सीतानाथ रघुनाथ पाप ताप हारी । द्रवउ रघुवंशमणि धनुष वाण धारी ।। -विनयावली

एको देवो रामचन्द्रो व्रतमेकं तदर्चनम । मंत्रोअप्येकश्च तत्नाम शास्त्रं तद्ध्येव तत्स्तुतिः ।। -पद्मपुराण ।


दीनबंधु तुहीं एक मोर गोहारी । देखउ रघुनाथ अब ओर हमारी ।। -विनयावली ।।

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शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

सूरदास रघुनाथ कृपानिधि श्रीमुख करत बड़ाई-अयोध्याजी की

भगवान श्रीराम को अयोध्याजी बहुत प्रिय हैं । श्रीसूरदास जी कहते हैं कि-

 

लंका से अयोध्या आते हुए पुष्पक विमान से ही हाथ उठाकर रामजी ने सुग्रीवजी को दिखाते हुए कहा कि कपिश्रेष्ठ देखो अयोध्या आ गई । राम जी ने कहा कि यहाँ पर सदा से सूर्य कुल के लोग निवास करते हैं ।

 

 यहाँ सुंदर सरोवर हैं । चारों ओर चौराहे हैं  और दर्पण के समान स्वच्छ धरती शोभायमान है । यहाँ सोने और मणि से बने हुए भवन हैं और पास में ही सुखदाई नदी सरयू जी हैं ।

 

 रामजी कहते हैं कि अयोध्याजी को छोड़कर मुझे दूसरा कोई नगर प्रिय नहीं है और सातों लोकों की ठकुराई भी पसंद नहीं हैं । यह अत्यंत बिचित्र और रमणीय तीर्थ धन्य है । वेद और पुराण इसकी महिमा को गाते हैं ।

 

 इस पुरी में बसने वाले लोग मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं । इनकी स्मृति मैं कभी नहीं भूलता । सूरदासजी कहते हैं कि कृपानिधान श्रीरघुनाथजी अपने श्रीमुख से अयोध्याजी की बड़ाई करते हैं-

 

यह तजि मोहि अवर नहिं भावै, सप्त लोक ठकुराई ।

परम बिचित्र रम्य तीरथ धन वेद पुरानन गाई ।।

यह पुर बसत प्रानहु ते प्यारे, तिन करि सुरति न जाई ।

सूरदास रघुनाथ कृपानिधि श्रीमुख करत बड़ाई ।।

 

 

।। जय श्रीरघुनाथ जी की ।।

रविवार, 17 नवंबर 2019

अयोध्याजी का प्रभाव और अयोध्या में बसने का लाभ तथा अवधबासियों पर रामजी की कृपा


वेद, पुराण, और रामायण आदि में अयोध्या नगरी की महिमा गाई गई है । लेकिन अयोध्या नगरी की महिमा आसानी से सबके समझ में नहीं आती । इतना ही नहीं अयोध्या में रहकर भी, अयोध्या में जन्म लेकर भी लोग अयोध्या की महिमा नहीं समझ पाते ।


 अयोध्या में रहकर भी हो सकता है कि कोई राम जी से जुड़कर, रामजी का बनकर न रह पाए । हो सकता है कि अयोध्या में बसकर भी न राम जी को समझे और न ही अयोध्या जी की महिमा को । और रामजी तथा अयोध्याजी की बुराई करे । आदि ।


  इतना ही नहीं हो सकता है कि अयोध्या में बसकर भी कोई काम, क्रोध, लोभ और मोह-माया के वशीभूत होकर रहे, छल-कपट में अनुरक्त रहे । अपने जीवन को धन्य न कर सके । 


 लेकिन राम जी बड़े दयालु हैं । उदार हैं । सहजकृपालु है । इसलिए जो कोई भी अयोध्या में बसता है । वह भले ही जाने-अनजाने माया-मोह में फँसा हो,  उसे किसी न किसी जन्म में राम जी कृपा प्राप्त हो जाती है । और वह राम परायण हो जाता है -

कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई । राम परायण सो परि होई ।।


केवल मनुष्य ही नहीं अयोध्या में बसने वाले अन्य जीव-जन्तु भी किसी न किसी जन्म में राम परायण हो जाते हैं ।


  अयोध्या जी की महिमा तब तक जीव के समझ में नहीं आती जब तक वह राम परायण नहीं हो जाता । जब जीव राम परायण हो जाता है तब हाथ में धनुष लेकर राम जी उसके ह्रदय में बस जाते हैं –


अवध प्रभाव जान तब प्रानी । जब उर बसहिं राम धनु पानी ।।

 
 वेद, पुराण और अन्यान्य सदग्रंथों का यही मत है ।



।। जय श्रीराम ।।


रविवार, 22 सितंबर 2019

भगवान राम का वर्णन किस-किस ग्रंथ में है- सबकुछ राममय है


कई लोग समझते, सोचते अथवा मानते हैं कि भगवान राम का वर्णन केवल रामायण और श्रीरामचरितमानस जी में हैं । लेकिन ऐसा समझना, सोचना अथवा मानना अज्ञानता है ।


 भगवान राम का वर्णन किस-किस ग्रंथ में है ? ऐसा न पूछकर पूछना चाहिए कि भगवान राम का वर्णन कहाँ नहीं है ?


 वेद-उपनिषद, पुराण, नीति ग्रंथ, स्मृति-संहिता, महाभारत, रामायण और श्रीरामचरितमानस आदि सबमें रामजी का वर्णन है ।


चार वेद हैं । वेदों की अनेक शाखाएं हैं । ऋग्वेद की इक्कीस, यजुर्वेद की एक सौ नौ , सामवेद की हजार और अथर्वेद की पचास शाखाएं हैं । और वेदों की शाखाओं के अनेक उपनिषद हैं । 


 रामरहस्योपनिषद, रामतापनीयोपनिषद, वासुदेवोपनिषद, मुद्रलोपनिषद, शांडिल्योपनिषद, पैंगलोपनिषद, भिक्षुकोपनिषद, महोपनिषद, शारीरकोपनिषद, तथा योगशिखोपनिषद में भगवान राम के व्रह्म स्वरूप की महिमा का निरूपण किया गया है ।


इसीतरह लगभग सभी पुराणों में जैसे अग्नि पुराण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, शिव पुराण, विष्णु पुराण आदि में राम जी की महिमा का वर्णन हैं । इनमें से पद्मपुराण और स्कन्दपुराण में भगवान राम की कथा और महिमा का विशेष वर्णन है ।


महाभारत में भी भगवान श्रीराम की कथा और महिमा का वर्णन है । अनेक रामायण हैं । सबमें रामजी की महिमा का वर्णन है ।


 श्रीरामचरितमानस जी में कही गई प्रत्येक बात का उल्लेख किसी न किसी ग्रंथ में है । रामरहस्योपनिषद में कहा गया है कि सभी पुराणों, स्मृतियों, वेदों, शास्त्रों, चारों विद्याओं, तथा आध्यात्मिक दर्शन का परमतत्व श्रीराम हैं । इतना ही नहीं विघ्नेश्वर गणेश, सूर्य, ईश्वर, शक्ति आदि का मूल तत्व श्रीराम हैं । इन्ही सब तथ्यों को श्रीरामचरितमानसजी में इस प्रकार कहा गया है-


वन्दौं नाम राम रघुवर को । हेतु कृशानु, भानु हिमकर को ।।
विधि, हरि हर मय वेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ।।


इस प्रकार भगवान राम की अतुलित महिमा है ।  भगवान राम सभी के लिए पूजनीय, वंदनीय और आदरणीय हैं । सभी ग्रंथों, देवी-देवताओं और चर-अचर के मूल तत्व हैं । हर जगह राम जी का ही वर्णन है । सबकुछ राममय है । रामजी के सिवा कुछ नहीं है । 

  इसलिए सभी शंकाओं को त्यागकर 'रामहि सुमिरिए गाइए रामहि । संतत सुनिए राम गुन ग्रामहि  का अनुसरण करके मानव जीवन को सार्थक करना चाहिए 


।। जय श्रीराम ।।

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

वास्तविक विद्वान और वास्तविक मूर्ख: भगवान राम की लीला और गुण का प्रभाव


वेद, उपनिषद, रामायण, पुराण आदि भगवान राम की महिमा और उनकी ईश्वरता का गायन मुक्त कंठ से करते हैं । लेकिन भगवान राम की लीला देखकर-सुनकर कई लोग धोखे में पड़ जाते हैं और उनके मन में नाना तरह की शंकाएं घर कर लेती हैं ।

            
इसलिए शंकर जी, पार्वतीजी से श्रीराम कथा सुनाते हुए कहते हैं कि ‘हे उमा राम जी के गुण, उनकी लीला बहुत गूढ़ है । जो सबके समझ में नहीं आती । रामजी की लीला को देख-सुनकर विद्वान और मुनि जन को संसार से वैराग्य और रामजी से अनुराग हो जाता हैं । और वहीं दूसरी ओर जो विशेष मूर्ख हैं उनके मन में मोह उत्पन्न हो जाता है ।


विशेष मूर्ख अथवा वास्तविक मूर्ख वे लोग होते हैं जिन्हें धर्म से प्रेम नहीं होता है । अर्थात जो धर्म-अधर्म नहीं मानते । तथा जो भगवान से विमुख होते हैं ।


 वास्तविक विद्वान वे हैं जो भगवान से बिमुख नहीं हैं । तथा जिनके धर्म और अधर्म का बिचार होता है ।


ऐसे में जो विशेष यानी वास्तविक मूर्ख हैं उन्हें रामजी की लीला और गुण को देख-सुनकर मोह हो जाता है । अर्थात वे कहने अथवा सोचने लगते हैं कि रामजी तो राजकुमार थे । भगवान नहीं थे इत्यादि । और जो वास्तविक विद्वान हैं उन्हें भगवान राम की लीला-कथा से संसार से विराग और रामजी से अनुराग हो जाता है । इसलिए ये रामजी से जुड़ जाते हैं । और वास्तविक मूर्ख रामजी से मुड़ जाते हैं ।


इस प्रकार जो रामजी से जुड़ा है वही वास्तव में विद्वान है और जो रामजी से मुड़ा है वही वास्तव में मूर्ख है ।


।। जय श्रीराम ।।

रविवार, 23 दिसंबर 2018

लाखों वर्ष पूर्व पहली सिजेरियन डिलेवरी भारत में हुई थी


आजकल ज्ञान-विज्ञान से जो संभव होता दिखाई अथवा सुनाई पड़ता है वैसा पहले भारत में किसी न किसी रूप में घटित हो चुका है । ऐसा ग्रंथों से पता चलता है ।

           
प्राचीन समय में भारत में ज्ञान-विज्ञान बहुत विकसित था । जिसका वर्णन ग्रंथों में मिलता है । बहुत से ग्रंथ आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट भी कर दिए गए हैं । इससे बहुत ज्ञान-विज्ञान नष्ट भी हो चुके हैं ।


आज लोग सिजेरियन डिलेवरी के बारे में जानते हैं । आज कल अधिकाशं डिलेवरी इसी विधि से होती है । कई लोग कहते हैं कि कुछ लोग पैसे के लोभ में सामान्य डिलेवरी को भी सिजेरियन का केस बना देते है । जब धर्म, सत्य और नैतिक मूल्य जीवन से दूर हो जाते हैं तो ऐसा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।


 पुराणों के अनुसार भारत में पहले मानसिक सृष्टि भी होती थी । इसमें बिना स्त्री के ही सृष्टि का विकास होता था । बिना पुरुष के भी संतान उत्पन्न होने की बात ग्रंथों में मिल जाती है । ऐसा आज का विज्ञान भी भविष्य में करने को सोच रहा है ।


 पुराणों के अनुसार अयोध्या के महाराजा मान्धाता का जन्म सिजेरियन बिधि से हुआ था । पेट फाड़कर सिलाई कर दी गई थी । और दोनों सुरक्षित भी रहे । इस प्रकार लाखों वर्ष पूर्व प्रथम सिजेरियन डिलेवरी भारत में ही हुई  थी ।


अभी कोई कुछ भी कहे लेकिन कलियुग का अंत आते-आते आधुनिक ज्ञान-विज्ञान नष्ट हो जाएगा और इसके बाद संपूर्ण पृथ्वी पर प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान फिर से स्थापित हो जाएगा । प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की श्रेष्ठता स्थापित हो जायेगी । और यहीं से सतयुग का आरंभ हो जाएगा ।



।। जय श्रीसीताराम ।।


शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

कल्कि भगवान-भगवान का कल्कि अवतार


सद्ग्रन्थों के अनुसार भगवान का एक प्रमुख अवतार होना अभी शेष है । यह  अवतार कलियुग के अंत में होना सुनिश्चित है । इस अवतार में भगवान कल्कि भगवान के नाम से विख्यात होंगे । जाने जाएँगे ।

         
    सनातन धर्म दुनिया का प्राचीनतम धर्म है । जब आज के अन्य कोई धर्म नहीं थे तब भी सनातन धर्म था । बाकी धर्म कलियुग में ही उत्पन्न हुए है । सतयुग, त्रेता और द्वापर में केवल सनातन धर्म ही पृथ्वी पर था । सातो द्वीपों में सनातन धर्म था । सनातन धर्म में अवतार पहले भी हुए हैं लेकिन धर्म को बचाने के लिए । सनातन धर्म सदा-सदा से चलता आ रहा है और चलता रहेगा । लेकिन जब अधर्म अधिक बढ़ जाता है तब भगवान प्रकट रूप में आते हैं ।


ऐसे ही जब कलियुग में सनातन संस्कार लोप होने लगेंगे । अधर्म का बोलबाला हो जाएगा तब भगवान संभल ग्राम में अवतार लेंगे । ये भगवान उच्चैश्रवा पर सवार होकर पापियों का वध करेंगे । लेकिन अभी इसमें समय शेष है ।


  अभी पूजा, पाठ, कथा, प्रवचन आदि बहुतायत होते हैं । सनातन संस्कार क्षीण हो रहे हैं पर विद्यमान हैं । धीरे-धीरे अधर्मी बढ़ते जाएँगे । पूजा-पाठ, कथा-प्रवचन लगभग समाप्त हो जायेंगे । उपद्रवी बढ़ जायेंगे । नाना उपद्रव करेंगे । कहीं शान्ति नहीं रहेगी । चारो तरफ त्राहि-त्राहि ही सुनाई पड़ेगी ।

