सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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शनिवार, 9 मार्च 2024

अद्भुत भक्तवत्सलता- एक छोटे से वानर को राम कृपा से जीवन दान

 

रामजी की सेना में असंख्य वानर और भालू थे । सुंदर काण्ड में कहा गया है- ‘पदम अठारह यूथप बंदर’ अर्थात रामजी की सेना में सेनापतियों की संख्या ही अठारह पद्म थी । ऐसे में रामजी की सेना में वानरों और भालुओं की संख्या की गणना कर पाना असंभव ही है । इसलिए ही भगवान शंकर माता पार्वती जी से कहते हैं कि हे उमा राम जी की सेना को मैंने देखा है । लेकिन मेरी समझ से जो उनकी सेना की गणना करना चाहे तो वह मूर्ख ही कहा जाएगा । अर्थात गणना कर पाना असंभव सा है-

वानर कटक उमा मैं देखा । सो मूरख जो करन चह लेखा ।।

 

   कितनी अद्भुत बात है कि इतनी बड़ी सेना होने के बावजूद राम जी को अपने एक-एक वानर भालू की परवाह रहती है । रामजी सबका कुशल समाचार भी पूछते रहते है । ऐसी है भगवान श्रीराम की भक्तवत्सलता-

 

अस कपि एक न सेना माही । राम कुशल जेहिं पूछी नाहीं ।।

अपनी अद्भुत भक्तवत्सलता के चलते लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने अमृत वर्षा द्वारा मरे हुए वानरों और भालुओं को जीवित कर दिया । इससे भगवान राम का एक नाम ‘मृतवानरजीवनः अर्थात मरे हुए वानरों को जीवन प्रदान करने वाले’ पड़ गया ।

मरे हुए वानर-भालू जीवित होकर प्रसन्नचित्त से सबसे मिले । राम जी ने अपनी सारी सेना को निहारा और हनुमानजी से बोले हनुमान ! सेना में एक बंदर नहीं है । ऐसा क्यों है ? वह कहाँ गया ?

तब हनुमानजी बोले भगवन उस वानर को कुम्भकर्ण ने खा लिया था । यदि उसकी कोई हड्डी, बाल अथवा खाल कुछ भी बचा होता तो अमृत वर्षा से वो भी जिन्दा हो जाता । लेकिन उसके शरीर का कोई भी अवशेष बचा ही नहीं है । इसलिए वह जीवित नहीं हो सका और सेना में एक वानर कम है ।

 

राम जी को छोटे से छोटे वानर-भालू की भी परवाह है । वे उसके बिना लंका से वापस नहीं जा सकते थे । जो रामजी की सेना में सम्मिलित हुआ । रामजी की ओर से लड़ा उसे छोड़कर रामजी चले जाएँ यह रामजी को स्वीकार्य नहीं है ।

 

  अमृत वर्षा से तो वह जी नहीं सकता था । इसलिए रामजी ने यमराज की ओर देखा । यमराज भगवान श्रीराम का भाव समझ गए । यमराज ने डरते हुए उस वानर को लाकर रामजी के सम्मुख खड़ा कर दिया । धन्य हैं रामजी और उनकी भक्तवत्सलता ।

 

 । भगवान श्रीराम की भक्तवत्सलता की जय 

रविवार, 20 अगस्त 2023

जय रघुनाथ दीनजन बंधू प्रनतकलपतरु करुनासिंधू

     ।। श्रीरामभद्राय नमः ।।


जय रघुनाथ दीनजन बंधू । 

प्रनतकलपतरु करुनासिंधू ।।


आरतपाल शील गुन धारी  । 

जय रघुवीर दीन दुख हारी ।।


महोदार बहु दीन निवाजे । 

गीध निषाद आदि कपि राजे ।।


दीन मलीन प्रीति अधिकाई ।  

सुर मुनि साधु कहत गुन गाई ।।


असरन सरन राम रघुराई । 

राखत सरन देत प्रभुताई ।।


दीन मलीन हीन जग मोते । 

रामचंद्र बल जीवत तेते ।।


मोरे राम हनुमान सहाई । 

नहि बल और न हाथ उपाई ।।


रामदूत हनुमान गोसाईं । 

लाज रखो कपिराज बचाई ।।


दीन संतोष समुझि प्रभुताई । 

कपिवर रघुवर होउ सहाई ।।

 

