पुनर्जन्म और चौरासी के चक्कर के अकाट्य सिद्धांत को कोई भी जान और समझ सकता है । यहाँ पर एक जीवंत प्रमाण के माध्यम से इस सिद्धांत को समझाया गया है।
हाथ की कोहनी से मध्यमा अगुँली तक की माप को एक हाथ की माप कहा
जाता है । प्रत्येक मनुष्य के शरीर की लम्बाई उसके हाथ की माप से साढ़े तीन हाथ ही
होती है। एक हाथ की माप मे केवल चौबीस अँगुल होता है । इस प्रकार साढ़े तीन
हाथ चौरासी अँगुल के बराबर होता है ।
प्रत्येक मनुष्य के शरीर की लम्बाई चाहे वह छोटे कद का अथवा
बड़े कद का हो, बच्चा हो
या युवा उसके हाथ के अँगुल की माप से चौरासी अँगुल ही होती है क्योंकि वह चार
प्रकार और चौरासी लाख योनियों में जन्मता और मरता रहता है-
आकर चारि
लाख चौरासी ।
योनि भ्रमत
यह जिव अविनासी ।।
कोई भी मनुष्य
(स्त्री अथवा पुरुष) आसानी से नाप लेकर देख सकता है कि उसके शरीर कि लम्बाई साढ़े
तीन हाथ है । किसी भी हाथ की चार अँगुलियों को एक साथ रखते हुए माप लेकर
देखा जा सकता है कि एक हाथ की माप चौबीस अंगुल के बराबर है । और इस प्रकार पूरे
शरीर की लम्बाई चौरासी अंगुल की ही है । बच्चा अथवा युवा से और छोटे अथवा बड़े कद
से कोई अंतर नहीं पड़ता है । शरीर की लम्बाई चौरासी अँगुल ही होती है-
आकरि चार लाख चौरासी ।
जाति जीव जल थल नभ वासी ।।
एक ही जीव कभी जरायुज,
कभी स्वेदज, कभी अंडज और कभी उद्भिज के रूप में जन्मता है और कभी जल में, कभी थल
में और कभी नभ में रहता है । यह भ्रमण- जन्म-मृत्यु का चक्कर चलता रहता है ।
जन्मता है फिर मरता है और मरता है फिर जन्मता है । इसे चौरासी का चक्कर भी कहा
जाता है ।
चूँकि चौरासी के चक्कर
से छुटुकारा मनुष्य योनि पाकर ही हो सकता है इसलिए मनुष्यों को चौरासी अँगुल का
शरीर मिलता है कि अब तो चौरासी से छूटने का उपाय कर ले-'भजि लै सारँगपानी' ।
।। जय
श्रीराम ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें