जब हनुमानजी ने भगवान
श्रीराम से उनका परिचय जानने के उद्देश्य से पूछा कि आप कौन हैं तब रामजी ने
हनुमानजी को अपना विराट स्वरूप दिखलाया और भगवान श्रीराम ने अपने सर्वात्मक,निर्गुण-सगुण-उभयात्मक, महायोगेश्वरेश्वर, सर्वेश्वर और सर्वशासक स्वरूप का परिचय देते हुए हनुमानजी को जो उपदेश
दिया उस श्रीराम गीता के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं ।
निर्गुण सगुण उभयात्मक रूपा । कहन लगे प्रभु
आप सरूपा ।।
सर्वात्मक सर्वेश्वर रामा । सर्वशासक परात्पर
परधामा ।।
हनुमान ! यह आत्मा मैं ही हूँ । मैं ही अव्यक्त मायाधिपति परमेश्वर हूँ । मुझे ही
संपूर्ण वेदों में सर्वात्मा और सर्वतोमुख कहा गया है ।
एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः ।
कीर्तितः सर्ववेदेषु
सर्वात्मा सर्वतोमुखः ।।
संपूर्ण कामनाएँ, संपूर्ण रस तथा संपूर्ण गंध मैं ही
हूँ । जरा और मृत्यु मुझे छू नहीं सकते । मेरे सब ओर हाथ और पैर हैं । मैं ही
सनातन अन्तर्यामी परमात्मा हूँ ।
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगंधोऽजरोऽमरः ।
सर्वतः पाणिपादोऽहमंतर्यामी सनातनः ।।
मैं ही सर्वत्र व्यापक. शांत और ज्ञान स्वरूप
परमेश्वर हूँ । मुझसे श्रेष्ठ कोई स्थावर-जंगम प्राणी नहीं है । जो मुझे जान लेता
है वह मुक्त हो जाता है ।
सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो
ज्ञानात्मा परमेश्वरः ।
नास्ति मत्परमं भूतं
मां विज्ञाय विमुच्यते ।।
मैं ही संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और फल देने वाला
हूँ । संपूर्ण देवताओं का शरीर धारण करके मैं सर्वात्मा ही सबकी स्तुति-प्रशंसा का
विषय हो रहा हूँ ।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रदः ।
सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वसंस्तुतः ।।
मेरे भक्तों का कभी विनाश नहीं होता । मेरे भक्तों
के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । मैंने पहले से ही यह घोषणा कर रक्खी है कि मेरे
भक्त का नाश नहीं होता है ।
न मद्भक्ता विनश्यन्ते मद्भक्ता वीतकल्मषाः ।
आदावेत्तप्रतिज्ञातं न में भक्तः प्रणश्यति ।।
मैं ही योगियों को समस्त संसार बंधन से मुक्त करता हूँ । संसार का
हेतु भी मैं ही हूँ और समस्त संसार से परे भी मैं ही हूँ ।
अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह ।
संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसार वर्जितः ।।
मैं ही स्रष्टा, पालक और संहारक हूँ । माया का स्वामी भी मैं ही हूँ । मेरी शक्तिस्वरूपा माया समस्त लोक को
मोह में डालने वाली है ।
अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः ।
मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी’ ।।
मैं ही संपूर्ण शक्तियों का प्रवर्तक, निवर्तक सबका आधारभूत तथा अमृत की
निधि हूँ ।
अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः ।
आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च ।।
कुछ साधक मुझे ध्यान के द्वारा देखते हैं । दूसरे
लोग ज्ञान से, अन्य लोग
भक्तियोग के द्वारा मेरा साक्षात्कार करते हैं । तथा कतिपय साधक कर्मयोग के द्वारा
मेरा साक्षात्कार करते हैं ।
ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे ।
अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे ।।
सभी भक्तों में मुझे वह सबसे प्रिय है, जो विशुद्ध ज्ञान के द्वारा मेरी
नित्य आराधना करता है, अन्य किसी साधन से नहीं ।
सर्वेषामेव भक्तानामेष प्रियतरो मम ।।
यो विज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा ।।
मेरी आराधना के अभिलाषी अन्य जो तीन प्रकार के
भक्त हैं वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं और पुनः लौटकर इस संसार में नहीं आते ।
अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकान्क्षिणः ।
तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः
।।
जो मुझे इस प्रकार महायोगेश्वरेश्वर जानता है वह
अविचल योग से युक्त होता है इसमें संशय नहीं है ।
यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम् ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ।।
भगवान श्रीराम कहते हैं कि पवननंदन ! मैं संपूर्ण लोकों का एकमात्र
स्रष्टा, सभी लोकों
का एकमात्र पालक, सभी लोकों का एकमात्र संहारक, सबकी आत्मा सनातन परमात्मा हूँ ।
सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता ।
सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं सनातनः ।।
इस बिषय में बहुत कहने से क्या लाभ यह सारा जगत
मेरी शक्ति से ही उत्पन्न हुआ है, मुझसे ही इस विश्व का भरण-पोषण होता है तथा अंततोगत्वा सबका मुझमें ही
प्रलय होता है ।
बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकंजगत ।।
मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं ब्रजेत् ।।
।। जय श्रीराम ।।
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