 

।। जय श्रीराम ।।


मंगलवार, 4 जुलाई 2023

हनुमानजी द्वारा माता सीता की स्तुति

 

हनुमानजी द्वारा रामेश्वरम में की गई भगवान श्रीराम की स्तुति पहले पोस्ट की जा चुकी है श्रीराम स्तुति । यहाँ हनुमानजी द्वारा रामेश्वरम में की गई माता सीता की स्तुति दी जा रही है ।

 

करुनानानिधन भगवान श्रीरामचंद्र जी की स्तुति करके वायुपुत्र हनुमानजी भक्तियुक्त चित्त से माता सीता की स्तुति करते हुए बोले- जनकनन्दिनी ! (मैं) आपको नमस्कार करता हूँ । आप सब पापों का नाश तथा दारिद्रय का संहार करने वाली हैं ।

 

  भक्तों को अभीष्ट वस्तु देने वाली भी आप ही हैं । राघवेन्द्र श्रीराम को आनंद प्रदान करनेवाली विदेहराज जनक की लाडिली श्रीकिशोरी जी को मैं प्रणाम करता हूँ । आप पृथ्वी की कन्या और विद्या स्वरूप हैं । कल्याणमयी प्रकृति भी आप ही हैं । रावण के ऐश्वर्य का संहार तथा भक्तों के अभीष्ट का दान करने वाली सरस्वती रूपा भगवती सीता को मैं नमस्कार करता हूँ ।

 

 पतिव्रताओं में अग्रगण्य आप श्रीजनकदुलारी को मैं प्रणाम करता हूँ । आप सबपर अनुग्रह करने वाली समृद्धि, पापरहित और श्रीविष्णु प्रिया लक्ष्मी हैं । आपही आत्मविद्या, वेदत्रयी तथा पार्वती स्वरूपा हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ ।

 

  आपही क्षीरसागर की कन्या और चन्द्रमा की भगिनी कल्याणमयी महालक्ष्मी हैं जो भक्तों पर कृपा प्रसाद का अनुग्रह करने के लिए सदा उत्सुक रहती हैं । आप सर्वांगसुन्दरी सीता को मैं प्रणाम करता हूँ । आप धर्म का आश्रय और करुणामयी वेदमाता गायित्री हैं, आपको मैं प्रणाम करता हूँ । आपका कमलवन में निवास है, आप ही हाथ में कमल धारण करने वाली तथा भगवान विष्णु के वक्षः स्थल में निवास करने वाली लक्ष्मी हैं । चन्द्रमण्डल में भी आपका निवास है, आप चन्द्रमुखी सीता देवी को मैं नमस्कार करता हूँ ।

 

आप श्रीराघुनन्दन की आह्लादमयी शक्ति हैं, कल्याणमयी सिद्धि हैं और कल्याणकारिणी सती हैं । श्रीरामचंद्र जी की परम प्रियतमा जगदंबा जानकी को मैं प्रणाम करता हूँ । सर्वांग सुन्दरी (माता) सीता का मैं अपने ह्रदय में सदैव चिंतन करता हूँ ।

 

।। माता सीता की जय ।।

 

बुधवार, 5 अप्रैल 2023

श्रीशंकरजी और श्रीहनुमानजी का श्रीराम प्रेम- रूद्र देंह तजि नेह बस, वानर भे हनुमान

 

भगवान एक हैं लेकिन भगवान के अनंत स्वरूप हैं । भगवान के अनेकों अवतार हैं । और शंकरजी को भगवान बहुत प्रिय हैं । लेकिन शंकरजी का भगवान श्रीराम से जो प्रेम है वह निराला है । ऐसा प्रेम शंकरजी का भगवान के दूसरे रूप अथवा अवतार से देखने को नहीं मिलता है । इस तथ्य को इस लेख में प्रकाशित किया गया है ।