 
  लोग पशुवत रहने लगेंगे । शादी-विवाह भी बंद हो जायेंगे । तब कल्कि भगवान सनातन धर्म की स्थपना करेंगे । सातो द्वीपों में सत्य सनातन धर्म की स्थापना होगी । इससे सत्य का युग आ जाएगा । अर्थात सतयुग लग जाएगा । और वर्णाश्रम धर्म की स्थपना हो जायेगी । और फिर से राजा लोग राज्य करने लगेंगे । अयोध्या राज्य का एक प्रमुख केन्द्र विंदु रहेगी । ऐसा ही पुराणों का मत है ।


।। जय श्रीराम ।।

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

हनुमानजी, अर्जुन और उद्धवको उपदेश-हनुमान जी महाराज बड़े तत्ववेत्ता हैं


हनुमानजी महाराज ज्ञानियों में अग्रगण्य हैं । हनुमान जी महाराज बड़े तत्ववेत्ता हैं । बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और संत-भक्त उनसे राम जी के रहस्यों की चर्चा करते हैं । संत-भक्त और ऋषि-मुनि हनुमानजी से राम जी और रामजी के मंत्रों के रहस्य को सुनते और जानते हैं ।

                 
इतना ही नहीं बड़े-बड़े देवता, मुनि और भक्त आदि हनुमान जी से राम मंत्र की दीक्षा ली हुई है । अर्थात बड़े-बड़े देवता, ऋषि-मुनि और भक्त हनुमानजी के शिष्य भी हैं ।



  उपनिषदों में भगवत तत्व का निरूपण किया गया है । और उपनिषदों के तत्व को स्वयं भगवान राम ने हनुमानजी को बतलाया है ।


  भगवान श्रीकृष्ण के उद्धवजी को और अर्जुन जी को दिए गए उपदेश प्रसिद्ध हैं । लोग इसके बारे में जानते हैं   द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को और अर्जुनजी को उपदेश दिया था । लेकिन लोग यह नहीं जानते हैं कि त्रेता युग में यह उपदेश भगवान श्रीराम ने हनुमानजी महाराज को पहले ही दे चुके थे । ऐसा पुराणों में वर्णन है ।


  भगवान राम से उपदेश पाकर और उपनिषदों के रहस्य को सुनकर हनुमानजी ज्ञानियों में श्रेष्ठ क्यों न होते ? 


   हनुमानजी महाराज केवल ज्ञानियों में ही अग्रगण्य नहीं हैं । वे भगवान राम के भक्तों में भी श्रेष्ठ हैं । और भगवान राम के बड़े स्नेह भाजन भी हैं ।



।। जय हनुमानजी महाराज ।।


बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

वह दिन जब लोग विवाह नहीं करेंगे- जब विवाह होना बंद हो जाएगा


सनातन धर्म में विवाह एक संस्कार है । सोलह संस्कारों में से एक है । लेकिन धर्म हानि से जैसे धीरे-धीरे एक-एक संस्कार, मान्यताएं अपना दम तोड़ रहीं हैं एक दिन विवाह जैसी पवित्र परंपरा भी अपना दम तोड़ देगी । पुराणों का ऐसा ही मत है ।


धर्म की हानि से धार्मिक मान्यताएं धीरे-धीरे क्षीण होने लगती हैं । संस्कार और परम्पराएँ अनावश्यक समझी जाने लगती हैं । लोग हँसी उड़ाने लगते हैं ।


  सनातन धर्म के अनुसार विवाह एक पवित्र बंधन है । इस बंधन से बंधकर फिर अलग नहीं हुआ जा सकता है । सनातन धर्म में विवाह के बाद स्त्री-पुरुष सदा के लिए पति-पत्नी बन जाते हैं । किसी भी कारण से अलग रहें तो भी पति-पत्नी बने रहते हैं क्योंकि यह सम्बंध अटूट माना गया है । सनातन धर्म में तलाक की कोई व्यस्वथा नहीं है ।


  लेकिन धीरे-धीरे लोग भगवान में अविश्वास करने लगे । संतों और ग्रंथों की बातों की उपेक्षा करने लगे । इससे मनमाना होने लगा । लोग विवाह करके अलग भी रहने लगे । जिसे तलाक कहा जाने लगा । इतना ही नहीं लिव इन रिलेशन का कांसेप्ट आया जिसमें बिना विवाह किए भी लोग पति-पत्नी की तरह रहने लगे । अभी यह सब आगे आने वाली बड़ी घटना की बानगी मात्र हैं ।


  धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आ जाएगा कि लोग इतने आधुनिक हो जाएँगे कि विवाह को बिना मतलब और फालतू समझने लगेंगे । जो लोग विवाह नहीं करेंगे वे ज्यादा श्रेष्ठ समझे जाएँगे । विवाह स्वतंत्रता में- स्वतंत्र जीवन में बाधक समझा जाने लगेगा ।


  मनुष्य की स्थिति भी कुछ भेंड़ जैसी ही है । एक को पुरानी परंपरा-रीति-रिवाज को तोड़ते, धर्म विरुद्ध आचरण करते देख और लोग भी कूद पड़ते हैं । कौन अपने को पिछड़ा कहलवाये ? इसलिए आधुनिक और समझदार कहे जाने के लिए लोग आगे आते हैं और भेंड़ बन जाते हैं ।


  ऐसा ही एक दिन आगे आएगा जब विवाह करने वाले लोग पिछड़े और पुरानी मान्यताओं को मानने वाले माने जायेंगे । बस देखते ही देखते इस पुरातन परंपरा का अंत हो जाएगा । और विवाह नहीं होंगे । ऐसी स्थिति में सब पशुवत रहने लगेंगे । 


  पुराणों में ऐसा संकेत मिलता है । अभी से कई लोग विवाह को स्वतंत्रता में बाधक मानने लगे हैं । और इसे अनावश्यक कहने लगे हैं । धीरे-धीरे और लोग इस मुहिम से जुड़ते जाएँगे । और परम आधुनिक बन जाएँगे । यदि यही आधुनिकता है तो लोग पीछे क्यों रहेंगे । कलियुग जो न करा ले वही कम है-

रामदास कलिकाल में, मति सबकी गय रूठ  । 
ठूठे को समुझत हरा, हरे पेड़ को ठूठ  । 

पहले का कहते गलत, अब आया नवचार 
दिशा बिना है दुर्दशा, खोजि रहे उपचार 

अंकुश नहि जब धर्म का, नहीं नीति का मान  । 
रामदास वन पशु सरिस, कहैं कहाँ भगवान । 



।। जय श्रीसीताराम ।।

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

गोस्वामी तुलसीदासजी का अंतिम (श्रीरामधाम पयान करते समय का) उपदेश


गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज भारतीय सनातन धर्मी संत परंपरा रुपी आकाश में उदित ऐसे सूर्य हैं जिनके ज्ञान और विचार रुपी प्रकाश से सनातन धर्म और धर्मी अनंत काल तक प्रकाशित होते रहेंगे


  गोस्वामीजी बिना किसी लाग-लपेट के सीधी बात बोलते और बताते थे । यह उनकी सरलता थी । ज्ञान था । अनुभव था । सनातन धर्म के मरम को उन्होंने भली भाँति समझ लिया था । इसलिए उनके उपदेश गुमराह करने वाले नहीं बल्कि राह दिखाने वाले हैं । भटकाने वाले नहीं हैं बल्कि भटके हुए जीवों को राम जी से जोड़ने और मिलाने वाले हैं ।


  गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज जैसे संत और उनके द्वादश ग्रंथों जैसे ग्रंथ पाकर यदि सनातन धर्मी भटकें, गुमराह हों और यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ तरने का उपाय खोजें तो यह दुर्भाग्य ही है । इससे ज्यादा और क्या कहा जा सकता है ?


  गोस्वामीजी का जब श्रीरामधाम जाने का समय आ गया तो गोस्वामी जी, जो कुछेक प्रेमी-भक्त वहाँ थे, उनसे कहा कि भगवान श्रीरामचंद्रजी की यश-गाथा का वर्णन करके यह तुलसीदास अब मौन होना चाहता है । अब मेरे मुँख में जल्दी से तुलसीदल दे दीजिए । गोस्वामीजी तो मौन हो रहे थे और संसारिक दृष्टि से मौन भी हो गए । लेकिन उनके ग्रंथ मौन नहीं हुए हैं । उनके ग्रंथ संतों और प्रेमी भक्तों को सदराह दिखा रहे हैं और आगे भी दिखाते रहेंगे । श्रीरामधाम में आज भी तुलसीदासजी विराजते हैं ।


  प्रेमी-भक्त जन थोड़ा अधीर हुए और गोस्वामीजी से कहा कि आप तो जा रहे हैं हम लोगों के लिए सार रूप में क्या उपदेश है । जिससे सहज ही कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो ।


तब गोस्वामीजी ने कहा कि जीव के लिए संसार में थोड़ा समय होता है । जिसमें ऊपर से अनके निकृष्ट सोच-चिंताएं घेरे रहती हैं । करने के लिए भी बहुत कुछ होता है । क्या-क्या करें ? ग्रंथों का अंत नहीं है । कविता की अनेकों कलाएं हैं जिनके रसीले राग हैं लेकिन कितना पढ़ा जाय और कितने का रसास्वादन किया जाय ? वेदों का कोई पार नहीं है और पुराणों के भी कई भेद हैं । इसके अलावा संतों के नाना उपदेश-वाणियाँ हैं । किसी ने कुछ कहा है तो किसी ने कुछ और कहा है । ऐसे में किस-किस को चित में धारण किया जाय । अर्थात नाना ग्रंथ, नाना मत हैं और नाना रास्ते हैं ? ऐसे में क्या-क्या किया जाय ? इसलिए यह तुलसीदास लाखन में एक बात बताकर जा रहा है कि यदि जीवन सुधारना चाहते हो तो राम नाम लीजिए-


अलप तो अवधि तामें जीव बहु सोच पोच


            करिबे को बहुत है कहा-कहा कीजिए ।


ग्रंथन को अंत नाहिं काब्य की कला अनंत


             राग है रसीलो रस कहाँ-कहाँ पीजिए ।।


वेदन को पार न पुरानन को भेद बहु


             वाणी है अनेक चित कहाँ-कहाँ दीजिए ।


लाखन में एक बात तुलसी बताए जात


             जन्म जो सुधारा चाहो रामनाम लीजिए ।।



।। जय श्रीसीताराम ।।



मंगलवार, 11 सितंबर 2018

श्रीराम सहस्त्र नाम महिमा और श्रीगणेशजी के बचपन की उदंडता


श्रीविष्णु सहस्त्र नाम, श्रीशिव सहश्त्र नाम आदि के बारे में सबने सुना ही होगा । इसी तरह श्रीराम सहश्त्र नाम भी है । जैसे राम नाम की अतुलित महिमा है । वैसे ही राम जी के सहश्त्र नाम की भी बड़ी महिमा है । केवल एक राम नाम की महिमा ग्रंथों और संतों ने श्रीविष्णु सहश्त्र नाम के समान बताई है । ऐसे में श्रीराम सहश्त्र नाम की महिमा जितनी कही जाय उतनी कम है ।


  पुराणों में कथा आती है कि बचपन में श्रीगणेशजी बड़े उदंड थे । श्रीराम सहस्त्र नाम के प्रभाव से ये मंगलमूर्ति गणेश हो गए ।


  इनकी उदंडता बढ़ती ही जा रही थी । और हद तो तब हो गई जब गणेश जी ने एक साथ कई ऋषियों का वध कर दिया । इससे परेशान होकर भगवान शंकर जी ने भगवान श्रीराम का ध्यान किया । भगवान राम ने प्रकट होकर श्रीराम सहश्त्र नाम का पाठ करने को कहा ।


  इससे धीरे-धीरे गणेशजी मंगलमूर्ति हो गए । और प्रथम पूज्य भी हो गए । इस प्रकार श्रीराम सहश्त्र नाम बड़ा ही मंगलकारी है । बड़ी महिमा है । साथ ही बालकों की बढ़ी हुई उदंडता को छुड़ाकर उनको सही मार्ग पर लगाने वाला है । संस्कारी बनाने वाला है । सबका कल्याण करने वाला है ।


 
।। जय श्रीसीताराम ।।



बुधवार, 29 अगस्त 2018

गुरजन से प्रश्न और उनका अपमान: सनातन धर्म में प्रश्न और संवाद की महत्ता को कम करना बहुत गलत परंपरा है

अपने अधिकांश ग्रंथ पूछे गए प्रश्नों के उत्तर ही हैं । संवाद के रूप में हैं । रामायण और पुराण आदि संवाद ही तो हैं । प्रश्नों के उत्तर ही हैं । लेकिन आजकल संवाद और प्रश्न की परंपरा लगभग लुप्त होती जा रही है ।



मैंने कई बार कहा है कि सनातन धर्म के मूल सिद्धांत वैज्ञानिक हैं । गणतीय हैं । यह मेरा अनुभव है । और मैंने कई बार कई उदाहरणों से इसे स्पष्ट करने का भी प्रयास किया है । मेरा यह मानना और कहना है, और कई बार कह भी चुके हैं कि गणित और विज्ञान की जानकारी होने से सनातन धर्म को और अच्छी तरह से समझा जा सकता है । कई बार ऐसा भी बोल देता हूँ कि यदि किसी को गणित ठीक से समझ में आ जाये तो उसे भगवान समझ में आ जाएँगे । और अपने यहाँ तो गणित और विज्ञान आरंभ से ही धर्म-वेद के विशिष्ट अंग रहे हैं । सनातन धर्म में आयुर्विज्ञान और गणित आदि मूल धर्म ग्रंथ के भाग हैं । अन्यत्र ऐसा मैंने नहीं सुना है ।



  शास्त्रों में कहा गया है कि गुरजनों की सेवा प्रश्नों से करनी चाहिए । आजकल बताया जाता है कि गुरु से प्रश्न नहीं करना चाहिए । प्रश्न गुरजन से नहीं करेंगे तो किससे करेंगे ? और बिना प्रश्न के विकास कैसे होगा ? ज्ञान का प्रकाश कैसे होगा ?




आजके समय में प्रश्न करना गुरु की अवमानना समझा और समझाया जाता है । जबकि गुरु कुछ कहें अथवा बताएं तो उसमें भी विनम्रतापूर्वक अपनी बात कहने में कोई गलत नहीं है ।  इससे अपमान नहीं होता है । बल्कि संशय का समन और शुद्ध ज्ञान-विज्ञान का उदय होता है ।



अपने यहाँ ऐसा भी नहीं था कि जो मैंने ज्ञान-विज्ञान और भगवान के बारे में कह दिया वही अथवा उतना ही सही है । वही अंतिम सत्य नहीं माना जाता था । इदिमिथ्यम, नेति-नेति और चरैवेति-चरैवेति इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । नित नूतन ज्ञान-बिज्ञान की ओर अग्रसर होना और अंधकार से प्रकाश की ओर जाना सनातन धर्म का मूल लक्ष्य है ।



कुल मिलाकर प्रश्न करना, सुनना और उत्तर देना एक स्वस्थ परंपरा के जरूरी अंग थे । इसकी महत्ता को बनाये रखना और प्रोत्साहित करना चाहिए । इससे सनातन धर्म को जीवटता मिलेगी और लोग अधिक लाभांवित हो सकेंगे ।



।। जय श्रीसीताराम ।।


बुधवार, 15 नवंबर 2017

सत्य सनातन धर्म के धार्मिक ग्रंथ-पुराण और लोंगो की मूर्खताएँ

जैसे सत्य सनातन धर्म में अनेक देवी देवता हैं वैसे ही सनातन धर्म में अनेकों ग्रंथ भी हैं । इनमें अठारह पुराण भी हैं । अलग-अलग पुराण अलग-अलग देवता को समर्पित हैं । जैसे विष्णु पुराण विष्णु भगवान को समर्पित है तो शिव पुराण भगवान शंकर जी को समर्पित है ।


सनातन धर्म के ग्रंथों में कई बाते ऐसी आती हैं जिन्हें पढ़कर अथवा सुनकर लोग अज्ञानता अथवा मूर्खता वश उसे गलत कहने अथवा समझने लगते हैं । कई लोग तो निंदा भी करते हैं अथवा करने लग जाते हैं ।


बचपन से ही राम जी की ऐसी कृपा हुई कि कोई कुछ भी कहे मेरे ऊपर कोई फर्क ही नहीं पड़ता था बल्कि हँसी आती थी अथवा मन में सोचता था कि कराल कलिकाल ने इन्हें वरगला रखा है इसलिए ही ये लोग ऐसा बोल रहे हैं । जैसे जब मैंने कहीं सुना कि तथाकथित विद्वान ऐसे कहते अथवा मानते हैं कि आर्य भारत में बाहर से आए थे । तो मैं सोचता था कि देखो गलत पढ़ाया अथवा बताया जा रहा है । अज्ञानता बश अथवा जानबूझकर लोग गलत धारणा को प्रचारित कर रहे हैं । 


 एक बार मैं स्टेशन पर बैठा हुआ था । कुछ विद्यार्थी भी वहाँ थे जिनकी बातों से पता चलता था कि वे कला संकाय के विद्यार्थी थे । लेकिन वे आपस में कह रहे थे कि व्रत करने से रखने से कुछ होता थोड़े है । विज्ञान कहता है कि इससे स्वास्थ्य सम्बंधी कुछ फायदे होते हैं और कुछ नहीं । मैं मन ही मन सोचने लगा कि ये भी कलिकाल के विगोए हुए हैं ।


कई लोग ग्रंथों को भी काल्पनिक कहते हुए पाये जाते हैं । ये भी कलिकाल के ही विगोए हैं । ऐसे ही कई बाते हैं जिन्हें मूर्खता वश लोग गलत समझ अथवा समझा रहे हैं । इन पर ‘ते कायर कलिकाल विगोए’ अथवा ‘बातुल भूत विवश मतवारे । ते नहि बोलहिं बचन सँभारे’ ही लागू होता है ।


कई लोग कहते हैं कि शिव पुराण पढ़ो तो शंकर जी को सबकुछ बताया गया है और विष्णु पुराण पढ़ो तो विष्णु जी को सब कुछ बताया गया । जिस देवता का पुराण वही सबसे बड़ा । कुछ समझ में ही नहीं आता कि कौन बड़ा है ? कौन श्रेष्ठ है ? जिसका पुराण वही बड़ा है । लोग नहीं समझ पाते कि सभी पुराण अलग-अलग लोंगो द्वारा नहीं लिखे गए हैं । सभी व्यास जी महाराज द्वारा ही लिखे गए हैं । अब एक ही लेखक अलग-अलग ग्रंथ में अलग-अलग देवता को सब कुछ क्यों कह रहा है ? यहाँ यह समझना बहुत जरूरी है कि ग्रंथ सबके समझने योग्य नहीं होते । इन्हें अधिकारी-योग्य व्यक्ति ही समझ सकते हैं । इसलिए पहले विद्वान लोग ही इन्हें पढ़तें-पढ़ाते थे ।


 ग्रंथो को हम सामान्य वुद्धि से ठीक से नहीं समझ सकते । ज्ञान अथवा समझ की कमी से जब हम कोई चीज ठीक से नहीं समझ पाते तो उसके बारे में गलत धारणा बना लेते हैं । उसे गलत कहने अथवा समझने लग जाते हैं । ग्रंथ वर्षों अथवा युगों के चिंतन के फलस्वरूप लिखे गए हैं । जिन्हें हम सहज ही पढ़ अथवा समझ लेना चाहते हैं जो कि संभव नहीं है । और जब नहीं समझेंगे तो अनर्गल प्रलाप ही तो करेंगे ।


   वास्तव में जिस देवता का पुराण उसे ही सबकुछ कहना- शिव पुराण में शिव जी को, विष्णु पुराण में विष्णु जी को ऐसे ही अन्य पुराण में अन्य को सबकुछ कहना बहुत बड़ा दार्शनिक  चिंतन है जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता । इसे समझने में गणित बहुत उपयोगी है । गणित के मदद से इस तथ्य को सहजता से समझा जा सकता है । परंतु इसके लिए गणित का ज्ञान होना आवश्यक है ।


अतः ग्रंथों को न समझ पाना अपनी अयोग्यता है । इसलिए ग्रंथों की निंदा करना या गलत समझना मूर्खता है ।



        ।। जय श्रीसीताराम ।।



चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

चित करो राम कहे ग्रंथन की । कीजे लाज विरद अरु पन की ।।

सुर मुनि साधु कहे गुनगन की । हारत भीर सदा दीनन की ।।

कूर कपूत सकल दुर्जन की । नहिं गति और छाँड़ि चरनन की ।।

सरन राम पद सब असरन की । सादर बाँह गहत निबरन की ।।

सार संभार राम दीनन की । करत सदा जोगवत जन मन की ।।

सुनत राम सबबिधि हीनन की । कोल किरात आदि बनरन की ।।

बिगत सकल गुन जदपि सुजन की । राखो लाज नाथ अब जन की ।।

दीन संतोष नहीं तन मन की । जप तप बल नहिं और जतन की ।।

मोरे आश राम चितवन की । पतितपावन अरु शील सदन की ।।

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।। जय रघुवर जय राम धनुर्धर ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

जय रघुवर जय राम धनुर्धर । सुंदर श्याम सुशील सियावर ।।

मंगल मूरति रूप मनोहर । सोहत सुंदर शारंग कर सर ।।

मंजु मराल बसत जन उर सर । मोहत साधु संत बिधि हरि हर ।।

चरण कमल जन मुनि मन मधुकर । तारन तरन होत चिंतन कर ।।

भरत लखन कपि आदिक अनुचर । सीताराम रूप सचराचर ।।

अगुन सगुन अज अमित अगोचर । अजर अमर सुखनिधि परमेश्वर ।।

ज्ञान विज्ञान सकल सदगुन घर । दीनदयाल प्रनत हित तत्पर ।।

पुरुष पुराण अनूप भूपवर । माया मानुष सोहत नरवर ।।

बानर भालु आदि बहु बनचर । दीनबंधु राखे सब निज कर ।।

दीन संतोष बसहु उर अंतर । परम उदार दीन आरति हर ।।

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लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

