीं  और जो जरूरी नहीं है वही करते हैं, मानते हैं, उसी के पीछे भागते हैं । इससे पतन होता है । विडम्बना यह है कि लोग पतन को उन्नति समझते हैं ।


प्रत्येक व्यक्ति को वह चाहे जिस क्षेत्र से जुड़ा हो धार्मिक होना चाहिए । घर-गाँव, समाज, देश की सबसे बड़ी जरूरत है धर्म-धार्मिक होना । और आजकल लोग धर्म से दूर होते जा रहे हैं । यह सबसे बड़ी अवनति है ।  इसकी भरपाई कोई भी उन्नति नहीं कर सकती है । बिना धार्मिक हुए घर-गाँव, समाज, देश का पतन नहीं रुक सकता ।


धर्म क्यों जरूरी है । धार्मिक होना क्यों जरूरी है ? क्योंकि बिना धर्म बंधन के सत्य से दूरी बढ़ती जाती है-‘धर्म बंधन के बिना सत्य से बढ़ती जाती दूरी है’। और यदि जीवन में सत्य नहीं है, नैतिकता नहीं है तो पतन कोई रोक सकता है क्या ?


   जितनी भी व्यक्ति जनित समस्याएं दिखती हैं वे केवल और केवल सत्य और नैतिकता की कमी से घटित हो रही हैं । और बिना धर्म बंधन में बँधे सत्य और नैतिकता से दृढ जुड़ाव नहीं हो सकता है । और न पतन रुक सकता है । यह चाहे चारित्रिक पतन हो, नैतिक पतन हो, राजनैतिक पतन हो आदि । 

 जितने भ्रष्टाचार हैं सबके मूल में सत्य और नैतिकता से दूरी है । इसलिए धर्म बंधन जरूरी है । 


धार्मिक शिक्षा, धार्मिक रुझान जरूरी है । क्योंकि धर्म रहित घर, गाँव, समाज व देश पतन के रास्ते पर जाते हैं । और भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं । चरित्र, संस्कार, सत्य, ईमानदारी आदि का लोप हो जाता है-

न्याय शांति सुख समता हित नैतिकता बहुत जरूरी है 
धर्म बंधन के बिना सत्य से बढ़ती जाती दूरी है 
मानस गीता से जीना सीखो अच्छी न इनसे दूरी है 
धर्म बिना मानव मानव न मानवता सदा अधूरी है 
                  

।। जय श्रीसीताराम ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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