 

 भगवान के हर अवतार में शंकरजी भगवान का दर्शन करने आते हैं । और भगवान की लीला देखने भी आते हैं अथवा देखते हैं । और कभी-कभी लीला में एक पात्र के रूप में सम्मिलत भी होते हैं ।

 

  उदाहरण के लिए भगवान श्रीकृष्ण की लीला में भगवान शंकर कई बार एक पात्र के रूप में आए हैं । जैसे वाणासुर की ओर से भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध करने के लिए आना । अथवा वृंदावन में रासलीला के समय गोपी रूप में आना । आदि ।

 

 इसी तरह श्रीनृसिंहा अवतार में हिरण्यकश्यप के वध के बाद शंकर जी आए और भगवान का क्रोध शांत करने के लिए सिंह शार्दूल का रूप धरकर नृसिंह भगवान से युद्ध भी किया ।

 

 लेकिन भगवान श्रीराम के अवतार के समय जहाँ एक ओर भगवान शंकर जी स्वयं तो आते ही थे । जैसे जन्म के समय, रण लीला के समय, बार-बार स्तुति करने के लिए आदि । वहीं दूसरी ओर एक रूप से-हनुमान जी बनकर सदा राम जी के पास रहते थे ।

 

  भगवान श्रीराम की सेवा के लिए, उनके साथ रहने के लिए, उनका सेवक बनने के लिए शंकरजी स्वयं वानर बन गए । सेवक ही बनना था । तो मनुष्य रूप में भी सेवक बना जा सकता था । लेकिन शंकर जी ने सोचा कि जब हमारे स्वामी ही मनुष्य रूप में हैं तो हम मनुष्येत्तर योनि अर्थात वानर बनकर सेवा करेंगे । स्वामी से सेवक की कक्षा छोटी होनी चाहिए । इसलिए मनुष्य से छोटी योनि अर्थात वानर योनि में- श्री हनुमान जी बनकर शंकरजी भगवान श्रीराम की सेवा में आ गए ।

 

  हनुमानजी राम जी के ऐसे सेवक बने, ऐसी सेवा की जिसकी उपमा भूत और भविष्य में किसी से भी नहीं दी जा सकती है । हनुमानजी रामजी के अनुपमेय सेवक हैं । और हनुमानजी ने रामजी की अनुपमेय सेवा भी की है ।

 

  हनुमानजी का सर्वस्व है- रामजी की रूप माधुरी । हनुमानजी को भगवान श्रीराम के मुखकमल का दर्शन करने में बड़ा सुख मिलता है । हनुमानजी रामजी के मुखकमल को निहारते ही रहते हैं ।

 

हनुमानजी की सेवा, हनुमानजी का समर्पण सब कुछ अद्वितीय है । धन्य हैं हनुमानजी जो केवल रामजी के लिए ही जीते हैं । धन्य हैं भगवान शंकर जिनको भगवान श्रीराम से इतना प्रेम है । जो अपनी कक्षा से उतरकर प्रेम बस मनुष्य की कक्षा से नीचे वानर बनकर दिन-रात भगवान श्रीराम की सेवा में रहते हैं-

 

  जेहिं शरीर रति राम से, सो आदरहिं सुजान ।

   रूद्र देंह तजि नेह बस, वानर भे हनुमान ।।

 

।। जय श्रीहनुमान ।।

 

 

 

 

 

सोमवार, 3 अप्रैल 2023

हनुमानजी द्वारा भगवान श्रीराम की स्तुति

 