।। गोस्वामी तुलसीदास जी का संदेश ।।

हे मनुष्यों भटकना छोड़ दीजिए तरह-तरह के कर्म, अधर्म और नाना मतों को त्याग दीजिए । क्योंकि ये सब केवल शोक और कष्ट देने वाले हैं । इनसे शोक दूर होने के बजाय और बढ़ता ही है । जीवन में ठीक से सुख-चैन नहीं मिलता और परलोक में भी शांति नहीं मिलती । इसलिए विश्वास करके भगवान श्रीराम जी के चरण कमलों से अनुराग कीजिए । इससे तुम्हारे सारे कष्ट अपने आप दूर हो जाएंगे-

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागुहू ।।

राम जी का ही सुमिरन कीजिए । राम जी की ही यश गाथा को गाइए और हमेशा राम जी के ही गुण समूहों को सुनते रहिए-

रामहिं सुमिरिए गाइए रामहिं । संतत सुनिए राम गुनग्रामहिं ।।

।।जय सियाराम ।।

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विज्ञान का बीज

संसार में हर चीज का बीज (मूल कारण ) होता है । अर्थात संसार और सांसारिक चीजों का कोई न कोई उदगम होता है । सबका बीज से ही उत्पत्ति और आगे विकास होता है । विज्ञान का बीज मतलब मूल कारण क्या है ? विज्ञान का बीज कहाँ से आया ? विज्ञान का बीज किसने बनाया ? विज्ञान का बीज किसने दिया ? यह एक बहुत ही विचारणीय प्रश्न है । यहाँ पर हम लोग देंखेगे कि विज्ञान का बीज तो भगवान द्वारा ही इस संसार को उपलब्ध कराया गया है ।

बहुत से लोग समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । इस बात को समझने के लिए सनातन धर्म के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान का अध्ययन जरूरी है । आधुनिक विज्ञान की वैसे तो बहुत सी शाखाएँ हैं । परंतु इनमें से भौतिक विज्ञान यानी Physics ही ऐसा है जो व्रह्मांड के उत्पत्ति और संरचना की अध्ययन करता है । भौतिकी कि दो शाखाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इनमे से एक जनरल रिलेटिविटी (General Relativity) और दूसरी क्वांटम मेकेनिक्स (Quantum Mechanics) है ।

गणित को आधुनिक विज्ञान की माता कहा जाता है । गणित का हम लोगों के जीवन और विज्ञान के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है । इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे । अधिक जानकारी के लिए इस ब्लॉग के ‘गणित और व्रह्मांड’ लेख को पढ़ सकते हैं । आधुनिक गणित (Modern Mathematics) समुन्द्र के समान विस्तृत है । फिर भी समुच्चय सिद्धांत (Set Theory), संख्या सिद्धांत (Number Theory), फलन और तर्क सिद्धांत (Theory of Functions and Logic), आंशिक और साधारण अवकल समीकरण (Partial and Ordinary Differential Equations) और बीजगणित तथा आधुनिक बीजगणित (Algebra and Modern Algebra) आदि बहुत ही उपयोगी शाखाएँ हैं ।

गणित के अभाव में आधुनिक विज्ञान (Modern Science) और टेक्नोलोजी (Technology) की कल्पना ही नहीं की जा सकती । गणित को विद्वान और वैज्ञानिक विज्ञान की माता कहते हैं । लेकिन गणित की माता कौन है ? गणित की उत्पत्ति का मूल कारण क्या है । गॉस (Gauss) नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं । गॉस ने कहा था कि गणित विज्ञान की माता है और संख्या सिद्धांत गणित की माता है । अब प्रश्न यह है कि संख्या सिद्धांत का मूल क्या है ? गणितज्ञ संख्या सिद्धांत का मूल प्राकृतिक संख्याओं (Natural Numbers) को बताते हैं । इंही से अन्य संख्याओं का विकास और संख्या सिद्धांत का विकास और फिर विज्ञान का विकास हुआ है । इस बात को वैज्ञानिक और गणितज्ञ जानते हैं ।

जो चीज प्राकृतिक होती है, उस पर सबका बराबर अधिकार होता है । जैसे हवा, गंगा जल आदि । ठीक इसीप्रकार से प्राकृतिक संख्याओं पर केवल पढ़े लिखे मनुष्यों का ही अधिकार नहीं है । इस पर अनपढ़ लोगों का तथा साथ ही पशु-पक्षियों का भी अधिकार है । एक, दो, तीन आदि का किसे पता नहीं है । सब लोग गणना में इनका इस्तेमाल करते हैं ।

पशु-पक्षियों के पास भी गणना की योग्यता होती है । उदाहरण के लिए मान लीजिए एक बृक्ष पर किसी चिड़िया का घोसला है । मान लीजिए उसमें दस बच्चे हैं । अब यदि चिड़ियाँ के अनुपस्थिति में कोई एक बच्चे को गायब कर दे तो वापस आने पर चिड़ियाँ अशांत हो जाती है । इधर-उधर, आस-पास मँडराने और चिल्लाने लगती है । जबकि उसके सभी बच्चे एक जैसे होते हैं । फिर भी उसे पता चल जाता है कि एक बच्चा गायब हो गया है । चिड़ियाँ को एक दो लिखना या बोलना नहीं आता । लेकिन प्रकृति प्रदत्त गणना की योग्यता से उसे इसका भान होता है ।

अब प्रश्न यह है कि प्राकृतिक संख्याओं का मूल क्या है ? जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है । इसका मूल प्रकृति है । भगवान हैं । इस बात को क्रोंकर (Kronecker) नामक गणितज्ञ ने इस प्रकार कहा है- ‘Natural numbers are God given bricks’. अर्थात ये ईश्वर की दी हुई इंटें हैं ।

जिस प्रकार ईंट से भवन का निर्माण हो जाता है । इसी प्रकार से प्राकृतिक संख्या रुपी ईंटों से संख्या सिद्धांत रुपी भवन खड़ा किया गया । इस प्रकार से गणित की माता का जन्म हुआ । जिससे गणित बनी । फिर गणित के बाद गणित से आज का विज्ञान बना । इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान का बीज तो राम जी के द्वारा ही इस संसार को मिला है । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है-

‘धरम तड़ाग ज्ञान विज्ञाना । ए पंकज विकसे बिधि नाना’ ।।

।। जय श्रीसीताराम ।।

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प्रार्थना

हे राम प्रभू मेरे भगवान । दीन सहायक दयानिधान ।।

तुम सम तुम प्रभु नहि को आन । गाये जग तेरा गुनगान ।।

तुमको सम प्रभु मान अमान । औरों को देते तुम मान ।।

धारण करते हो धनु वान । रखते हो निज जन की आन ।।

जग पालक जग के तुम जान । तुम ही ज्ञान और विज्ञान ।।

तुम सम नहि कोउ महिमावान । शिव अज नारद करें बखान ।।

वेद सके भी नहि पहिचान । जानूँ मैं क्या अति अज्ञान ।।

सरल सबल तुम सब गुनखान । दया करो हमको जन जान ।।

दूर करो अवगुन अभिमान । विद्यानिधि दो निर्मल ज्ञान ।।

छूटे नहि प्रभु तेरा ध्यान । संतोष शरन राखो भगवान ।।

।। जय सियाराम ।।

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राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल

राम नाम मंगलमूल दूर करे सब सूल ।

तू भूले जग को जग भूले तुझको राम नाम मत भूल ।।

रामनाम में रमों राम भजे होए जग अनुकूल ।

सारा जग बेसार राम नाम ही सार मद बस मत झूल ।।

जग जाल कब काल जाना है मत फूल ।

बिषयरस सुखतूल नाम रस सुख मूल संतोष जान मत भूल ।।

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भगवान की तलाश

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सदग्रंथ, सुसंत और भक्त कहते हैं कि भगवान सर्वब्यापी हैं । घट-घट वासी हैं । कण-कण में भगवान हैं । फिर भी भगवान नहीं मिलते । क्यों ?

जैसे ग्रंथों में अपार ग्यान का भंडार भरा है । और ग्रन्थ सब जगह उपलब्ध भी हैं । फिर भी वह ज्ञान सहज प्राप्त नहीं है । न ही ज्ञान ग्रन्थ (जिसमें ज्ञान भरा है ) के अवलोकन से और न ही स्पर्श से प्राप्त होता है । और तो और ज्ञान ग्रंथों को पढ़ डालने से भी प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही कण-कण में भगवान हैं और न ही दिखते हैं और न ही प्राप्त होते हैं ।

जैसे ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । ठीक ऐसे ही कण-कण रुपी ग्रन्थ में बसे ज्ञान रुपी भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना, ध्यान, चिंतन-मनन, प्रेम और विश्वास चाहिए । मालुम हो सबको ज्ञान प्राप्त नहीं होता । ठीक ऐसे ही सबको भगवान प्राप्त नहीं होते ।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त कर लेना तो आसान है लेकिन कण-कण में बसे भगवान को प्राप्त करना आसान नहीं है ।

लोग भगवान को खोजते हैं । भगवान को जानना, पाना अथवा देखना चाहते हैं । और भगवान स्वयं भक्त खोजते रहते हैं । लोग भगवान को तलाशते हैं और भगवान लोगों को । सच्चे भक्त की तलाश उन्हें हमेशा रहती है । सच्चे भक्त को भगवान को तलाशने की आवश्यकता ही नहीं रहती । भगवान स्वयं आकर मिलते हैं ।

कोई कितना ही बड़ा, संत, ज्ञानी अथवा विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति नहीं है, तो उसे भगवान कदापि नहीं मिलेंगे । वहीं दूसरी ओर कोई कितना भी छोटा अथवा मूर्ख ही क्यों न हो, यदि उसमें भक्ति है, तो उसे भगवान मिल जायेंगे ।

सारा संसार भगवान को प्रिय है । लेकिन भक्त सबसे प्रिय है । भगवान केवल सच्चे भक्त को मिलते हैं । और किसी को नहीं ।

भगवान को यहाँ-वहाँ, चाहे जहाँ तलाशो, पूजा-पाठ करो, प्रवचन करो अथवा सुनों अर्थात चाहे जो साधन अथवा साधना करो भगवान मिलने वाले नहीं । भगवान प्रेम और भक्ति से ही द्रवित होते हैं ।

भगवान को ढकोसला और बनावट बिल्कुल रास नहीं आती, रास आती है तो सरलता, मन की निर्मलता ।

भगवन तो मिलना चाहते हैं, प्रकट होना चाहते हैं । इसके लिए वे बेताब रहते हैं । लेकिन मिलें तो किससे ? किसके सामने प्रकट हों ? उन्हें योग्य अधिकारी चाहिए ? अनाधिकारी को कुछ भी देना पाप-अधर्म होता है । भगवान अनघ और धर्म स्वरूप-धर्म धुरंधर हैं, तो वे पाप या अधर्म कैसे करें ?

कण-कण के वासी भगवान को प्रकट करने के लिए प्रहलाद जैसा प्रेमी भक्त चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज प्रहलाद जी के प्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं कि-

प्रेम बदौं प्रहलादहि को जिन पाहन से प्रमेश्वरू काढ़े

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भगवान को प्राप्त करने का सरलतम तरीका

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भगवान को प्राप्त करना बहुत ही सरल है । कहीं जाने की या दर-दर ठोकर खाने की भी जरूरत नहीं है । कई काम भी नहीं करना हैं । केवल और केवल एक काम करना हैं । और भगवान घर बैठे प्राप्त हो जायेंगे ।

जैसे कोई रोग हो जाए तो जितने डॉक्टर के पास जाओ उतनी ही तरह-तरह की दवाएं और हिदायतें दी जाती हैं । वैसे ही भगवान को प्राप्त करने के नाना तरीके हैं । और लोग बताते भी रहते हैं । लेकिन हम सिर्फ एक सरलतम तरीका बता रहे हैं ।

भगवान छल-कपट से और छल-कपट करने वालों से बहुत दूर रहते हैं । और छल-कपट रहित निर्मल मन वालों के बहुत पास रहते हैं । श्रीराम जी कहते हैं कि निर्मल मन वाले ही हमें पा सकते हैं । दूसरे नहीं ।

बिना मन निर्मल किये ही हम तीर्थों के चक्कर लगाते फिरते हैं । साधु-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद लेते रहते हैं । प्रवचन सुनते रहते हैं । मंदिर जाया करते हैं । घर में भी पूजा-पाठ करते रहते हैं । यथा-शक्ति दान-दक्षिणा भी देते रहते हैं । व्रत-उपवास भी करते रहते हैं । लेकिन भगवान नहीं मिलते । क्योंकि हमारे पास निर्मल मन नहीं है ।

यही सबसे बड़ी समस्या है । हम सब भगवान को तो पाना चाहते हैं । लेकिन बिना मन निर्मल किये । जो कि सम्भव नहीं है । अपना मन ही निर्मल नहीं है । तो भगवान कैसे मिलें ?

अपना प्रतिबिम्ब भी देखना हो तो निर्मल यानी साफ-सुथरा दर्पण की आवश्यकता होती है । यदि दर्पण साफ-सुथरा न हो तो खुद अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं दिखाई पड़ता । तब गंदे मन रुपी दर्पण से भगवान कहाँ दिखेंगे ? यदि दर्पण में अपनी छवि बसानी यानी देखनी है तो दर्पण को स्वच्छ करना ही होगा । ठीक ऐसे ही मन में श्रीराम को बसाने के लिए मन स्वच्छ करना ही पड़ेगा ।

दर्पण स्वच्छ हो तो कुछ करना थोड़े पड़ता है । जैसे दर्पण के सामने गए प्रतिबिम्ब उसमें आ गया । भगवान तो हर जगह हैं । कण-कण में हैं । कहीं जाना भी नहीं है । हम हमेशा भगवान के सामने पड़ते हैं । लेकिन भगवान हमारे मन रुपी दर्पण में नहीं आते, नहीं दिखते । क्योंकि अपना मन रुपी दर्पण निर्मल नहीं है । अतः यदि हमारा मन निर्मल हो जाए तो हमें भगवान को पाने के लिए कुछ करना थोड़े पड़ेगा । भगवान खुद हमारे मन में बस जायेंगे । आ जायेंगे और हमें दिखने लगेंगे ।