बालुकामय शिव लिंग को उखाड़ने के प्रयास में जब हनुमानजी गिरकर मूर्छित हो गए तो राम जी हनुमानजी का सिर अपनी गोदी में रखकर विलाप करते हुए हनुमानजी का मुख देखते हुए रो रहे थे । भगवान श्रीराम के कमलनयनों के जल से हनुमानजी का मुख भीग गया । तब हनुमानजी को धीरे-धीरे चेतना लौटी । रामजी ने हनुमानजी को ह्रदय से लगाया । हनुमानजी ने दण्ड के समान लेटकर भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया और फिर खड़े होकर हाथ जोड़े गदगद कंठ से भगवान श्रीराम की स्तुति करने लगे –

 

नमो रामाय हरये विष्णवे प्रभविष्णवे 

आदिदेवाय देवाय पुराणाय  गदाभृते 


सबकी अर्थात चर-अचर संपूर्ण व्रह्मांड की उत्पत्ति के आदि कारण, सर्वव्यापी, श्रीहरि स्वरूप श्रीरामचंद्र जी को नमस्कार है । आदिदेव, पुराणपुरुष भगवान गदाधर को नमस्कार है । पुष्पक के आसन पर नित्य विराजमान होने वाले महात्मा श्रीरघुनाथ जी को नमस्कार है । प्रभो ! हर्ष से भरे हुए वानरों का समुदाय आपके युगल चरणारविन्दों की सेवा करता है, आपको नमस्कार है । राक्षसों के राजा रावण को पीस डालने वाले तथा संपूर्ण जगत का अभीष्ट सिद्ध करने वाले श्रीरामचंद्रजी को नमस्कार है । आपके सहस्त्रों मस्तक, सहस्त्रों चरण और सहस्त्रों नेत्र हैं, आप विशुद्ध विष्णु स्वरूप राघवेंद्र को नमस्कार है । आप भक्तों की पीड़ा दूर करने वाले तथा सीता के प्राणवल्लभ हैं, आपको नमस्कार है ।


दैत्यराज हिरण्यकशिपु के वक्षः स्थल को विदीर्ण करने वाले आप नृसिंहरूप धारी भगवान विष्णु को नमस्कार है । अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठाने वाले भगवान वराह ! आपको नमस्कार है । बलि के यज्ञ को भंग करने वाले भगवान त्रिविक्रम को नमस्कार है । वामनरूपधारी भगवान को नमस्कार है । अपनी पीठ पर महान मंदराचल धारण करने वाले भगवान कच्छप को नमस्कार है । तीनों वेदों की रक्षा करने वाले मत्स्यरूप धारी भगवान को नमस्कार है ।

 

 क्षत्रियों का अंत करने वाले परशुराम रूपी राम को नमस्कार है । राक्षसों का नास करने वाले आपको नमस्कार है । राघवेंद्र का रूप धारण करने वाले आपको नमस्कार है । महादेवजी के महान भयंकर महाधनुष को भंग करने वाले आपको नमस्कार है । क्षत्रियों का अंत करने वाले क्रूर परशुराम को भी त्रास देने वाले आपको नमस्कार है । भगवन ! आप अहिल्या का संताप और महादेवजी का चाप हरने वाले हैं, आपको नमस्कार है । दस हजार हाथियों का बल रखने वाली ताड़का के शरीर का अंत करने वाले आपको नमस्कार है । पत्थर के समान कठोर और चौड़ी बाली की छाती  छेद डालने वाले आपको नमस्कार है । आप मायामय मृग का नाश करने वाले तथा अज्ञान हर लेने वाले हैं, आपको नमस्कार है ।

 

  दशरथजी के दुख रूपी समुंद्र को शोष लेने के लिए आप मूर्तिमान अगस्त्य हैं, आपको नमस्कार है । अनंत उत्तालतरंगों से उद्वेलित समुद्र का भी दर्प दलन करने वाले आपको नमस्कार है । मिथलेशनंदिनी सीता के ह्रदयकमल को विकसित करने वाले सूर्यरूप आप लोकसाक्षी श्रीहरि को नमस्कार है । हरे ! आप राजाओं के भी राजा और जानकी के प्राणवल्लभ हैं, आपको नमस्कार है । कमलनयन ! आपही तारक ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है । आपही योगियों के मन में रमने वाले राम हैं । राम होते हुए चन्द्रमा के समान आह्लाद प्रदान करने के कारण रामचंद्र हैं । सबसे श्रेष्ठ और सुखस्वरूप हैं । आप विश्वामित्रजी के प्रिय हैं, खर नामक राक्षस का ह्रदय विदीर्ण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है । भक्तों को अभयदान देने वाले देवदेवेश्वर ! प्रसन्न होइये । करुणासिन्धु श्रीरामचंद्र आपको नमस्कार है । मेरी रक्षा कीजिए । वेद वाणी के भी अगोचर राघवेंद्र ! मेरी रक्षा कीजिए ।

 

प्रसीद देवदेवेश भक्तानामभयप्रद 

रक्ष मां करुणासिंधो रामचंद्र नमोऽस्तु ते 

रक्ष मां वेदवचसामप्यगोचर राघव 

पाहि मां कृपया राम शरणं त्वामुपैप्यहम् 


  श्रीराम कृपा करके मुझे उबारिये । मैं आपकी शरण में आया हूँ । रघुवीर ! मेरे महान मोह को इस समय दूर कीजिए । रघुनंदन ! स्नान, आचमन, भोजन, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि सभी क्रियाओं और सभी अवस्थाओं में आप मेरी रक्षा कीजिए । तीनों लोकों में कौन ऐसा है, जो आपकी महिमा का वर्णन या स्तवन करने में समर्थ हो सकता है । रघुकुल को आनंदित करने वाले श्रीराम ! आपही अपनी महिमा को जानते हैं ।

 

 महिमानं तव स्तोतुं कः समर्थो जगत्त्रये 

  त्वमेव त्वन्महत्वं वै जानासि रघुनन्दन 


इस प्रकार अंजनानंदन हनुमानजी ने करुणामूर्ति श्रीरघुनाथ जी की स्तुति किया । यह स्कंद पुराण के अंतर्गत श्रीहनुमानजी द्वारा की गई भगवान श्रीराम की स्तुति है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

भगवान श्रीराम की एक अद्भुत लीला- हनुमान जी के लिए रामजी का विलाप

 रामजी की लीला बड़ी अद्भुत है । रामजी जैसा त्यागी, वैरागी और योगी कोई नहीं है । फिर भी रामजी लीला में रोने में भी संकोच नहीं करते । सीता हरण हो जाने पर रामजी ने विलाप किया । लंका में लक्ष्मण जी के मूर्छित हो जाने पर विलाप किया । इतना ही नहीं जब वन में भगवान राम अयोध्या जी की व अयोध्यावासियों की याद करते थे तो आँखों में आँसू ले आते थे । दशरथजी की मृत्यु का समाचार सुनकर भी रामजी की आँखों में आँसू आ गए थे । रामजी तब भी रोये थे ।

 

   एक बार रामजी ने हनुमानजी के लिए भी बहुत विलाप किया था । कथा इस प्रकार है । कल्प भेद से यह कथा थोड़ा अलग भी मिलती है । स्कंदपुराण के अनुसार रामेश्वरम में शिव लिंग की स्थापना के लिए हनुमानजी को रामजी ने काशी से शिव लिंग लाने के लिए भेजा ।

 

  हनुमानजी ने तपस्या से भगवान शंकर को प्रसन्न करके उनसे शिवलिंग प्राप्त किया । और जब आए तो देखा कि भगवान श्रीराम जानकी जी के हाथ से बनाए गए बालू के शिव लिंग की स्थापना कर चुके हैं ।

 

  हनुमानजी ने सोचा कि जब रामजी को इस शरीर की सेवा ही स्वीकार नहीं है तो इसे रखकर क्या होगा ? ऐसा सोचकर हनुमानजी प्राण त्याग करके के लिए प्रस्तुत हो गए ।

 

रामजी ने हनुमानजी को बहुत समझाया । वैराग्य का उपदेश भी किया । लेकिन जब हनुमानजी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा तो रामजी ने कहा हनुमान ! यदि तुम मेरे द्वारा स्थापित शिवलिंग को उखाड़ दो तो मैं वहाँ तुम्हारे द्वारा लाए इस शिवलिंग की स्थापना कर दूँगा ।