भगवान को रहने के लिए जगह की कमी थोड़े है । लेकिन भक्त के मन में, हृदय में रहने का मजा ही दूसरा है । इसलिए भगवान निर्मल मन वाले को तलासते रहते हैं । जैसे कोई निर्मल मन मिला उसमें बस जाते हैं ।

अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है । सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है । सब छोड़कर हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे । भगवान खुद कहते हैं-

निर्मल मन जन सोमोहि पावा । हमहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

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संकटमोचन मारूतनंदन

संकटमोचन मारूतनंदन हनूमान अतुलित प्रभुताई ।

महाबीर बजरंगबली प्रभु निज मुख कीन्ह बड़ाई ।।

राम सुसेवक राम प्रिय रामहु को सुखदाई ।

तुमसे तात उरिन मैं नाही कहि दीन्हेउ रघुराई ।।

बालि त्रास त्रसित सुग्रीव को राम से दिहेउ मिलाई ।

भक्त विभीषन धीरज दीन्हेउ राम कृपा समुझाई ।।

गुन बुधि विद्या के तुम सागर कृपा करि होउ सहाई ।

राम प्रभु के निकट सनेही अवसर पाइ कहउ समुझाई ।।

अब तो नाथ विलम्ब न कीजे वेगि द्रवहु सुर साई ।

अघ अवगुन खानि संतोष तो स्वामी तव चरण की आस लगाई ।।

विरद की रीति छ्मानिधि रखिए करुनाकर रघुराई ।

नाथ चरन तजि ठौर नहीं संतोष रहा अकुलाई ।।

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रघुपति राघव जन सुखदाई

रघुपति राघव जन सुखदाई ।

आरतपाल सहजकृपाल अग जग के तू साई ।।

जग जो बड़े हुए अरु होते तुम्हरे दिए बड़ाई ।

शिव, हरि, बिधि आदिक को प्रभु दई तुम्हीं प्रभुताई ।।

घट-घट के जाननहार सुधि कियो न कोउ कराई ।

ठौर नहीं प्रभु द्रवहुँ वेगिंह कहौ कहाँ हम जाई ।।

आस पियास बुझै नहि रघुवर बिनु कृपा जल पाई ।

संतोष रखो प्रभु करुनासागर कृपा वारि पिलाई ।।

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।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

श्रीरामचालीसा

दोहा-

तुलसिदास मानस विमल, राम नाम श्रीराम ।

पवनतनय अरु विनय पद, सादर करौं प्रनाम ।।

अविगत अलख अनादि प्रभु, जगताश्रय जगरूप ।

पद कंज रति देहु मोहि, अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-

जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।

प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।

नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।

सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।

अगम अगोचर जन दुखनासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।

दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।

हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।

भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।

रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।

सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।

सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ उनको कियो सुखारी ।।

मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।।

पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।।

ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।

सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।

सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।

परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।

करि कुचाल जननी पछितानी । उनको बहुत भांति सनमानी ।

केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दै दुःख मेटा ।।

भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।

आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।

बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।

नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।

शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।।

कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।

करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।

बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।

कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।

सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।

कोटि भालु कपि बीच बराए । हनुमत से निज काज कराए ।।

पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़ै प्रभु आप बढ़ाए ।।

हनुमत को प्रभु दिहेउ बड़ाई । संकटमोचन नाम धराई ।।

रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।

ताहिं राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।

चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।

मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।

रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु बहु प्रभुताई ।।

देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।

कृपा अनुग्रह कीजिए नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।

छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा-

राम राम संतोष कहु भरि नयनन महु नीर ।

प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।

राम चालीसा नेम ते, पढ़ जो प्रेम समेंत

बसहिं आइ सियाराम जु, ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

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।। श्रीराम स्तुति ।।

।। श्रीसीतारामाभ्याम नमः ।।

हे राम प्रभूजी दयाभवन । तुमसा है जग में और कवन ।।१।।

सुखसागर नागर जलजनयन । गुन आगर करुना छमा अयन ।।२।।

सुखदायक लायक विपति समन । भवतारन हारन जरा मरन ।।३।।

संकोच सिंधु धुर धर्म धरन । शारंगधर टारन भार अवन ।।४।।

जग पालन कारन सिया रमन । देवों को दायक तुम्ही अमन ।।५।।

मन लाजै तुमको देखि मदन । शोभा की सीमा शील सदन ।।६।।

विश्वाश्रय रघुवर विश्वभरन । तुमको प्रभु बारंबार नमन ।।७।।

तुम बिनु प्रभु क्या यह मानुष तन । बन जावो मेरे जीवनधन ।।८।।

दुख दारिद दावन दोष दमन । तुमको ही ध्याये मेरा मन ।।९।।

प्रभुजी अवगुन अघ ओघ हरन । हो चित चकोर बिधु आप वदन ।।१०।।

नहि मालुम मुझको एक जतन । तुम बिनु को हारे दुख दोष तपन ।।११।।

कहते हैं स्वामी तव गुनगन । शरनागत राखन प्रभु का पन ।।१२।।

मेंरा उर हो प्रभु आप सदन । गहि बाँह रखो मोहि जानि के जन ।।१३।।

विनती प्रभुजी तारन तरन । मन का भी मेरे हो नियमन ।।१४।।

हे राम प्रभू मेरे भगवन । मैं चाह रहा तेरी चितवन ।।१५।।

करुनासागर संतोष सरन । है ठौर इसे बस आप चरन ।।१६।।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

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श्रीहनुमान स्तुति

।। श्री हनुमते नमः ।।

जय हनुमंत जयति मतिसागर । बल विक्रम त्रैलोक उजागर ।।१।।

पवनतनय समरथ गुन आगर । जय कपीस सेवक हित नागर ।।२।।

महावीर सब सिधि निधि दायक । जय रनधीर राम गुन गायक ।।३।।

रामदूत सुंदर सब लायक । बसत हिय सिय सह रघुनायक ।।४।।

ज्ञान विज्ञान विवेक अपारा । तव गुनगन गावत जग सारा ।।५।।

रवि सुरेश तव पौरुष भारी । जानत सकल देव नर नारी ।।६।।

दानव दैत्य भूत जग जेते । डरपहिं नाम सुनावत तेते ।।७।।

छीजहिं सकल दुष्ट अधियारी । घोर निशा जिमि देखि तमारी ।।८।।

अग-जग जाल सकल जेहिं सिरिजा । मानत सकल देव हर गिरिजा ।।९।।

सेवक तासु प्रिय सुखदाई । बार-बार प्रभु कीन्हि बड़ाई ।।१०।।

कहेउ उरिन तुमसे नहि भाई । संकटमोचन नाम धराई ।।११।।

धन्य-धन्य कीरति जग छाई । शेष-महेश सके नहि गाई ।।१२।।

हरि-हर-बिधि तव भगति सराही । राम भगत तुम सम कोउ नाही ।।१३।।

राम प्रेम मूरति धरे देहीं । मिले जेहिं आप राम मिले तेहीं ।।१४।।

राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।१५।।

अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहि श्रीरघुराई ।।१६।।

।। श्रीहनुमानजी महाराज की जय ।।

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