 

हनुमानजी प्रसन्न हो गए । उन्हें लगा कि बालू से बने शिवलिंग को उखाड़ देने में क्या कठिनाई है । हनुमानजी उसे उखाड़ने लगे । पहले एक हाथ लगाया । फिर दोनों हाथ और जब शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ तो पूँछ से लपेटकर अपनी पूरी शक्ति लगाकर उखाड़ने लगे । लेकिन वह बालू का शिव लिंग सीताजी और रामजी के हाथ का स्पर्श पाकर व्रज तुल्य हो गया था । हनुमान जी की पूँछ खिसक गई और हनुमानजी मुख के बल बहुत दूर गिरे । हनुमानजी को इतनी चोट आई कि मुख से रक्त निकलने लगा और वे मूर्छित हो गए ।

 

  हनुमानजी की मूर्छा टूट नहीं रही थी । उनको इस प्रकार मरणासन्न देखकर रामजी व्याकुल हो गए और विलाप करने लगे ।

 

  रामजी विलाप करते-करते हनुमानजी का पंपा सरोवर के पास मिलने से लेकर एक-एक लीला को याद कर रहे थे और बोलते जा रहे थे कि हनुमानजी ने कैसे और क्या-क्या रामजी के लिए किया । सुग्रीव से मित्रता कराना, सुरसा को जीतना, सिंहिका का वध करना आदि । लंका में हनुमानजी का पराक्रम, अशोक वाटिका उजाड़ना, अक्ष कुमार का वध करना , लंका दहन करना आदि ।

 

  रामजी ने कहा कि तुमसे मिलकर मैं अपने पिता का, भाइयों का और माता कौसल्या का भी स्मरण नहीं करता था ।

 

वायुपुत्र यदि तुम मर गए हो तो मैं भी यहीं प्राण त्याग करूँगा । वत्स हनुमान यदि तुम मर चुके हो तो तुम्हारे बिना मुझे सीता का क्या करना है अथवा छोटे भाई लक्ष्मण से ही क्या प्रयोजन है ? भरत से शत्रुघ्न से , राज्य लक्ष्मी से भी मुझे कोई काम नहीं है ।

 

वत्स हनुमान उठो ! आज पृथ्वी पर क्यों सो रहे हो ? वानरश्रेष्ठ मेंरे लिए सोने के लिए शय्या बिछाओ । मेरे भोजन के लिए कंद-मूल फल ले आओ । मैं इस समय स्नान करने जाना चाहता हूँ जल्दी कलश लेकर आओ । मेरे लिए मृगचर्म, वस्त्र तथा कुश लाओ । वानरोत्तम जब मैं लक्ष्मण के साथ नागपाश  से युद्ध में बँध गया था तब तुमने ही मुझे छुड़ाया था । संजीवनी औषधि लाकर तुम्हीं ने लक्ष्मण को प्राण दान दिया और तुम्हीं ने रावण के गर्व को नष्ट किया है । युद्ध में तुम्हारी सहायता से ही मैंने रावणादि राक्षसों को मारकर सीता को प्राप्त किया ।


 हनुमान ! अंजनानंदन ! सीताशोकविनाशन ! इस प्रकार लक्ष्मणको, सीताको और मुझे अयोध्या पहुँचाए बिना किसलिए तुम चले गए ? महावीर ! राक्षसकंटक ! तुम कहाँ गए ?

 

इस प्रकार विलाप करते हुए रामजी हनुमानजी के मुख को देखते हुए रो रहे थे । भगवान श्रीराम के कमलनयनों के जल से हनुमानजी का मुख भीग गया । तब हनुमानजी को धीरे-धीरे चेतना लौटी । रामजी ने हनुमानजी को ह्रदय से लगाया ।

 

  इसके बाद हनुमानजी ने भगवान राम की बहुत अद्भुत और सुंदर स्तुति किया । फिर माता सीता जी की भी बहुत सुंदर स्तुति किया । इन दोनों स्तुतियों का नित्य पाठ करने का बड़ा महात्म्य है ।

 

 फिर भगवान राम के आदेश से हनुमानजी ने अपने द्वारा लाए हुए शिवलिंग का रामेश्वर शिवलिंग से थोड़ी दूरी पर स्थापना किया । भगवान श्रीराम ने कहा कि इन हनुमदीश्वर के दर्शन के बिना रामेश्वर दर्शन का फल नहीं होगा । इस लीला से जुड़ी कुछ बातें आगे पोस्ट की जाएँगी 


।। जय श्रीराम ।।

रविवार, 20 नवंबर 2022

श्रीकष्टभंजन देव हनुमानजी- जय जय जय कष्टभंजन हनुमान

भारत के गुजरात राज्य के बोटाद नामक जनपद में सारंगपुर नामक स्थान है । जिसे सालंगपुर भी कहा जाता है । यहाँ पर हनुमानजी महाराज ‘श्रीकष्टभंजन देव हनुमानजी’ के रूप में बिराजते है । यहाँ पर दूर-दूर से लोग श्रीकष्टभंजन देव के दर्शन और कष्ट से मुक्ति पाने के लिए आते हैं ।

  यहाँ पहुँचना बहुत आसान है । अहमदबाद से लगभग १७५ किलोमीटर की दूरी पर अहमदाबाद-भावनगर मार्ग पर सारंगपुर स्थित है । बोटाद से यह स्थान लगभग १५ किमी दूर है । बोटाद से सारंगपुर रात्रि में जाने पर रास्ता थोड़ा सुनसान पड़ता है । 

   अहमदाबाद से बस द्वारा तीन-चार घंटे में सारंगपुर पहुँचा जा सकता है । मंदिर के गेट पर ही बस दर्शनार्थियों को उतार देती है ।

  मंदिर कम्पाउंड के भीतर मंदिर के पास ही रहने-ठहरने के लिए उचित व्यवस्था है ।  एसी और नॉन एसी रूम उपलब्ध हैं । एक बहुत बड़ी भोजनशाला भी है । जहाँ सबको फ्री भोजन मिलता है । एक साथ कई सौ लोग भोजन करते हैं 


मंदिर प्रांगण में एक अच्छी कैंटीन भी है । जहाँ पेमेंट करके भोजन आदि प्राप्त किया जा सकता है । 

 

मंदिर प्रागंण बड़ा विस्तृत और सुंदर है । यहाँ का वातावरण दिव्य और शांत है । श्रीकष्टभंजन देव का दिव्य मंदिर दर्शनीय है । श्रीकष्टभंजन देव का दर्शन करके सुख प्राप्त होता है । सुबह की आरती का दर्शन भी करना चाहिए । मंगलवार और शनिवार को भीड़ अधिक होती है । बाकी दिनों में भी अनेकों लोग रोज दर्शन के लिए आते हैं-


जय जय जय कष्टभंजन हनुमान ।

क्रूर ग्रह भूतादि नियंता समरथ कृपानिधान ।।१।।

रामदूत सुंदर सब लायक महाबीर बलवान ।

हरि हर विधि सुनि गुन सुख पावत राम प्रेम धनवान ।२

महिमा अमित पार कोउ पावै सकै न कोई जान 

चारों युग प्रगट जश जागै तिहुँ पुर होत बखान ।।३।।

अंजना सुवन केसरीनंदन देत विमल मति ज्ञान ।

दुर्जन को जिमि काल कहावत राखत जन मन आन ।४

दिन प्रति लोग दरश हित आवत मन महुँ लिए अरमान ।

रोग दोष दुख सोच मिटावत जन हित परम सुजान ।।५

राम चरण अविरल रति दायक भवसागर जलजान 

दीन संतोष पवनसुत रीझे रीझत श्रीभगवान ।।६।।

 

 कष्टभंजन देव की जय   

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

जय हनुमान जय जय हनुमान

 । श्रीहनुमते नमः 


जय हनुमान जय जय हनुमान ।

विद्या बुधि बल ज्ञान निधान ।।१।।

रामदूत जय पवनकुमार ।

मेटत मोह लोभ मद मार ।।२।।

महावीर जय जय वज्रांग ।

राम प्रेम पूरित सर्वांग ।।३।।

संकटमोचन जय जन रक्षक ।

सिधि निधि दायक कालहु भक्षक ।।४।।

जय गिरिधारी केसरीनंदन ।

मंगल मूल अमंगल गंजन ।।५।।

जय श्रीराम चरन रति दायक 

साधु संत जन दीन सहायक ।६

अंजना सुवन जय जय जन रंजन ।

दीन संतोष भगत भय भंजन ।।७।।


।। भगत भयहारी हनुमानजी महाराज की जय ।।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

अंजनानंदन रामदूत महावीर हनुमानजी का संकटमोचन नाम और जस सारे जग में प्रसिद्ध है

 ।। श्री हनुमते नमः ।।

महावीर हनुमान, अंजना को जायो है

सुमिरे हरनहार, पीर परायो है ।1

पवनपूत रामदूत, ज हित भायो है ।

सुर नर मुनि सब, गुन गन गायो है ।।2

राम नाम कथा रूचि, राममय कायो है ।

मानहुँ तनु धरि, राम प्रेम आयो है ।।3

सबकी बनावैं राम, काज बनायो है ।

देवन के बड़े काज, महावीर आयो है ।।4

कोटि गरीब राखे, उजरे बसायो है ।

संतोष गरीब मोहि, निपट भुलायो है ।।5

कौन सो काज जो न, जात बनायो है ।

रोग दोष दुख कौन, जात न भगायो है ।।6

सब बिधि दीन हीन, तरस न आयो है ।

संकटमोचन नाम,  जग छायो है ।।7

 

।। संकटमोचन रामदूत महावीर हनुमानजी की जय ।।

सोमवार, 20 जून 2022

प्रद्युम्न और अर्जुन का नल-नील के वंशजो से युद्ध और हनुमानजी की सहायता से विजय

एक बार द्वारिकापुरी में अश्वमेध यज्ञ का आयोजन होना था । इसके पहले प्रद्युम्न जी दिग्विजय के लिए निकले । प्रद्युम्न जी भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र हैं और भगवान के अवतार हैं । श्रीकृष्णावतार के चतुर्व्यूह स्वरूप में इनकी गणना होती है ।

 

 दिग्विजय करते हुए प्रद्युम्न जी एक नगर में पहुँचे जहाँ नल-नील के वंशजों का राज्य था । बड़े-बड़े बानर बीर थे ।

 

 युद्ध शुरू हो गया । प्रद्युम्न जी के साथ अर्जुन जी भी थे । प्रद्युम्न जी और अर्जुन जी दोनों युद्ध कर रहे थे । लेकिन विजय का कोई संकेत नहीं था ।

 

वहाँ के बानर बीर इतने बली थे कि प्रद्युम्न और अर्जुन के रथों को अपनी पूँछ में लपेटकर पटक देते थे ।

 

 इस समय भी हनुमानजी महाराज अर्जुन के रथ के पताके में विराजमान थे । हनुमानजी पताके से निकलकर युद्ध क्षेत्र में उतर गए और अपनी पूँछ में समस्त बानरों को समेट लिया ।

 

अब बानरों को पता चला कि ये तो बजरंगबली हनुमान जी महाराज हैं । फिर क्या था युद्ध समाप्त हो गया । बानरों ने हनुमानजी, प्रद्युम्न जी और अर्जुन जी का पूजन किया । और बहुत से उपहार भेंट में दिए ।

 

  इस प्रकार प्रद्युम्न जी के दिग्विजय में हनुमान जी ने प्रद्युम्न जी और अर्जुन जी की सहायता किया था ।

 

।। बीर बजरंगबली हनुमान जी की जय ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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